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कहानी- मन का वो ख़ामोश कोना (Short Story- Mann Ka Woh Khamosh Kona)


रीता कुमारी

उनके जाने के बाद पूरे घर में एक अजीब सी ख़ामोशी और सन्नाटा पसर गया था, जो मेरे दिल में भी उतर गया और अब धीरे-धीरे मुझे निगलने लगा है. मुझे अपने किए का आईना दिखाने लगा है.

कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन्हें चाहकर भी मिटाया नहीं जा सकता. चुपचाप जाने कब वह हमारे वजूद का हिस्सा बन जाता है और ताउम्र अपनी उपस्थिति द़र्ज़ कराते रहता है. ज़िंदगी की शायद यही सबसे बड़ी सच्चाई है, पर पापा आप मानोगे नहीं, क्योंकि आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि यादों का एक ऐसा ही ख़ामोश कोना बचपन से मेरे मन में जगह बनाए हुए है.
मैं मानता हूं कि आप एक अच्छे पापा हो और आपने एक अच्छे पापा की तरह मेरी परवरिश की है. मेरे मानसिक और भौतिक सारी आवश्यकताओं को समझा और पूरा भी किया है. पर मेरे मन के उस ख़ामोश कोने को कभी नहीं पढ़ पाए, जो मेरे मन को हमेशा अशांत और बेचैन किए रहता है और मेरी आत्मग्लानि का कारण है.
आज सुबह-सुबह आपका मेल आया है कि ‘सिंगापुर से पटना की दूरी है ही कितनी, फिर भी तुम छुट्टियों में भी हम लोगों से मिलने नहीं आते.’ मैं जानता हूं पापा आप मुझसे मिलने के लिए बेचैन रहते हैं, क्योंकि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं, साथ ही आपकी इकलौती संतान और आपका कुलदीपक भी तो हूं.
आपको शायद यह लगता है कि आपने शादी कर ली है, इसलिए मैं आना नहीं चाहता. पर ऐसी कोई बात नहीं है. अब मैं समझ सकता हूं कि अकेलापन क्या होता है? आदमी को कितना तोड़ता है. जब पेड़-पौधे भी अकेले जी नहीं पाते हैं, तो आदमी की क्या बिसात है. हर आदमी को अपने उम्र के किसी साथी की ज़रूरत होती ही है, वरना अकेलापन तिल-तिल कर मार डालता है. इसलिए मुझे आपकी शादी से कोई शिकायत नहीं है. रेवा आंटी यानी आपकी पत्नी से भी कोई शिकायत नहीं है. अगर दो अकेले इंसान एक साथ रहकर ख़ुश हैं, तो इससे अच्छी बात तो कुछ हो ही नहीं सकती है. आपके अकेले रहने से मैं भी आपके लिए परेशान रहता था. आपके शादी कर लेने से मैं चिंतामुक्त हो गया हूं. फिर भला आप दोनों की शादी से मुझे क्यों ऐतराज़ होगा? मुझे याद है पिछली बार जब मैं आया था, तो रेवा आंटी ने मेरी कितनी देखभाल की थी. मेरे लिए ख़ुद खाना बनातीं, मेरे कमरे की साफ़-सफ़ाई के साथ मेरे गंदे कपड़े धुलवा कर आयरन करवाने तक की ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली थी. मेरा इस तरह ख़्याल रखते देख आप मुझसे ज़्यादा ख़ुश होते और मुझे बार-बार यह याद दिलाते कि ‘देखो रेवा तुम्हारा कितना ख़्याल रखती है. इतना तो शायद तुम्हारी मां ने भी तुम्हारा कभी ख़्याल नहीं रखा होगा. उसे आंटी नहीं मम्मा बुलाया करो.’
पापा आप समझते क्यों नहीं, रेवा आंटी व्यवहारकुशल हैं, हंसमुख हैं, समझदारी से काम लेती हैं. मुझे नहीं लगता कि वह मुझसे प्यार करती हैं वह भी एक मां की तरह… हां, मेरी देखभाल ज़रूर बहुत अच्छे से करती हैं, क्योंकि मैं उनका अपना लक्ष्य पाने का साधन मात्र हूं. मैं कोई बाहरी गेस्ट तो हूं नहीं, फिर अपने ही घर में मेरी मेहमांनवाजी क्यों?
