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कहानी- मुफ़्त हुए बदनाम १: सहयोगात्मक रवैया भारी पड़ा‌ (Short Story- Muft Huye Badnam 1)

लोन लेने के सिलसिले में मैं और सुधा जी कई बार मिले, हमें बैंक जाकर कई आवश्यक कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ी. लेकिन हमारे इस तरह अक्सर साथ दिखने मिलने को विद्यार्थियों ने कुछ और ही रंग दे दिया.

कॉलेज में मैं नया नया अप्वाइंट हुआ था. मन में बहुत ही जोश व उमंग था. विद्यार्थियों को पढ़ाने का कुछ कर दिखनेका. में विद्यार्थियों को एकाउन्ट बड़े ही लगन व मेहनत से पढ़ाया करता था, जिससे जल्द ही मैं उनके बीच मशहूर हो गया. इसके अलावा अपने मिलनसार स्वभाव और सहयोगपूर्ण रवैये के कारण मेरे सहयोगी टीचर भी मुझे पसंद करते थे.

एक दिन हिंदी की अध्यापिका, सुधा श्रीवास्तव मेरे पास मदद के लिए आईं, उन्हें नया घर लेने के लिए लोन लेना था. वे चाहती थीं कि मैं लोन लेने में उनका मार्गदर्शन व मदद करूं. उन्हें सही सलाहकार की ज़रूरत थी. अपने स्वभाव के अनुरूप मैंने उनकी हर तरह से मदद की.

लोन लेने के सिलसिले में मैं और सुधा जी कई बार मिले, हमें बैंक जाकर कई आवश्यक कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ी. लेकिन हमारे इस तरह अक्सर साथ दिखने मिलने को विद्यार्थियों ने कुछ और ही रंग दे दिया. लड़के‌ लड़कियों के बीच यह बात (अफ़वाह) आग की तरह फैल गई कि “करण सर (मैं) सुधा टीचर को चाहते हैं.”

यह ख़बर प्रिंसिपल के कान तक भी पहुंची. उन्होंने मुझे तलब किया. वे बिना मेरी सफ़ाई सुने धाराप्रवाह शिक्षक से जुड़े आदर्शों के बारे बोलते चले गए.

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“शिक्षक को बच्चों के बीच अपनी एक आदर्श मिसाल रखनी चाहिए. ख़ासकर उनका चरित्र इतना ऊंचा होना चाहिए कि बच्चे उन पर गर्व कर सके.”

प्रिंसिपल जी की बातें सुनने के बाद मैंने अपना पक्ष रखा. उन्हें सब कुछ विस्तार से बताया. वस्तुस्थिति से अवगत कराया कि “मेरे और सुधा जी केबीच ऐसा कुछ भी नहीं. एक सहयोगी होने के नाते मैंने सिर्फ़ उनकी मदद की है.”

मेरी बातें सुन वे थोड़े शांत हुए, तब उन्हें बच्चों परभी ग़ुस्सा आया कि कैसे वे बात का बतंगड़ बना देते हैं.

मैं आत्मग्लानि से घिरा यही सोचता रहा कि ऐसा क्यों हुआ. मैं तो किसी का भला करने‌ चला था, बदले‌ में मिली बदनामी.

– करण सागर

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Photo Courtesy: Freepik

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