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दशहरा: महिलाएं अपने भीतर की इन 10 बुराइयों का भी करें वध (Dussehra: Women should also slay these 10 evils within themselves)

दशहरा यानी विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का शाश्‍वत प्रतीक है. ऐतिहासिक रूप से हम इस दिन लंकापति रावण के पुतले का दहन करते हैं और भगवान श्री राम की विजय का उत्सव मनाते हैं, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला है, हमारे समाज और जीवन की चुनौतियां भी बदली हैं. आज के इस आधुनिक युग में रावण समाज के बाहर से ज़्यादा हमारे भीतर वास करता है, विशेषकर आज की आधुनिक नारी जो घर, परिवार, करियर और समाज के बीच एक अद्भुत संतुलन बनाकर चल रही है, उसे इस दशहरे पर बाहरी रावण को जलाने के साथ-साथ अपने भीतर छिपी कुछ ऐसी प्रवृत्तियों, असुरक्षाओं और मानसिक बुराइयों को पहचानकर उनका अंत करना होगा, जो उसकी प्रगति और मानसिक शांति के मार्ग में बाधा बन रही हैं. आइए, इस पावन पर्व के संदर्भ में जानते हैं कि एक आधुनिक नारी को अपने भीतर की किन 10 बुराइयों का वध कर अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करना चाहिए.
सुपर वुमन सिंड्रोम: परफेक्ट दिखने की चाह
आज की आधुनिक महिला पर एक साथ सुपर-मदर, परफेक्ट वाइफ, आज्ञाकारी बहू और सफल कॉर्पोरेट लीडर बनने का भारी दबाव रहता है. सोशल मीडिया और समाज ने परफेक्शन का एक ऐसा पैमाना तय कर दिया है, जिसे छूने की होड़ में महिलाएं मानसिक तनाव का शिकार हो रही हैं. इस दशहरे पर सबसे पहला बाण इस परफेक्ट होने के भ्रम पर चलाएं. यह स्वीकार करें कि आप एक इंसान हैं, कोई मशीन नहीं. अपनी कमियों को स्वीकार करना और हर काम में सर्वश्रेष्ठ होने के बजाय खुद को ख़ुश रखना ज़्यादा ज़रूरी है.
इम्पोस्टर सिंड्रोम: खुद को कम आंकना
कई बार बेहद योग्य, शिक्षित और आत्मनिर्भर होने के बावजूद आधुनिक महिलाओं के भीतर एक अनजाना डर होता है कि वे अपनी सफलता के लायक नहीं हैं. इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में इम्पोस्टर सिंड्रोम कहते हैं. यह हीनभावना महिलाओं को अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने या बड़े अवसर का फायदा उठाने से रोकती है. विजयादशमी के इस अवसर पर अपने भीतर की इस आत्म-संदेह की भावना का वध करें और अपनी योग्यताओं व सफलताओं पर गर्व करना सीखें.सोशियोट्रोपी: ना न कह पाना
दूसरों को ख़ुश रखने की चाहत महिलाओं की एक बड़ी कमज़ोरी बन जाती है. चाहे ऑफिस का अतिरिक्त काम हो या परिवार की असीमित मांगें, आधुनिक नारी खुद को थकाकर भी ना नहीं कह पाती. इस आदत के कारण उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है. सीमाओं का निर्धारण करना कोई स्वार्थ नहीं है. इस दशहरे पर अपने समय और ऊर्जा का सम्मान करते हुए, शिष्टता से ना कहना सीखें.

बॉडी डिस्मॉर्फिया: शारीरिक बनावट को लेकर असुरक्षा
आधुनिक युग में सौंदर्य के कृत्रिम मानकों के चलते महिलाएं अपनी ही देह से असंतुष्ट हो जाती हैं. रंग, वज़न, उम्र या शारीरिक बनावट को लेकर खुद को कोसना एक बड़ी आंतरिक बुराई है. आपकी असली शक्ति आपकी बुद्धिमत्ता, आपके विचार और आपके कार्यों में है, न कि इस बात में कि आप किसी ब्यूटी मैगजीन के कवर जैसी दिखती हैं या नहीं. अपनी शारीरिक बनावट को लेकर हीनभावना का दहन करें और बॉडी पॉजिटिविटी को अपनाएं.

