बोधकथा- विवेक (Bodhkatha- Vivek)

बोधकथा- विवेक (Bodhkatha- Vivek)

“… जब तक हम जागरूक नहीं हैं कोई न कोई हमें लूटता रहेगा. कभी धर्म के बहाने, कभी शासन के बहाने. फिर किसने लूटा क्या फ़र्क़ पड़ता है. जब तक सारी मानव जाति सही और ग़लत के अंतर को ठीक से पहचानना नहीं सीख जाती, उसका किसी से भी बचाव कोई दूसरा नहीं कर सकता...”

अस्सी के दशक की बात है. किसी ने ओशो से पूछा, “हमें राजनीतिक गुंडों से कब छुटकारा मिलेगा.”
ओशो ने उत्तर दिया, “ये न पूछो कि हमे किसी क्षेत्र के गुंडों से कब छुटकारा मिलेगा. ये प्रश्न अर्थहीन है. ये पूछो कि हमे अपनी अज्ञानता से कब छुटकारा मिलेगा.


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हम कब सच को सच और झूठ को झूठ की तरह देखना और पहचानना सीख पाएंगे.
जब तक हम जागरूक नहीं हैं कोई न कोई हमें लूटता रहेगा. कभी धर्म के बहाने, कभी शासन के बहाने. फिर किसने लूटा क्या फ़र्क़ पड़ता है. जब तक सारी मानव जाति सही और ग़लत के अंतर को ठीक से पहचानना नहीं सीख जाती, उसका किसी से भी बचाव कोई दूसरा नहीं कर सकता.

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अगर हमें किसी भी क्षेत्र के गुंडों से कोई बचा सकता है, तो वो हमारा अपना विवेक है. इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं.

– भावना प्रकाश

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Photo Courtesy: Freepik

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