तुम आए तो यूं लगा
जैसे बरसों से प्यासी मिट्टी ने
पहली बारिश का नाम सुना
मैं कोई पुरानी बंद खिड़की था
जिस पर समय की धूल जमी थी
तुमने बस हल्के से छुआ
और भीतर सुबह उतर आई
तुम्हारी आवाज़ में कुछ ऐसा है
जैसे शाम के आंगन में
तुलसी के नीचे जलता दीया
छोटा सा पर अंधेरे को
उसका नाम बता देने वाला
मैंने बहुत से शब्द सीखे थे
पर जब तुम सामने आईं
तो सब के सब चुपचाप किनारे खड़े हो गए
जैसे नदी के आगे रास्ता छोड़ देते हैं पत्थर
प्रेम कोई घोषणा नहीं होता
वह तो उस चाय में है जो
तुमने बिना पूछे बना दी
उस चुप्पी में है जो हम दोनों के बीच
बिना बोझ बने बैठी रहती है
अगर कभी मैं खो जाऊं
तो मुझे किसी भीड़ में मत ढूंढ़ना
तुम्हारे नाम की जो नमी है मेरी आंखों में
उसी की महक पर चले आना
मैं हर जन्म में नहीं मांगता तुम्हें
बस इतना मांगता हूं
कि इस एक जीवन की हर सांझ
तुम्हारे कांधे की धूप में ढले
और
हम दोनों साथ बैठे हो
हर सांझ की चाय के साथ एक पास…
– तेजस मिश्रा
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Photo Courtesy: freepik
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