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क्रोनिक कॉग्निटिव गिल्ट: अपराध बोध की भावना
एक कामकाजी महिला जब ऑफिस जाती है, तो उसे बच्चों को समय न दे पाने का गिल्ट होता है. वहीं, जब वह घर पर रहती है, तो उसे अपने करियर से समझौता करने का मलाल होता है. यह अंतहीन अपराध बोध आधुनिक नारी का सबसे बड़ा शत्रु बन चुका है. याद रखिए, आप अपने परिवार और स्वयं के लिए जो भी कर रही हैं, वह बेहतरीन है. इस दशहरे पर इस निरर्थक गिल्ट को अपने मन से पूरी तरह निकाल फेंकें.

कंपल्सिव अल्ट्रूइज़्म: आत्म-देखभाल की अनदेखी
दशहरे में हम देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में आधुनिक नारी सबकी देखभाल करते-करते खुद की सेहत, नींद, खान-पान और मानसिक सुकून को भूल जाती है. जब तक आप खुद स्वस्थ और ऊर्जावान नहीं रहेंगी, तब तक आप दूसरों का ख़्याल कैसे रख पाएंगी? अपनी सेहत की अनदेखी करने वाली इस आदत का खात्मा करें और खुद को प्राथमिकता देना शुरू करें.

सोशल कम्पेरिज़न थ्योरी: सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से तुलना
आजकल की महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली और दिखावटी ज़िंदगी देखकर उससे अपनी वास्तविक ज़िंदगी की तुलना करने लगता है. दूसरों की वेकेशन की तस्वीरें, महंगे तोहफे या ख़ुशहाल पारिवारिक तस्वीरें देखकर मन में ईर्ष्या, उदासी या असंतोष का आना स्वाभाविक है. डिजिटल दुनिया के इस रावण को पहचानें. पर्दे के पीछे की सच्चाई अलग होती है. इस विजयादशमी पर आभासी तुलना की इस बुराई को जलाएं और अपनी वास्तविक ख़ुुशियों का जश्‍न मनाएं.

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बैग लेडी सिंड्रोम: आर्थिक निर्भरता या वित्तीय साक्षरता की कमी
मनोविज्ञान में बैग लेडी सिंड्रोम उस अनजाने डर को कहते हैं जिसके तहत वित्तीय रूप से ठीक स्थिति में होने के बावजूद महिलाओं के मन में यह असुरक्षा बनी रहती है कि वे भविष्य में सब कुछ खो देंगी और बेघर हो जाएंगी. इस डर के कारण वे अक्सर वित्तीय फैसलों से भागती हैं. इसी तरह भले ही आज की आधुनिक नारी पैसे कमा रही है, लेकिन जब बात निवेश, टैक्स सेविंग या वित्तीय फैसलों की आती है, तो वह अक्सर घर के पुरुषों पर निर्भर हो जाती है. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का मतलब केवल सैलरी पाना नहीं, बल्कि अपने पैसों का प्रबंधन खुद करना भी है. वित्तीय फैसलों से डरने या कतराने की इस कमज़ोरी को दूर भगाएं और इस दशहरे पर खुद को आर्थिक रूप से साक्षर बनाने का संकल्प लें.

इमोशनल रीज़निंगः लॉजिक पर इमोशंस का हावी होना
भावुक होना नारी का गहना है, लेकिन अत्यधिक भावुकता जब आपके तार्किक ़फैसलों को प्रभावित करने लगे, तो वह एक कमज़ोरी बन जाती है. कई बार महिलाएं रिश्तों को बचाने या दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने के चक्कर में अपने आत्मसम्मान से समझौता कर लेती हैं या ग़लत ़फैसले ले लेती हैं. जहां ज़रूरत हो, वहां दिल के बजाय दिमाग से काम लें. अपनी इस कमज़ोरी पर विजय पाकर एक सशक्त और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएं.

क्वीन बी सिंड्रोम: अन्य महिलाओं को नीचा दिखाना
कहते हैं कि एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी ताक़त बन सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से समाज में कई बार महिलाएं ही दूसरी महिलाओं के पहनावे, चरित्र या ़फैसलों पर सबसे पहले उंगली उठाती हैं. कार्यस्थल पर या परिवार में दूसरी महिला को प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय उसकी ढाल बनें. इस दशहरे पर अपने भीतर छिपी ईर्ष्या या दूसरों को जज करने की इस प्रवृत्ति का अंत करें. जब महिलाएं एक-दूसरे का समर्थन करेंगी, तभी सही मायनों में महिला सशक्तिकरण की विजय होगी.
– शिखर चंद जैन

 

Sources: Shutterstock

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