नील ने जब सुशांत को मुंह बनाते हुए देखा तो बोला, “तुम दो मिनट रुको.. फिर इन बच्चों से तुम्हें घिन नहीं आएगी.”
- सुशांत का अपने पिता रतन जी से खूब गरमा गरम बहस हुआ था. वह बाइक ख़रीदना चाहता था. लेकिन रतन जी की उतनी हैसियत नहीं थी. उन्होंने मना कर दिया तो जो भी मुंह में आया अनाप-शनाप बोलकर सुशांत घर से बाहर निकल आया. और अपने दोस्त नील के साथ घूमने निकल गया. घूमते-घूमते दोनों चाय के ढाबे पर बैठकर चाय पीने लगे.
चाय के ढाबे से कुछ दूरी पर कचरे का ढेर लगा था. वहां पर कुछ छोटे-छोटे बच्चे कूड़ा-कचरा बीन रहे थे. सुशांत ने उन्हें देखकर मुंह बना लिया. नील ने जब सुशांत को मुंह बनाते हुए देखा तो बोला, “तुम दो मिनट रुको.. फिर इन बच्चों से तुम्हें घिन नहीं आएगी.”
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नील ने बच्चों को अपने पास बुलाया और पूछा, “यह बताओ.. तुम यहां पर कूड़ा क्यों बीन रहे हो.. क्या तुम्हें कूड़े के ढेर से बदबू नहीं आती?”
तो एक बच्चा जो थोड़ा बड़ा था, वह बोला, “बदबू आती है साहब, लेकिन हम सब लावारिस हैं…” कहकर बच्चे चले गए. तब नील सुशांत से बोला, “तुम्हें इन बच्चों से घिन आ रही थी. लेकिन जिन लावारिसों के पालनहार नहीं होते हैं, उनकी यही दशा होती है. लेकिन तुम यह दुख नहीं समझ पाओगे, क्योंकि तुम पिता की छत्रछाया में रहते हो.”
सुशांत के चेहरे के भाव बदल चुके थे. अब वहां पर दया थी. और साथ ही मन में अपने पिता से किए गए दुर्व्यवहार के लिए पछतावा था.
– रेखा शाह
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