Close

पहला अफेयर- यादों के अलाव… (Love Story- Yaadon Ke Alaav)

किसी के साथ अपनेपन का एहसास, किसी का हो जाना और किसी को अपना बना लेने की चाहत का एहसास. अचानक ही जैसे दिल की धड़कनों की लय ही बदल गई थी. मैं एहसास के उस जादुई लम्हे में कैद हो गया.

बहुत ही सर्द रात थी वो जब हमें एक शादी के फंक्शन में जाना था. ठंड के कारण मन बिल्कुल नहीं था जाने का, लेकिन मजबूरी थी. शादी क़रीबी मित्र परिवार में थी, तो मां-पिताजी के साथ जाना ही पड़ा. मैं यथासंभव गर्म कपड़े पहन कर गया था, लेकिन तब भी बाहर खुले में बहुत ज़्यादा ठंड लग रही थी.

मैरेज गार्डन में जगह-जगह अलाव जल रहे थे और लोग उनके आसपास ही कुर्सियां लगाकर आग ताप रहे थे. मैंने मां-पिताजी को भी एक अलाव के पास बिठा दिया और वहीं उनके लिए कभी सूप तो कभी स्नैक्स लाकर देने लगा. सूप या स्नैक्स लेते समय मैं भी थोड़ी देर अलाव ताप लेता. सूप का कप मुंह के पास लाया ही था कि उड़ती भाप के उस पार जैसे अचानक ही बादलों के बीच चांद निकलता है वैसे ही एक चेहरा कौंध गया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर- प्यार हो गया तुमसे… (Love Story- Pyar Ho Gaya Tumse…)

सुंदर, सफ़ेद रेशमी सूट पहने वो ठीक चांद की तरह ही तो दिख रही थी. घने काले बालों की घुंघराली लटों के बीच उजला गोरा मुखड़ा बादलों से झांकते चांद सा ही दिख रहा था. वो भी अलाव के पास हाथ तापने ही आई थी. मैं पलक झपकाना भी भूल गया था. अपने जीवन में मैंने इतनी सुंदर लड़की कभी नहीं देखी थी. वह भी अपने माता-पिता की कुर्सी के पीछे ही खड़ी थी और मेरी तरह ही उनके लिए कभी सूप तो कभी स्नैक्स लाकर देती.

जैसे ही वह कुछ लेने जाती, मैं भी उसके पीछे चल देता. उसके परफ्यूम की भीनी-भीनी ख़ुशबू मन को मदहोश कर रही थी. बुफे में उसके पीछे ही खड़ा रहता.

“क्या आप मेरे लिए दो प्लेटें पकड़ लेंगे प्लीज़. मैं मां-पिताजी के लिए खाना लगा देती हूं.” मधुर झंकार सी उसकी आवाज़ आई. वो हाथ में दो प्लेटें पकड़े मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देख रही थी.

उफ़्फ़... क्या दिलकश मुस्कुराहट थी. मना करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था. मैंने भी तपाक से प्लेटें थाम लीं. वो फटाफट दोनों प्लेटों में एक साथ खाना परोसकर दे आई. फिर इसी तरह उसने मेरे माता-पिता के लिए भी खाना लगवा दिया.

जब उन चारों का खाना हो गया, तो उसने उसी दिलकश मुस्कुराहट से कहा, “चलिए हम भी खाना खा लेते हैं. ठंड बहुत है कुछ तो गर्माहट आएगी.”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ख़्वाबों के दरमियान… (Pahla Affair: Khwabon Ke Darmiyaan)

हम औपचारिक बातें करते हुए अलाव के पास बैठकर खाना खाने लगे. जीवन के उत्साह से भरपूर वह हंसमुख होने के बाद भी बहुत ही सौम्य और शालीन थी. उसके व्यक्तित्व में गज़ब का आकर्षण था.

दूसरे दिन शादी में जाने का मेरा मन नहीं था पहले, लेकिन मैं बस उसके लिए गया. आज मोरपंखी रंग की साड़ी में सजी वह इतनी सुंदर लग रही थी कि नज़र नहीं हट रही थी उस पर से. वह मुझे देखते ही मुस्कुराई. जान-पहचान के लोगों से बातें करते हुए वह यहां-वहां घूम रही थी, पर मैं तो ठहरा हुआ सा बस उसे ही देख रहा था और अचानक महसूस हुआ कि मुझे प्यार हो गया है उससे, पहली ही नज़र का प्यार. कितना ख़ुशनुमा एहसास था वो.

किसी के साथ अपनेपन का एहसास, किसी का हो जाना और किसी को अपना बना लेने की चाहत का एहसास. अचानक ही जैसे दिल की धड़कनों की लय ही बदल गई थी. मैं एहसास के उस जादुई लम्हे में कैद हो गया. उस लम्हे के एहसास की सुगंध आज तक सांसों में भरी हुई है. कितने दिन आहें भरते हुए गुज़र गए.

प्रेम का अंकुर एक रिश्ते के पौधे में पल्लवित होने के लिए एक रस्म की सिंचाई चाहता था. जब मां से उसके बारे में बात की, तो पता चला 15 दिन पहले ही उसकी सगाई हो चुकी है. एक आह भीतर ही घुटकर रह गई. प्रेम का अंकुर मन की ज़मीन में ही दबा रह गया. फिर कभी नहीं मिला उससे, लेकिन चुपके से मोबाइल में लिए उसकी फोटो आज भी मेरे पास है जो अब जीने का सहारा है.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: आवाज़ की दुल्हन (Pahla Affair: Awaaz Ki Dulhan)

दिन तो काम में गुज़र जाता है, लेकिन रातें नहीं कटतीं. रोज़ रात में उसकी यादों का अलाव जला लेता हूं और ग़म की अंधेरी ठिठुरन को उसकी आंच से पिघलाने की कोशिश में गुज़ार लेता हूं. फोटो में कैद उसकी मुस्कान ही इस अंधेरे मन को दीपक बन रौशन करती है.

- विनीता राहुरीकर

Photo Courtesy: Freepik

Share this article