इंटरनेट ने छीनी ज़िंदगी की फ़ुर्सत … (Internet Has Taken Over Our Lives)

न जाने कितने ही पल यूं ही तारों को तकते-तकते साथ गुज़ारे थे हमने… न जाने कितनी ही शामें यूं ही बेफिज़ूल की बातें करते-करते बिताई थीं हमने… न जाने कितनी ऐसी सुबहें थीं, जो अलसाते हुए एक-दूजे की बांहों में संवारी थी हमने… पर अब न वो रातें हैं, न वो सुबह, न वो तारे हैं और न वो बातें… क्योंकि अब वो पहले सी फ़ुर्सत कहां, अब वो पहले-सी मुहब्बत कहां…!

disadvantages of internet

जी हां, हम सबका यही हाल है आजकल, न व़क्त है, न ही फ़ुर्सतक्योंकि ज़िंदगी ने जो रफ़्तार पकड़ ली है, उसे धीमा करना अब मुमकिन नहीं. इस रफ़्तार के बीच जो कभीकभार कुछ पल मिलते थे, वो भी छिन चुके हैं, क्योंकि हमारे हाथों में, हमारे कमरे में और हमारे खाने के टेबल पर भी एक चीज़ हमारे साथ रहती है हमेशा, जिसे इंटरनेट कहते हैं. ज़ाहिर है, इंटरनेट किसी वरदान से कम नहीं. आजकल तो हमारे सारे काम इसी के भरोसे चलते हैं, जहां यह रुका, वहां लगता है मानो सांसें ही रुक गईं. कभी ज़रूरी मेल भेजना होता है, तो कभी किसी सोशल साइट पर कोई स्टेटस या पिक्चर अपडेट करनी होती हैऐसे में इंटरनेट ही तो ज़रिया है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचाता है. लेकिन आज यही इंटरनेट हमारे निजी पलों को हमसे छीन रहा है. हमारे फुर्सत के क्षणों को हमसे दूर कर रहा है. हमारे रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

चाहे ऑफिस हो या स्कूलकॉलेज, पहले अपनी शिफ्ट ख़त्म होने के बाद का जो भी समय हुआ करता था, वो अपनों के बीच, अपनों के साथ बीतता था.

आज का दिन कैसा रहा, किसने क्या कहा, किससे क्या बहस हुईजैसी तमाम बातें हम घर पर शेयर करते थे, जिससे हमारा स्ट्रेस रिलीज़ हो जाता था.

 लेकिन अब समय मिलते ही अपनों से बात करना या उनके साथ समय बिताना भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम लगता है. हम जल्द से जल्द अपना मोबाइल या लैपटॉप लपक लेते हैं कि देखें डिजिटल वर्ल्ड में क्या चल रहा है.

कहीं कोई हमसे ज़्यादा पॉप्युलर तो नहीं हो गया है, कहीं किसी की पिक्चर को हमारी पिक्चर से ज़्यादा कमेंट्स या लाइक्स तो नहीं मिल गए हैं…?

और अगर ऐसा हो जाता है, तो हम प्रतियोगिता पर उतर आते हैं. हम कोशिशों में जुट जाते हैं फिर कोई ऐसा धमाका करने की, जिससे हमें इस डिजिटल वर्ल्ड में लोग और फॉलो करें.

भले ही हमारे निजी रिश्ते कितने ही दूर क्यों न हो रहे हों, उन्हें ठीक करने पर उतना ध्यान नहीं देते हम, जितना डिजिटल वर्ल्ड के रिश्तों को संजोने पर देते हैं.

 

आउटडेटेड हो गया है ऑफलाइन मोड

आजकल हम ऑनलाइन मोड पर ही ज़्यादा जीते हैं, ऑफलाइन मोड जैसे आउटडेटेडसा हो गया है.

यह सही है कि इंटरनेट की बदौलत ही हम सोशल साइट्स से जुड़ पाए और उनके ज़रिए अपने वर्षों पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों से फिर से कनेक्ट हो पाए, लेकिन कहीं न कहीं यह भी सच है कि इन सबके बीच हमारे निजी रिश्तों और फुर्सत के पलों ने सबका ख़ामियाज़ा भुगता है.

शायद ही आपको याद आता हो कि आख़िरी बार आपने अपनी मॉम के साथ बैठकर चाय पीते हुए स़िर्फ इधरउधर की बातें कब की थीं? या अपने छोटे भाईबहन के साथ यूं ही टहलते हुए मार्केट से सब्ज़ियां लाने आप कब गए होंगे?

बिना मोबाइल के आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ कब डायनिंग टेबल पर बैठे थे?

अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में बिना लैपटॉप के, बिना ईमेल चेक करते हुए कब यूं ही शरारतभरी बातें की थीं?

याद नहीं आ रहा नआएगा भी कैसे? ये तमाम ़फुर्सत के पल अब आपने सूकून से जीने जो छोड़ दिए हैं.

अपने बच्चे के लिए घोड़ा बनकर उसे हंसाने का जो मज़ा है, वो शायद अब एक जनरेशन पहले के पैरेंट्स ही जान पाएंगे, क्योंकि आजकल स़िर्फ पिता ही नहीं, मम्मी भी इंटरनेट के बोझ तले दबी हैं.

