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काव्य- नारी (Kavay- Naari)

हे नारी! तू अबला नारी है क्यों
हर युग में रही बेचारी है क्यों
कभी रावण द्वारा चुराई गई
फिर अग्निपरीक्षा भी दिलाई गई
कभी इन्द्र द्वारा छली गई
और गौतम द्वारा पाषाण बनाई गई
कभी जुए में दांव पर लगाई गई
फिर भरी सभा चीरहरण को लाई गई
कभी दहेज के नाम पर जलाई गई
कभी पति के मरने पर सती भी बनाई गई
युगों युगों से ये सिलसिला अनवरत जारी है
कभी इस नारी की कभी उस नारी की बारी है
प्रथाओं के नाम पर कितनी प्रथाएं तुझ पर थोपी गई
घर परिवार की सब ज़िम्मेदारियां तुझको सौंपी गईं
इस समाज निर्माण में तू बराबर की हक़दारी है
कि नारी भी समाज में सम्मान की अधिकारी है...

- रिंकी श्रीवास्तव

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Photo Courtesy: Freepik

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