नर्स कहे या फिर सिस्टर की ज़िंदगी को गहराई से समझने की कोशिश की गई कंगना रनौत की फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ में.

यूं तो हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बहुत कुछ होता है और हम सहते-झेलते आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन कुछ हादसे और घटनाएं ऐसी होती हैं, जो भुलाए नहीं भूलती उन्हीं में से एक थी नवंबर 2008 को आतंकवादियों द्वारा किया गया प्रहार! जब मुंबई के ताजमहल होटल, कामा अस्पताल और वहां के आसपास इलाके दहल गए थे.

तब तमाम बातें होती रही थीं, लेकिन बहुत से ऐसे भी वाकये और लोग थे, जो सुर्ख़ियों में नहीं रहे. जी हां, कामा हॉस्पिटल के नर्स, वार्ड बॉय, कर्मचारी जिन्होंने अपने साहस, सहयोग और मानवता की मिसाल पेश करते हुए न केवल सैकड़ों मरीज़ों, जिनमें गर्भवती महिलाएं, नवजात शिशु, बुज़ुर्ग भी शामिल थे को बचाया, बल्कि निस्वार्थ सेवाभाव से दुनिया को रू-ब-रू करवाया. निर्देशक मनोज तापड़िया की ‘भारत भाग्य विधाता’ मूवी उन्हीं अनकहे नायकों की कहानी दिखाकर उन्हें आभार व्यक्त करता है.

हम सभी जानते हैं कि किस तरह मुंबई टेरिस्ट अटैक के समय दो आतंकवादी सरकारी अस्पताल कामा में घुस गए थे. तब वहां के सभी स्टाफ लोगों ने ख़ासकर हमारी नर्स की टीम ने अपनी जान जोख़िम में डालकर मरीज़ों की जान बचाई थी. उन्होंने अपनी सूझबूझ व अदम्य साहस से न केवल टेरिस्ट को भागने पर मजबूर किया, बल्कि गंभीर केस वाले पेशेंट को भी बचाने में कामयाब रहीं. कह सकते हैं कि ये आम लोग नहीं, बल्कि देश के भाग्य विधाता हैं. सच, भारत भाग्य विधाता के शीर्षक को परिपूर्ण करते हैं ये जाबांज़ लोग.

