“… ऐसा करिए मम्मा, आप पापा का जन्मदिन दादाजी वाले वृद्धाश्रम में मनाइए. मेरे स्कूल के फैमिली प्रोजेक्ट में मुझे अपने साथ उनकी भी फोटो लगानी है और आप भी फेसबुक पर वहां की फोटो लगा लीजिएगा.”
“शिवेन, इस बार आपके जन्मदिन पर कुछ अलग करते हैं.”
“अरे, अब इस उम्र में जन्मदिन क्या मनाना. तुम्हारा तो हर साल ही शुरू हो जाता है, कुछ अलग करते हैं. रात बारह बजे से ही केक काटने की तस्वीर फेसबुक पर डाल देती हो और मैं दूसरे दिन फोन पर लोगों की बधाई स्वीकार करते-करते परेशान हो जाता हूं.”
“तभी तो कह रही हूं इस बार कुछ अलग करते हैं. मैंने पूरी प्लानिंग कर ली है. इस बार हम वृद्धाश्रम में तुम्हारा जन्मदिन मनाएंगे. मैंने अपने भाई से भी बात कर ली है. वो हमारी तस्वीर लोकल न्यूज़ पेपर में प्रकाशित करवा देगा. फिर उसकी कटिंग डालूंगी फेसबुक पर.”
तभी पास खड़ा बेटा कहता है, “हां मम्मा तब तो बहुत मज़ा आएगा. मैं दादाजी से भी मिल लूंगा.”
“दादाजी! उनसे कैसे मिलोगे बेटा?”
“अभी तो आपने कहा आप वृद्धाश्रम जाओगे, दादाजी भी तो वही रहते होंगे.”
“अरे नहीं बेटा, दादाजी वहां नहीं रहते.”
“तो फिर कहां रहते हैं, हमने तो कितने दिनों से उन्हें देखा भी नहीं. ऐसा करिए मम्मा, आप पापा का जन्मदिन दादाजी वाले वृद्धाश्रम में मनाइए. मेरे स्कूल के फैमिली प्रोजेक्ट में मुझे अपने साथ उनकी भी फोटो लगानी है और आप भी फेसबुक पर वहां की फोटो लगा लीजिएगा.”
शिवेन के मन में बाबूजी, जन्मदिन, फैमिली ट्री, वृद्धाश्रम और फेसबुक सब गड्डमगड्ड हो रहे थे.
– पल्लवी विनोद

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