रेवा आंटी तो मेरा ख़्याल रख ही रही थीं, इन दिनों जब भी मैं पटना आता हूं, आप भी तो अपने सारे काम-धंधा छोड़कर मेरा ख़ास ख़्याल रखने लगते हैं. पिछली बार जब आया था सुबह के नाश्ते से लेकर लंच तक न जाने कितने तरह के खाने ऑनलाइन ऑर्डर करते रहते थे. अक्सर शाम का खाना किसी ख़ास रेस्टोरेंट में खिलाते. खाना सब मेरी पसंद का ही बने, इसका भी आप ख़ास ख़्याल रखते थे. मेरे पास पहले से ही ढेर सारे कपड़े थे. मेरे मना करने पर भी आप नहीं मानते थे. तरह-तरह के शर्ट-पैंट और जूते ख़रीदते रहते. मेरे ऊपर इतनी फिज़ूलख़र्ची क्यों पापा? आपका बेटा आया था कोई वीआईपी गेस्ट नहीं.

पर एक बात आज मुझे आपसे शेयर करनी है, जिसका मोल आपके लिए भले ही कौड़ी बराबर भी नहीं होगा, फिर भी यह बात बरसों से मेरे मन की ख़ामोशी में घुट रहा है. चाह कर भी मैं आपसे कभी पूछ नहीं पाया, क्योंकि आप मुझे इतना प्यार करते हैं कि ऐसे सवाल कर आपको किसी तरह से ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था.
पापा, आपने अकेलेपन को दूर करने के लिए रेवा आंटी से शादी कर ली और वो सारी मुरादें भी पूरी कर लीं, जो मां के साथ रहते हुए अधूरी थीं, पर मां के उस अकेलेपन का क्या, जो साल दर साल उन्होंने आपके होते हुए भी झेला. कभी आपको अपने ही घर का वह ख़ामोश कोना क्यों नज़र नहीं आया, जहां एक स्त्री के सारे सपने, सारी उम्मीदें, प्यार और ममता सब दफ़न था.

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क्या कमी थी मां में, केमिस्ट्री से एमएससी, सुंदर-सुघड़ और व्यवहार से काफ़ी सयंत थीं. आपके घर में सबका सम्मान करती थीं. उनकी सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह सीधी-सादी सरल और कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील थीं. उनका दिल दया, ममता और संवेदना का ऐसा जमघट था कि तड़पते हुए मछली को देखकर जहां आपकी भूख जगती थी, वहीं मां उसे बचाने के लिए व्याकुल हो जाती थीं. चिड़िया का घोंसला तब तक नहीं हटाने देती थीं, जब तक कि उसका बच्चा बड़ा होकर उड़ान न भरने लगे. कटे हुए बकरे को देखकर उनकी आंखें छलक आती थीं. आपकी नज़रों में उनका यह व्यवहार पागलपन था और बड़ी आसानी से आपने उन्हें पागल का खिताब दिया था. और एक पागल महिला के साथ आप अपने बेटे को कैसे रख सकते थे, वह भी उनके जैसा बन जाता, इसलिए आपने मुझे उनसे दूर कर दिया था. फिर भी उन पर दोषारोपण करते हैं कि उन्होंने मेरा अच्छे से ख़्याल नहीं रखा. अब रेवा आंटी को मेरी मां बनाकर मेरी ख़ुद की मां से बेहतर साबित करना चाहते हैं, तो मैं आपको बता दूं कि दुनिया में मां एकमात्र ऐसी इंसान होती है, जो दूसरे की जगह तो ले सकती है, पर उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता है.
थोड़ा सा बड़ा होते ही मैं समझने लगा था आपके साथ शादी के अटूट बंधन में बंध कर भी मां आपकी परिणीता नहीं थीं. दुनिया की चकाचौंध के अनुरागी आपका मेल सादगी और सरलता की मूर्ति से कैसे हो सकता था? आपको पार्टियों और दोस्तों की महफ़िल जमाने का शौक था, जहां वह चाह कर भी आपका साथ नहीं दे पाती थीं. सजधज कर पार्टियों में छलकते जाम और अश्‍लील जोक पर हंस नहीं पाती थीं. इसके बदले उन्हें पेड़-पौधों और चिड़ियों से प्यार था. उनके साथ समय बिताना उन्हें बहुत भाता था. गाना सुनना, घर सजाना, पेंटिंग करना उन्हें बहुत पसंद था. भला ऐसी महिला के साथ आप कैसे निभा सकते थे?