जब मुंबई पर आतंकवादी हमले हुए थे, तब हम सभी के मन में एक अनजाना सा डर घर कर गया था. लेकिन सराहना करनी होगी उन लोगों की जिन्होंने न केवल उनका सामना किया, बल्कि उन्हें मार गिराया और गिरफ़्तार भी किया.
गीता, कंगना रनौत एक मेहनती, समर्पित और मिलनसार नर्स हैं. उन्होंने हमेशा ही अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए नर्स बनते समय लिए गए शपथ का गौरव बढ़ाया. वे कामा हॉस्पिटल की अनुभवी और साहसी नर्सों में से एक हैं. फिल्म की शुरुआत में पुलिस द्वारा उन्हें पकड़े गए आंतकी की शिनाख़्त के लिए बुलाना, परिवार का विरोध, गीता की ख़ुद की कशमकश का निर्देशक ने सराहनीय फिल्मांकन किया है.
फिर कहानी फ्लैश बैक में जाती है. कैसे कामा अस्पताल की सभी सिस्टर्स अपनी-अपनी ज़िंदगी की संघर्षों को झेलते व उबरते हुए पूरी मुस्तैदी और ज़िंदादिली के साथ नर्स की डयूटी करती हैं... बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है. हर नर्स की अपनी एक कहानी, सुख-दुख, ख़ुशी और ग़म हैं. परंतु उनकी असली परीक्षा तो तब होती है जब आतंक का साया कामा पर मंडराता है. कोई पेशेंट क्रिटिकल कंडीशन में है तो कोई प्रेग्नेंट वुमन दर्द से बेहाल, कोई बुज़ुर्ग महिला जीने-मरने के बीच झूल रही है... हर मरीज़ उन सिस्टर्स के लिए महत्वपूर्ण है. जब तक उनकी सांसें चल रही हैं उन्हें बचाना उनका फ़र्ज़ ही नहीं धर्म भी बन जाता है. यह सब देख-सुनकर आंखें भर आती हैं. कहते हैं डॉक्टर को भगवान माना जाता है, पर यहां पर वे नर्स-सिस्टर भी किसी भगवान से कम नहीं, जिन्होंने अपनी समझदारी और नीडरता से उस दिन क़रीब चार सौ लोगों की जान बचाई थी.
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निर्देशक ने फिल्म में छोटी-छोटी बातों का ख़्याल रखा है, इसलिए पूरी फिल्म बांधे रखती है. संवाद हो या जोश से भरे गाने या फिर नर्स की आपसी हंसी-मज़ाक, चुहलबाज़ी फिल्म को आगे बढ़ाने और दिलचस्पी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है.
फ्लोरेंस नाइटिंगेल नर्स को लेकर समर्पित पुरस्कार पर हुई राजनीति भी करारा व्यंग्य कसती है. उस पर बड़े अधिकारियों के घर पर डयूटी के नाम पर नर्सों से क्या कराया जाता है, उस पर भी तंज कसा गया है. ऐसे कई बातें फिल्म में दिखाई गई है, जिस पर शायद ही कभी हम गंभीरता से सोच पाते हैं.
कंगना रनौत एक सशक्त व बेहतरीन अभिनेत्री हंैं, यह उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिखाया. एक बेटी, पत्नी, मां, सहेली के साथ-साथ नर्स... हर भूमिका में वे बेजोड़ लगी हैं. ख़ुशी के लम्हे हों, ग़म के आंसू हो या फिर डर-घबराहट के पल या फिर बहादुरी व सूझबूझ का परिचय देना हर जगह वे लाजवाब रहीं. अन्य नर्स के रोल में गिरिजा ओक गोडबोले, स्मिता तांबे द्विवेदी, रसिका आगाशे, प्रिया बेर्डे, ईशा डे व सुहिता थते, आशा शेलार सभी कलाकारों ने उनका बख़ूबी साथ दिया. सयाजीराव शिंदे और प्रसाद ओक भी प्रभावित करते हैं.
अमन पंत के संगीत में सुखविंदर सिंह का गाया शीर्षक गीत भारत भाग्य विधाता... उम्दा बना है, इसके गीत भी मनोज तापड़िया ने लिखा है. इसके अलावा श्रेया घोषाल का गाया नब्ज़ नब्ज़... भी कर्णप्रिय है.

फिल्म की कहानी, संवाद, गीत, निर्देशन हर क्षेत्र में मनोज तापड़िया ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. रितेश शाह की पटकथा सशक्त है. अयान सिल की सिनेमैटोग्राफी बढ़िया है. देव राव जाधव ने अच्छा एडिट किया, जिससे दो घंटे दस मिनट की फिल्म छोटी भी है और कहीं बोरियत भी महसूस नहीं होती.
कंगना रनौत, शैलेश आर. सिंह, धवल गाडा, बबिता अशिवाल, अदि शर्मा द्वारा निर्मित ‘भारत भाग्य विधाता‘ सच्ची घटना पर आधारित एक बेहतरीन फिल्म बनी है. डॉ. जयंतीलाल गाडा (पेन स्टूडियो), मणिकर्णिका फिल्म्स निर्मित यह मूवी आंतकवादियों के हमले से बिखरे हालात की अलग तरह से सच्चाई प्रस्तुत करने में सफल रही है.

पहली बार उस आंतकी घटना का कामा वाला पहलू बड़ी स्पष्टता, सरलता और साफ़गोई से दिखाने की कोशिश की गई. इसके लिए फिल्म की टीम के सभी लोग बधाई के पात्र हैं.
- ऊषा गुप्ता
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