सोमवार, शिवजी की आराधना का दिन! आइए इस दिन शिवजी से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियों को फिर से याद किया जाए, जिन्हें शायद आपने पढ़ा-सुना हो कभी पर हो सकता है भूल चुके हों!
तो आइए पहली जानकारी पर चलें-
क्या आप जानते हैं कि शिव और शंकर में क्या अंतर है? क्यों कभी शिवजी को शिवलिंग तो कभी मानव रूप में पूजा जाता है? जवाब वेद और पुराणो में है.
शिव का शाब्दिक अर्थ होता है- शुभ.
और शं = कल्याण और कर मतलब करने वाला. मतलब समझे? सबसे आसान शब्दों में शुभ भाववाचक संज्ञा है मतलब जब तक वो एक भाव हैं, निर्गुण हैं, शिव हैं. कल्याण करने वाले देहधारी बनकर व्यक्ति वाचक हुए तो कहलाए शंकर.
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शिव केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि सिद्धांत हैं. अद्वैत वेदांत और शैव दर्शन में शिव को निराकार, निर्गुण और परम तत्व माना गया है.
योग और तंत्र में शिव को पूर्ण चेतना, साक्षी भाव और शुद्ध ब्रह्म के रूप में जाना जाता है. निराकार या अमूर्त रूप का उदाहरण शिवलिंग है.
सगुण रूप में पूजा जाने वाला जटाजूटधारी, गंगा को मस्तक पर धारण करने वाले, डमरू-त्रिशूलधारी मानववत् रूप शंकर है, जिसे मूर्तियों और चित्रों में दर्शाया जाता है.
अब शिवजी के एक पर्यायवाची को लेते हैं - क्या आप शिवजी के पर्यायवाची पुरारी का सही अर्थ जानते हैं?
शाब्दिक अर्थ है – पुर-यानी शहर + अरि-यानी दुश्मन मतलब शहर का दुश्मन.
पर इसका भावार्थ है – नेचुरल रिसोर्सेस का ग़लत और ज़रूरत से ज़्यादा एक्स्प्लायटेशन करके पनपने वाली शहरी या कह लीजिए लक्ज़ीरियस या आर्टीफीशयल लाइफ स्टाइल का विरोधी.
उनका विरोधी जो अपने सुविधाजनक जीवन के लिए प्रकृति का गैर ज़रूरी दोहन करते हैं. शिव जी उन गांवों और जंगल में रहने वाले लोगों की जीवनशैली को प्रशंसा और प्रोत्साहन देते थे, जो अपने जीवनयापन के लिए प्रकृति को संवारने का काम करते थे, उनके पूरक बनकर जीते थे.
शिवजी सबसे प्राचीन पर्यावरणविद थे, जिन्होंने लोगों को प्रकृति के साथ मिलकर जीना सिखाया. इसीलिए वो राजाओं की आंखों में खटकते थे, क्योंकि प्राकृतिक जीवन हमेशा कृतिमता और वैभव का विरोधी होता है
- भावना प्रकाश

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