हम योगी नहीं बन सकते, पर समाज के लिए उपयोगी तो बन सकते हैं… भारती त्रिवेदी! (Exclusive Interview: Bharti Trivedi)

Exclusive Interview, Bharti Trivedi
हमें बहुत-सी शिकायतें रहती हैं… अपनी ज़िंदगी से, अपने आसपास के लोगों से और ऊपरवाले से भी… न हम किसी चीज़ से संतुष्ट होते हैं और न ही शिकायतें करते-करते कभी थकते हैं… लेकिन इन शिकायतों के बीच क्या कभी उन मासूम बच्चियों पर नज़र पड़ती है, जिनके तन पर एक कपड़ा तक नहीं होता, क्या कभी भूख से तरसते वो रूखे चेहरे नहीं दिखते हमें, जिनके लिए सूखी रोटी भी अमृत का काम करती है… कभी उन ग़रीब-मजबूर लोगों को नहीं देख पाती हमारी आंखें, जो दिनभर मेहनत करके भी अपने परिवार के लिए छोटी-सी ख़ुशी भी नहीं जुटा पाते… शायद नहीं, हम तो अपनी शिकायतों में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि हम यह सोच भी नहीं पाते कि इस समाज के प्रति भी हमारे कुछ कर्त्तव्य हैं…
लेकिन कुछ लोग होते हैं, जो हमसे अलग सोचते हैं, उनके जीने का उद्देश्य ही होता है दूसरों के लिए कुछ कर गुज़रना… ऐसी ही एक शख़्सियत हैं भारती त्रिवेदी. उनकी मुहिम ही अब उनके जीवन का उद्देश्य है, क्योंकि उनका कहना है कि ङ्गहम योगी तो नहीं हो सकते, लेकिन समाज के लिए उपयोगी तो हो ही सकते हैं…फ जिनकी सोच इतनी पाक हो, उनकी मुहिम कितनी सशक्त और सार्थक होगी, यह समझा ही जा सकता है. क्या कहती हैं भारतीजी ‘कवच’ के बारे में और अपने ट्रस्ट नर्चरिंग माइंड्स के विषय में, आइए जानें.
“सबसे पहले तो मैं यह चाहती हूं कि लोग थोड़े संवेदनशील बनें, ख़ासतौर से हमारी बच्चियों के विषय में. हमारे ट्रस्ट द्वारा चलाई जा रही मुहिम ‘कवच’ इसी संवेदनशीलता से उपजी है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य है बच्चियों को सेक्सुअल डिसीज़, रिप्रोडक्टिव डिसीज़, मानसिक प्रताड़ना और शारीरिक शोषण से बचाना.

  • हम बच्चियों को साफ़-सफ़ाई, सेक्सुअल हाइजीन, प्राइवेट पार्ट्स की केयर और सेक्स एजुकेशन की जानकारी देते हैं, ताकि वो अपनी सेफ्टी और हाइजीन के महत्व को पहचान सकें.
  • हम मुंबई व आसपास के इलाकों में कई वर्कशॉप्स कर चुके हैं, जहां हम बच्चों को और ख़ासतौर से लड़कियों को हाइजीन और सेफ्टी के तौर-तरी़के सिखाते-समझाते हैं. हालांकि हम जानते हैं कि यह काम सागर में बूंद समान है, क्योंकि यदि हम चाहते हैं कि समाज के हर तबके के बच्चे एक बेहतर ज़िंदगी जी सकें, तो अभी बहुत कुछ करना बाकी है.”
    क्यों ज़रूरत पड़ी कवच की?
    “मैं आपको एक बेहद मार्मिक तथ्य बताने जा रही हूं. सुनकर शायद आप विश्‍वास भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि जब मेरे सामने यह घटना हुई, तो मैं अंदर तक हिल गई थी.
  • आप यह तो समझ ही सकते हैं कि अंडरगार्मेंट्स हमारी ज़िंदगी का महत्वपूर्ण व ज़रूरी भाग हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते इस ज़रूरत को पूरा न किया जा सकना और इसी वजह से आगे भी कई तरह की द़िक्क़तों का सामना करना बेहद चौंकानेवाली बात थी. हाल ही में मैं एक म्यूनिसिपल स्कूल में गई थी, वहां मैंने सुना कि एक बच्ची प्रिंसिपल को अपनी परेशानी बयां कर रही थी कि उसे पीरियड्स हो गया है और वो घर जाना चाहती है. स्कूल की ओर से जब उसे सैनिटरी नैपकिन देने की बात कही गई, तो उसने बताया कि वो इसका इस्तेमाल नहीं कर सकती, क्योंकि वो आमतौर पर अंडरवेयर नहीं पहनती.
  • अंडरगार्मेंट न स़िर्फ आपको बीमारियों, इंफेक्शन्स से बचाता है, बल्कि वो बैड टच और शोषण की संभावना को भी कुछ हद तक कम करने में सहायक है. लेकिन बहुत-सी बच्चियां हैं, जो आर्थिक तंगी के चलते पैंटी नहीं पहनतीं. यहां तक कि कुछ लड़कियां तो घर में पैंटीज़ शेयर करती हैं, उनकी मम्मी भी पति के अंडरवेयर से काम चलाती है और फिर समय व ज़रूरत के हिसाब से उसी का इस्तेमाल बच्चियां भी करती हैं.
  • लेकिन इस तरफ़ किसी का ध्यान तक नहीं जाता और न ही इस विषय पर इतनी बात की जाती है. मुझे इस घटना ने इतना हिला दिया था कि मैंने यह निर्णय लिया कि मैं इन बच्चियों को पैंटीज़ प्रोवाइड करूंगी. समस्या यह थी कि मेरे पास भी इतने पैसे नहीं थे, लेकिन जब आपके इरादे पुख़्ता हों, तो रास्ते बन ही जाते हैं. मुझे कई लोगों से मदद मिली. मैंने अंडरवेयर का इंतज़ाम किया, लेकिन फिर सवाल उठा कि अंडरगार्मेंट्स तो ठीक है, सैनिटरी नैपकिन्स भी तो ज़रूरी हैं, क्योंकि इन्हीं बेसिक चीज़ों की कमी से इंफेक्शन्स जैसी समस्या उभरती है. उसके बाद अपरोक्ष रूप से शोषण व प्रताड़ना भी बढ़ती है. सैनिटरी नैपकिन के लिए भी मैं चाहती तो थी कि कोई स्पॉन्सर मिल जाए, लेकिन बात अब तक नहीं बनी, फिर भी हमारे प्रयास रंग लाए और उनका भी इंतज़ाम हो गया. फिर लगा कि नहीं, स़िर्फ इन दो चीज़ों से काम नहीं चलेगा, तो हमने एक सोप और टॉवेल भी इसमें रख दिया… इस तरह धीरे-धीरे हमारे कवच का किट तैयार हुआ.