आप अपने हिसाब से अपना जीवन जीना चाहते थे और चाहते थे कि मां को अपने अनुरूप बदल लें. पर मां के संस्कार उनके पैरों की बेड़ियां थीं. वह चाह कर भी आपका नॉनवेज खाने में साथ नहीं दे सकती थीं, आपकी पार्टियों में आपके अनुसार व्यवहार नहीं कर पाती थीं. दरअसल आप यह नहीं समझ पाए कि जो जैसा है उसे उसी रूप में अपनाना सही होता है. उसे बदलने की कोशिश में अक्सर ज़िंदगी बदल जाती है. दूसरे को बदलने की कवायद करने के पहले ख़ुद को बदल कर देखते, तो ख़ुद ही समझ में आ जाता कि किसी को बदलना कितनी बड़ी मूर्खता है. मैंने जब से होश संभाला, आप दोनों के बीच कभी भी नज़दीकियां नहीं देखी. मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मेरा जन्म भी एक इत्तेफ़ाक था.
मैं मानता हूं, आप दोनों के बीच का यह रिश्ता एक दिन में ख़ामोश नहीं हुआ था, पर थोड़ा-थोड़ा दूर होते आपने, अपने आपको मां से इतना दूर कर लिया कि उनका अस्तित्व ही आपके जीवन में गौण हो गया. आप उन्हें सिर्फ़ एक ऑप्शन की तरह घर के काम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए यूज़ करते थे. उन्होंने भी ख़ामोशी से अपने आपको आपके घर में एडजस्ट कर लिया था. शायद वह मुझे खोने से डरती थीं और इसी डर ने उन्हें ख़ामोश कर दिया. उन्हें पता था कि अगर वह घर छोड़ कर गईं, तो मुझे उनसे छीन लिया जाएगा. इसलिए उन्होंने उपेक्षित जीवन को स्वीकार किया.
यह भी तो सत्य है कि उपेक्षित जीवन तलाक़ होने से ज़्यादा घातक होता है, क्योंकि यह इंसान को हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ता है और तब वह और भी ज़्यादा अकेला महसूस करने लगता है. मां ने इस उपेक्षित जीवन को स्वीकार कर लिया था. यही कारण था कि भले ही मां टूट-टूट कर बिखर रही थीं, फिर भी उन्होंने अपना हर दर्द और हर आंसू किसी के साथ बांटने के बदले ख़ुद ही पी लिए. दिल में चाहे जितने तूफ़ान उठते हों, चेहरा सागर की तलहटी की तरह शांत बना रहता. लोग तो सिर्फ़ चेहरा पढ़ते हैं, दिल का शोर कौन सुनता है?

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आप सोचते थे आपकी तरह ही मैं भी मां से दूर हो गया हूं. पर मेरा तो पूरा अस्तित्व ही मां के कारण था, तो भला मैं कैसे उनसे प्यार नहीं करता? मन ही मन मैं मां से बहुत प्यार करता था, पर मां के लिए मेरे प्यार को आप समझ ही नहीं सके और आपके प्यार ने मुझे इतना बुज़दिल बना दिया था कि मैं चाहकर भी आपके विरुद्ध जाकर उनके दर्द को बांटने की कोशिश नहीं कर पाया. उनका दर्द बांटने से ज़्यादा मुझे इस बात का डर होता था कि मां से मेरी नज़दीकियां देख कहीं आप बुरा न मान जाएं. यह मेरी कमज़ोरी थी या फिर स्वार्थ था कि आपसे दूर होकर मैं उन सारे सुख-सुविधा से वंचित होना नहीं चाहता था, जो आपके कारण मुझे मिल रहा था. मां बेचारी क्या दे सकती थीं, जो ख़ुद के लिए ही मोहताज थीं. एक डर यह भी था कि आपका विरोध करने पर मां की तरह मुझे भी कहीं अकेला न कर दिया जाए. इसलिए मैं हमेशा आपकी बात मानता और ख़ामोशी से मां के साथ होते अन्याय को देखकर भी चुप रह जाता. अपने इसी रवैए के कारण मैं हमेशा मां की ममता के लिए तरसता रहा. जिसका सबसे ज़्यादा हक़ मुझ पर था, उसे आपने मुझसे दूर कर, दादी और बुआ को मेरा संरक्षक बना दिया और मैं ख़ामोशी से सब कुछ देखता रहा. कभी-कभी मुझे लगता है पापा कि घर के लोगों के लिए मैं एक ऐसा शिकार था जिसे पकड़ लेने मात्र से मां का शिकार आसानी से तड़पा-तड़पा कर किया जा सकता था या यूं कहिए मैं चारा था मां को फंसाकर रखने के लिए.
