पहला अफेयर: तन्हा (Pahla Affair: Tanha)

Pahla Affair: Tanha

पहला अफेयर: तन्हा (Pahla Affair: Tanha)

अगर मनचाहा कुछ मिल जाए, तो मन कितना ख़ुश होता है, परंतु जिसे जी-जान से चाहो और वो मिलते-मिलते रह जाए, तब उम्रभर का मलाल बनकर मन को भीड़ में भी अक्सर तन्हा कर देता है.

गर्मी की छुट्टियों में मैं अपनी छोटी नानी के पास गांव भाग आता था, वहीं तुमसे पहली बार मिला था. नानी ने कहा था कि तुम्हारी मीरा दीदी हैं… मेरे कानों ने तो स़िर्फ ‘मीरा’ सुना था, दीदी शब्द कहीं हवा में ही घुल गया था. तुमको देखते ही तुम मन को भा गई थीं.

धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती रही. सुबह से लेकर देर रात तक हमारी बातों का सिलसिला चलता रहता. उसके बाद पढ़ाई के सिलसिले में अक्सर गांव आना बंद हो गया था. लेकिन ज़ेहन में तुम्हारी धुंधली-सी छवि हमेशा मन को गुदगुदा जाती थी. कहीं न कहीं मन तुमसे जुड़ गया था. तुम्हारी मोहक छवि, गुलाबी होंठों पर बिखरी शरारती मुस्कान अक्सर मुझे तन्हाई में भी महका जाती थी. उस व़क्त समझ नहीं पा रहा था कि ये क्या है और क्यों है… शायद उम्र का वो दौर ही कुछ ऐसा था कि न तुम्हें पता चला और न मुझे कि इस ख़ूबसूरत एहसास को प्यार कहते हैं.

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ग्यारह वर्ष बाद तुम्हें फिर देखा… स़फेद सलवार-सूट, लाल दुपट्टा, छोटी-सी बिंदी और सौम्य हंसी… सब कुछ मन को छूता, लुभाता हुआ. ख़ुश था कि तुम मेरी भाभी बनोगी. पहले कुछ संकोच लगा, क्योंकि इतने सालों बाद मिले थे, पर तुम्हारे अपनेपन ने सारी झिझक दूर कर दी.

तुम्हें किसी और की पत्नी बनना स्वीकार नहीं था, यह बात तुमने बेझिझक मुझसे कह दी थी. तब मैंने पूछा था, “क्या चाहती हो तुम?” तुम्हारे जवाब ने तो मेरी दुनिया ही बदल दी थी. “ये क्या कह रही हो तुम मीरा?”

“मेरी छोड़ो, तुम बताओ? बचपन में हर बार गर्मी की छुट्टियों में यहां भाग आते थे, क्या अपनी छोटी नानी के लिए? क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए कुछ भी नहीं था? क्यों यहां आते ही मुझे ढूंढ़ना शुरू कर देते थे? क्यों रात-रात तक जागकर मुझसे ढेर सारी बातें किया करते थे? क्यों हमेशा मेरे क़रीब रहने का बहाना तलाशते थे? तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी यही हाल था. जब तुम जाने लगते थे, तो रो पड़ती थी मैं और फिर अगली छुट्टियों का इंतज़ार करती थी कि कब आओगे और मेरी तन्हा-सी ज़िंदगी को गुलज़ार कर जाओगे.

जानती थी तुम छोटे थे मुझसे, मैं बड़ी हूं, पर तुम अच्छे लगते हो. तुमसे प्यार करती हूं. आज तुम मेरे पास हो, तो अब भी तुमसे अपने मन की बात न कहूं, तो क्या करूं? तुम बताओ, तुम क्या चाहते हो? क्या तुम भी मेरे लिए वही महसूस कर रहे हो, जो मैं तुम्हारे लिए करती आई हूं इतने सालों से?”

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फिर बचा ही क्या था कुछ कहने को… बस होंठों ने होंठों पर समर्पण की जब मुहर लगा दी, नहीं पता था कि संभव ही असंभव हो जाएगा.
तुम्हारा निर्णय व मेरी इच्छा जानकर घर में सूनामी ही आ गई.

…छी लड़की! होनेवाले देवर से ही इश्क़ लड़ा बैठी? घर में कोई भी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था.
कुछ दिन शांत रहने में ही मैंने भलाई समझी. फिर जब नौकरी जॉइन की, तो सोचा तुम्हें वहीं बुला लूंगा, लेकिन तुम तैयार नहीं थीं. तुम चाहती थीं कि मैं यह नौकरी छोड़कर वहीं कहीं आसपास ही काम ढूंढ़ लूं और तुम्हारे पास रहूं, इसलिए मैंने तुम्हें और इंतज़ार करने की सलाह दी.

पर क्या पता था कि इस बीच तुम्हारी शादी हो जाएगी… जब मुझे यह ख़बर मिली, तो टूट चुका था मैं. मामाजी की तेरहवीं में तुम्हें फिर देखा… माथे की बिंदी कुछ बड़ी हो गई थी, वह छरहरा संगमरमर-सा तराशा ख़ूबसूरत बदन काफ़ी भर गया था. बस, इतना ही पूछ पाया था, “कैसी हो, मीरा दीदी?” बोली थीं तुम, “मुझसे बात मत करो और मैं कब-से तुम्हारी दीदी हो गई?”

उस भीड़ में क्या स्पष्टीकरण देता? चलने लगा, तो तुम भी पीछे-पीछे बाहर तक आईं, तुम्हारी आंखों में आंसू थे. देखकर अपनी कायरता पर बहुत शर्म आई थी. अगर थोड़ी हिम्मत जुटाकर तुम्हारी शादी न होने देता, तो तुम और मैं एक होते. पर जो हो न सका, तुम्हारी तरह उसका मलाल मुझे भी है. हम दोनों अपने-अपने हालात से ही बंधे रहे, मुट्ठी की रेत की तरह सब फिसल गया.

“मैं तुम्हारी दीदी कब-से हो गई”, लगा तुम्हारे दिल में अब तक ज़िंदा हूं, तुम भी तो सदा मेरी पलकों पर रहती हो और ये कभी-कभी बहुत भीग भी जाती हैं.

– सूर्य कुमार सिंह

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