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काव्य- मन के रेगिस्तान (Kavay- Mann Ke Registan)

याद है तुम्हें?
सागर के झालरदार तट पर
घूमना?
पानी की तेज़ आती लहर में
हाथ कस के पकड़ लेना
भीग जाना अंतर्मन तक

सफलता की खोज में
तुम भूल चुके हो यह सब
आज तुम्हारी ज़रूरत है
‘लिफ्ट’
जो तुम्हें ऊंचे
और ऊंचे ले जाती है
तुम यह भी भूल गए हो शायद
मैं अभी भी वहीं
सागर तट पर
एकाकी खड़ी हूं
और
इस बरसती शाम में आज तट भी वीराना है

तेज़ पानी की लहर
साथ खिसका ले जाती है
मेरे नीचे की धरती
और सहारा खोजने
हाथ बढ़ाती हूं तो
पाती हूं
मुट्ठी भर खारा जल
भीग चुकी हूं पूरी तन से
पर
मन में जो एक रेगिस्तान
निरंतर
बढ़ता ही चला जा रहा है
उस पर क्यों
अभी तक भी
नहीं पड़ी
हल्की सी एक बौछार?

- उषा वधवा

Photo Courtesy: Freepik


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