भले ही मैं मां से दूर दूर ही रहता था फिर भी उनके अंदर उठते प्यार की आहट के सारे आरोह-अवरोह को बख़ूबी महसूस करता था. जल्द ही मैं यह भी समझने लगा था कि मेरे उनके पास नहीं रहने से उनके जीवन में कितना अकेलापन और सन्नाटा भर गया था. वहीं मां की दरियादिली देखिए कि वह इस बुज़दिल बेटे का साथ छूटने के डर से सारी प्रताड़ना झेल रही थीं.
जब भी मैं हॉस्टल से आता और कैंपस में कार से उतरता, मां खिड़की का ग्रिल थामे नज़र आतीं. दरवाज़ा खोल बुआ और दादी लपक कर मुझे गले से लगातीं, पर वह ख़ामोशी से सबसे पीछे खड़ी मुस्कुराकर मुझे सिर्फ़ देखती रहतीं. आपकी नज़रें बचा मैं मौका मिलते ही दौड़कर उनके पास चला जाता, वह मुझे गले से लगा लेतीं. मेरा उतना सा प्यार पाकर ही वह निहाल हो जातीं.
इसमें कोई शक नहीं था कि मेरे आने से लेकर लौटने के दिन तक वह ख़ामोशी से मेरे पसंद के खाने-पीने से लेकर मेरी सारी ज़रूरतों का ध्यान रखतीं. हॉस्टल लौटते समय कितनी ही तरह का स्नैक्स बना कर मेरे बैग में डाल देतीं. जाते समय भी जब आप मेरा सामान कार में अरेंज कर रहे होते, मैं लपक कर मां के पास चला जाता. वह मुझे भींचकर गले से लगा लेतीं. दूसरे पल ही मैं आपके पास होता. फिर आप मुझे थामे कार में आकर बैठते, मैं मुड़कर ड्योढ़ी पर खड़ी मां से मुस्कुराकर आंखों ही आंखों में विदा लेता. आपको तो आज तक मेरी इन हरकतों का कभी इल्म भी नहीं हुआ.
कभी-कभी मुझे यह भी लगता है पापा कि आपका प्यार मेरे लिए प्यार नहीं रिश्‍वत था, क्योंकि कहीं न कहीं आपके मन में अपराधबोध था कि मुझे जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी मां की ममता से अलग कर दिए थे. यह रिश्‍वत उसके लिए भी था, ताकि मैं मां पर होते अन्याय को देखकर भी अंधा बना रहूं.
मैं मानता हूं पापा कि आपने मुझे पालने में कोई कमी नहीं छोड़ी पर, मेरी जन्मदात्री को आपने तिल-तिल कर मारा. एक सुघड़ और अच्छी पत्नी के रहते हुए भी आप रेवा आंटी के साथ अक्सर दिखाई देते थे. कभी किसी कॉफी शॉप में तो कभी बाग बगीचों में. आपने कभी सोचा पापा कि किसी और स्त्री से आपकी नज़दीकियां देख मां के दिल पर क्या गुज़रती होगी?
