पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla...

पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

By Admin June 21, 2019 in Digital PR
Pahla Affair, Wo Ek Pal
पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

दिल क्यों बेचैन है, आंख नम है क्यूं… शायद दिल का कोई टांका उधड़ा है…

जाने क्यों ये पंक्तियां मेरे ज़ेहन में सरगोशी कर उठीं. शायद इसका कारण यही रहा होगा कि कोई ज़रूरी काग़ज़ात तलाश करते हुए मेरे हाथों में एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर लग गई, जिसमें ‘तुम’ भी हो. वही मनमोहक, चित्ताकर्षक मुस्कान, जो मेरी अंतर्मन की गहराइयों में उतर गई थी. मैं अतीत के गलियारे में उतरता चला जा रहा हूं. पीछे छूट रहा है वर्तमान. मेरी बुआजी के नए घर का शुभ मुहूर्त था कानपुर में. मैं सपरिवार शामिल होने पहुंचा. बुआजी ने मुझे घर की डेकोरेशन का काम सौंपा था, क्योंकि मैं इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कर रहा था. बस, यही एक काम मेरे दिल को लुभानेवाला था. मैंने अपनी समस्त इंद्रियां केंद्रित कर दी थीं, जान लगा दी थी इस काम को अंजाम देने में.

फंक्शनवाले दिन डेकोरेशन को देखकर सभी के मुंह से निकला ‘वाह’ शब्द मानो मुझे पुरस्कृत कर रहा था, लेकिन उसी गहमा गहमी में एक सुरीला कंठ मुझे झंकृत कर गया… ‘वाओ! क्या बात है?’ जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, तो बुआजी की छोटी बेटी यानी मेरी बहन गरिमा के पास एक ख़ूबसूरत परी-सी हल्के सांवले वर्णवाली लड़की खड़ी थी. वह लगातार कुछ कहे जा रही थी, मगर मेरी श्रवणशक्ति होशोहवास खो बैठी. मेरा दिल पहली बार किसी के लिए धड़का था. पहली नज़र में कोई इस क़दर भा जाए, यह पहला अनुभव था मेरा.

मेरी बहन ने डेकोरेशन का क्रेडिट मुझे देते हुए मेरा उससे परिचय करवाया. मैं अपलक उसे निहारता रहा. लेकिन जब गरिमा ने परिचय के दौरान यह कहा कि ‘तुम्हारी’ मंगनी हो चुकी है और एक हफ़्ते बाद ही तुम्हारी शादी है किसी एनआरआई से, तो मुझे झटका-सा लगा. तुम शादी करके इंग्लैंड चली जाओगी.

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यह भाग्य का कैसा क्रूर मज़ाक था कि एक क्षण पहले कुबेर का ख़ज़ाना सौंपकर अगले ही क्षण सारी ख़ुशियां छीन लीं. मेरे चेहरे पर एक के बाद एक कई रंग आकर चले गए. मैंने एक क्षीण मुस्कान के साथ उसे उज्ज्वल भविष्य की
शुभकामनाएं दीं.

मेरे पहले प्यार का ये कैसा अंजाम था? मैं बस ऊपरवाले से बार-बार यही सवाल कर रहा था. उस पर मेरी बदनसीबी का कटाक्ष देखिए, मुझे न स़िर्फ तुम्हारी शादी में शामिल होना पड़ा, बल्कि सारा डेकोरेशन का काम भी करना पड़ा. मेरे लिए यह मंज़र ही कहर बरपानेवाला था.

ख़ैर, मैं मन में एक टीस और ज़िंदगीभर के लिए नासूर लिए वापस अपने शहर आ गया. आज मैं शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा हूं, दो प्यारे बच्चे भी हैं, ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं, फिर भी दिल का एक कोना सूना-सा लगता है, मानो वो कोना रिक्त रह गया हो.
तुम जहां भी हो, ख़ुश रहो. तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि दुनिया में कोई ऐसा भी है, जो अपनी ज़िंदगी के उस एक पल की क़ीमत आज तक चुका रहा है, जिस पल उसने तुम्हें देखा था. लाख चाहकर भी मैं तुम्हें भूल नहीं पाया. मुहब्बत भी कभी इम्तिहान लेती है. तुम्हें तो शायद मैं याद भी नहीं और एक मैं हूं, जो तुम्हारी यादों को आज तक सीने में संजोए घूम रहा हूं.

मैं अपनी पत्नी से बेवफ़ाई भी नहीं कर रहा, क्योंकि तुम्हारी तो मैं इबादत करता हूं और मरते दम तक करता रहूंगा. तुम ख़ुश रहो, सलामत रहो, यही दुआ है. मुझे तुम्हारी कोई ख़बर तक नहीं, लेकिन यही यक़ीन है कि मेरी जो सांसें चल रही हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि तुम सलामत हो!

– कुलविन्दर वालिया

 

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