ग़ज़ल- हमारे हिस्से का छोटा सा आका...

ग़ज़ल- हमारे हिस्से का छोटा सा आकाश… (Gazal- Hamare Hisse Ka Chota Sa Aakash…)

असल वजह यही है
थोड़े कुछ में ही बहुत कुछ ढूंढ़ने की कोशिश करना
और बहुत कुछ में
थोड़े कुछ के लिए भटकते फिरना
क्या काफ़ी नहीं है
घर की छत से दिखता वो छोटा सा आकाश
क्यों कोशिशें की जाती रहती हैं बार-बार
अनंत आकाश को नापने की…

कोई एक घर से निकल जाता है
‘एक घर’ की तलाश में
तो कोई
खाली जगहों में भी बना लेता है
एक घर अपनी इच्छाओं के अनुरूप
सबके अपने-अपने घर हैं.. और अपनी-अपनी जगहें
पर हर एक घर में नहीं होती
वो ख़ास जगहें
जिनको तलाशते रहते हैं हम उम्र भर…

कभी-कभी एक उम्र के बाद
दिखने लगती हैं उन जगहों की तासीरें
लेकिन.. वहां तक पहुंचते-पहुंचते
रास्तों में फिर से छूट जाता है बहुत कुछ

क्यों नाकाफ़ी रहता है हर बार
हमारे हिस्से का वो छोटा सा आकाश…

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

यह भी पढ़े: Shayeri

Photo Courtesy: Freepik

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