जिस दिन तुम टूटे औथे
उसी रात मैं भी बिखरी थी
बड़ी अंधियारी सी वो घड़ी थी
लोग कहते थे बड़ी सुनहरी थी
तब तुमने भी कुछ कहा होगा
कुछ मैंने भी तो कहा होगा
पर कुछ तो हुआ होगा ऐसा
दोनों ने कुछ भी न सुना होगा
न तुम ही बस सके
न मैं ही उजड़ सकी
आधे अधूरे तुम भी रहे
मैं भी कब पूरी हो सकी?
प्रेम अगन जाने कैसी थी यह
पूरी जो कभी जली ही नहीं
तुम धुआं बन बस उड़ते गए
लकड़ियों सी मैं भी सुलगती रही
सहसा यूं ही बस टूट जाना
सहज कहां था हम दोनों के लिए
शिल्प समेटने का सिखा ही नहीं
चलो टूट ही जाएं बिखरने के लिए
मुरझाया रेशा रेशा मेरे मन का
आंखें तुम्हारी भी तब पुरनम थीं
न तुम रोए जी भर जब हम बिछड़े
मैं भी बस छुप छुप सिसकी थी
सब हंसेंगे, सामने रोएं कैसे?
चुभेंगे सपने, अब सोएं भी कैसे
बड़ी कोशिशों से भूलें बहुत कुछ
शेष तुम्हारी स्मृतियों को भूलें भी कैसे?
– डॉ. राम प्रमोद मिश्र

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