आपकी उपेक्षा और अकेलेपन का शिकार हो मां टूट-टूट कर बिखर रही थीं, पर आपको उनके जज़्बातों की कोई कद्र ही नहीं थी. आपका कहना था उनके जैसी स्त्री से शादी करने के कारण आपकी ज़िंदगी तबाह हो गई. आप उस तरह से नहीं जी पाए जैसा आप जीना चाहते थे. वहीं मां के दर्द का एहसास था आपको? जानते हैं रिश्तों में सबसे ज़्यादा दर्द कब होता है? जब आप किसी को सबसे अधिक अपना मानते हैं और वही आदमी बिना किसी ठोस कारण के आपको अपने से दूर कर देता है. आपके लिए उसकी संवेदनाएं सूख जाती हैं और वह बेगानों की श्रेणी में आ खड़ा होता है.
मां के जीवन में भी बिना कारण ममता का अंत हो गया था. न कोई प्रेम का रिश्ता बचा था, न कोई उम्मीद बाकी थी. सपनों की फटी हुई गठरी को आख़िर कोई कब तक सीने से चिपकाए रख सकता है. कोई पत्थर का कलेजा लेकर तो पैदा नहीं हुई थीं. यह सब वह ज़्यादा दिनों तक झेल नहीं पाईं और एक दिन मां मुक्त हो गई थीं दुनिया के झमेलों से. शायद आपको छोड़ गई थीं, अपने हिसाब से जीने के लिए. उनके जाने के बाद पूरे घर में एक अजीब सी ख़ामोशी और सन्नाटा पसर गया था, जो मेरे दिल में भी उतर गया और अब धीरे-धीरे मुझे निगलने लगा है. मुझे अपने किए का आईना दिखाने लगा है.

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परिस्थितियां तेज़ी से बदल रही थीं. बुआ की शादी हो गई और दो दिनों के बुखार में दादी भी स्वर्ग सिधार गईं. मैं सिंगापुर आ गया मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए, तब आपने रेवा आंटी से बिना मुझे बताए शादी कर ली. जब मैं छुट्टियों में घर आया, आपने रेवा आंटी का परिचय मुझे मेरी मम्मा के रूप में दिया. बिना यह जाने कि मैं क्या चाहता हूं. आपसे मेरा प्यार का रिश्ता तो मंज़ूर था, पर मां की भरपाई मंज़ूर नहीं थी, क्योंकि आज भी जब मैं घर की ड्योढ़ी पर कदम रखता हूं, मां की चिर परिचित गंध महसूस होती है. यह अलग बात है कि आपने मां की यादों पर मिट्टी डालने के लिए उनके फोटो को भी एक पुराने एल्बम में ़कैद कर स्टोर रूम में रख छोड़ा है.
पर पापा, दुनिया का कोई रिश्ता इतना मर्मस्पर्शी और प्रगाढ़ नहीं होता जितना कि मां बेटा का रिश्ता होता है. यह अलग बात है कि मेरी स्वार्थी सोच ने इसकी शक्ल बदल दी. अब आपने जो नया संसार बसाया है, उसमें आपकी पत्नी तो रह सकती है, पर वह मेरी मम्मा कभी नहीं हो सकतीं. उनके बनावटी प्यार का खोखलापन, मुझे याद दिलाने लगता है कि अब वह घर मेरा नहीं है. तब मेरे अंदर का सन्नाटा इतना बढ़ जाता है कि मेरा दम घुटने लगता है. मेरे नहीं आने का सबसे बड़ा कारण शायद यही है. पर आप चिंता न करें इस बार छुट्टियां मिलते ही ज़रूर आऊंगा, क्योंकि आपके प्यार का कर्ज़ मुझ पर है जिसके एवज में मैं आपके प्रति अपने फ़र्ज़ को ज़रूर पूरा
करूंगा. पर यह भी सच है कि अब कभी आपके प्यार को गर्व से स्वीकार नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि एक कर्ज़ मां का भी मुझ पर है. अब बस एक अंतिम गुज़ारिश है कि जब मैं आऊं, किसी और को मेरी मां बनाकर आप मां की भरपाई करने की कोशिश नहीं करेंगे.
मेरे इस मेल को पढ़ते ही आपको एहसास हो जाएगा कि यह मेरे मन का उद्गार नहीं, बरसों से संचित मां का अपमान बह रहा है और उस मर्म के आप भी गवाह हैं!

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