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  • कुछ लोगों को लगा कि लड़कों के लिए भी तो किट ज़रूरी है, क्योंकि वो भी उसी आर्थिक तबके से आते हैं, तो हमने उनके लिए भी अलग से एक किट तैयार किया, जिसमें साबुन, टॉवेल और इसी तरह की बेसिक चीज़ें हैं, जो बेसिक हाइजीन के लिए ज़रूरी होती हैं.”
    पैरेंट्स को भी एजुकेट करना उतना ही ज़रूरी है!
    “हमारे समाज में सेक्स शब्द पर ही सबको आपत्ति है, तो यहां सेक्स एजुकेशन के महत्व को समझाना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन हमें तो यह करना ही है, वरना इसी तरह हमारे बच्चे शोषित होते रहेंगे, तो हम बच्चों के साथ-साथ पैरेंट्स की भी काउंसलिंग करवाते हैं, उन्हें एजुकेट करने की कोशिश करते हैं कि सेक्स एजुकेशन और पर्सनल हाइजीन का मतलब यह नहीं कि बच्चे सेक्सुअली एक्टिव हो जाएंगे, बल्कि वो सतर्क हो सकेंगे और अपने ख़िलाफ़ हो रही ग़लत चीज़ों पर आवाज़ उठाने से नहीं झिझकेंगे.
  • हम बच्चों को बताते हैं कि जैसे आपका मोबाइल फोन या आपकी कोई भी पर्सनल चीज़ को कोई हाथ लगाता है, तो कितना बुरा लगता है, उसी तरह यह शरीर आपका है, अगर आपको किसी का टच बुरा लग रहा है, तो बोलो और डरो मत, चाहे वो कोई भी हो. ऐसे भी अनेक केसेज़ हमने देखे हैं, जहां पिता ही बच्चियों का शोषण कर रहा होता है, कहीं किसी स्कूल का कोई कर्मचारी इसमें लिप्त होता है, तो ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करवाना बेहद मुश्किल होता है. लोग इसे इज़्ज़त व समाज से जोड़कर देखने लगते हैं, लेकिन हम अपने स्तर पर प्रयास करते हैं कि हमारे बच्चे जितना संभव हो सुरक्षित हो सकें.
  • एक समय था, जब मैं अध्यात्म की ओर बढ़ना चाहती थी, लेकिन सांसारिक दुनिया में आने के बाद योगी नहीं बन सकी, पर मैंने सोचा समाज के लिए उपयोगी तो बना ही जा सकता है. यही मेरी साधना है. यह भी एक ज़रिया है ईश्‍वर को, समाज को कुछ वापस देने का. मैं चाहती हूं और भी लोग हमारी मुहिम से जुड़ें और हम अपने इस काम को और आगे तक ले जा सकें, ताकि हमारा समाज एक ऐसी दुनिया इन बच्चों को दे सकें, जहां वो हर तरह से और हर स्तर पर मह़फूज़ हों!”

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– ब्रम्हानंद शर्मा

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