वर्किंग वुमन के लिए भी अपने घर पर टाइम देना और फुर्सत के साथ परिवार के साथ समय बिताना कम ही संभव हो गया है.

लेकिन फिर भी कहीं न कहीं वो मैनेज कर रही हैं, पर जहां तक पुरुषों की बात है, युवाओं का सवाल है, तो वो पूरी तरह इंटरनेट की गिरफ़्त में हैं और वहां से बाहर निकलना भी नहीं चाहते.

यही नहीं, आजकल जिन लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता या फिर जो लोग सोशल साइट्स पर नहीं होते, उन पर लोग हैरान होते हैं और हंसते हैं, क्योंकि उन्हें आउटडेटेड व बोरिंग समझा जाता है.

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स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है

रिसर्च बताते हैं कि सोशल साइट्स पर बहुत ज़्यादा समय बिताना एक तरह का एडिक्शन है. यह एडिक्शन ब्रेन के उस हिस्से को एक्टिवेट करता है, जो कोकीन जैसे नशीले पदार्थ के एडिक्शन पर होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग सोशल साइट्स पर अधिक समय बिताते हैं, वो अधिक अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं, क्योंकि जितना अधिक वो ऑनलाइन इंटरेक्शन करते हैं, उतना ही उनका फेस टु फेस संपर्क लोगों से कम होता जाता है.

यही वजह है कि इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल करनेवालों में स्ट्रेस, निराशा, डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन पनपने लगता है. उनकी नींद भी डिस्टर्ब रहती है. वो अधिक थकेथके रहते हैं. ऐसे में ज़िंदगी का सुकून कहीं खोसा जाता है.

इन सबके बीच आजकल सेल्फी भी एक क्रेज़ बन गया है, जिसके चलते सबसे ज़्यादा मौतें भारत में ही होने लगी हैं.

लोग यदि परिवार के साथ कहीं घूमने भी जाते हैं, तो उस जगह का मज़ा लेने की बजाय पिक्चर्स क्लिक करने के लिए बैकड्रॉप्स ढूंढ़ने में ज़्यादा समय बिताते हैं. एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारने की जगह सेल्फी क्लिक करने पर ही सबका ध्यान रहता है, जिससे ये फुर्सत के पल भी यूं ही बोझिल होकर गुज़र जाते हैं और हमें लगता है कि इतने घूमने के बाद भी रिलैक्स्ड फील नहीं कर रहे.

मूवी देखने या डिनर पर जाते हैं, तो सोशल साइट्स के चेकइन्स पर ही ध्यान ज़्यादा रहता है. इसके चलते वो ज़िंदगी की ़फुर्सत से दूर होते जा रहे हैं.

सार्वजनिक जगहों पर भी लोग एकदूसरे को देखकर अब मुस्कुराते नहीं, क्योंकि सबकी नज़रें अपने मोबाइल फोन पर ही टिकी रहती हैं. रास्ते में चलते हुए या मॉल मेंजहां तक भी नज़र दौड़ाएंगे, लोगों की झुकी गर्दन ही पाएंगे. इसी के चलते कई एक्सीडेंट्स भी होते हैं.

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इंटरनेट की देन: पोर्न साइट्स भी पहुंच से दूर नहीं

 आजकल आसानी से पोर्न वीडियोज़ देखे जा सकते हैं. चाहे आप किसी भी उम्र के हों. इंटरनेट के घटते रेट्स ने इन साइट्स की डिमांड और बढ़ा दी है. बच्चों पर जहां इस तरह की साइट्स बुरा असर डालती हैं, वहीं बड़े भी इसकी गिरफ़्त में आते ही अपनी सेक्स व पर्सनल लाइफ को रिस्क पर ला देते हैं. इसकी लत ऐसी लगती है कि वो रियल लाइफ में भी अपने पार्टनर से यही सब उम्मीद करने लगते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि इन वीडियोज़ को किस तरह से बनाया जाता है. इनमें ग़लत जानकारियां दी जाती हैं, जिनका उपयोग निजी जीवन में संभव नहीं.

– यही नहीं, अक्सर एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर्स भी आजकल ऑनलाइन ही होने लगे हैं. चैटिंग कल्चर लोगों को इतना भा रहा है कि अपने पार्टनर को चीट करने से भी वो हिचकिचाते नहीं. इससे रिश्ते टूट रहे हैं, दूरियां बढ़ रही हैं.

कुछ युवतियां अधिक पैसा कमाने के चक्कर में इन साइट्स के मायाजाल में फंस जाती हैं. बाद में उन्हें ब्लैकमेल करके ऐसे काम करवाए जाते हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए संभव नहीं होता.

इंटरनेट फ्रॉड के भी कई केसेस अब आम हो गए हैं, ये तमाम बातें साफ़तौर पर यही ज़ाहिर करती हैं कि इंटरनेट ने वाक़ई ज़िंदगी की फुर्सत छीन ली है…!

योगिनी भारद्वाज

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