गुप्ताजी सैर पूरी करके लौट आए. मीनू की सैर उस दिन छूट गई.
उसने अगले दिन कार धोने वाले से कहा, “आधा घंटा देर से आ जाना.”
“नहीं हो सकेगा, दूसरी तरफ़ भी जाना है. देर से नहीं आ सकता.”
सेवानिवृत्ति के बाद मीनू और गुप्ताजी की सबसे बड़ी पूंजी है उनकी सुबह की सैर.
एक दिन बेटे ने सहज भाव से कहा, “मम्मी, कल सुबह कार धोने वाला आएगा. तीनों गाड़ियाँ साफ़ करेगा.”
“ठीक है.” मीनू ने मुस्कुराकर कहा.
अगली सुबह जैसे ही दोनों घूमने निकलने लगे, कार धोने वाला आ पहुंचा.
मीनू लौट आई. चाबियां, बाल्टी, वॉशिंग पाउडर, डस्टर निकालकर दिए. तभी नज़र कार के भीतर पड़ी. डॉ बेटे, बहू के लैपटॉप, चार्जर, ईयरबड्स, पावर बैंक और कई ज़रूरी सामान बिखरे पड़े थे. सब समेटकर भीतर रखा. फिर कार धुलने तक वहीं खड़ी रही.
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पैंतीस मिनट बीत गए. धूप चढ़ आई.
गुप्ताजी सैर पूरी करके लौट आए. मीनू की सैर उस दिन छूट गई.
उसने अगले दिन कार धोने वाले से कहा, “आधा घंटा देर से आ जाना.”
“नहीं हो सकेगा, दूसरी तरफ़ भी जाना है. देर से नहीं आ सकता.”
ऐसे ही तीन दिन और निकल गए. चौथे दिन मीनू ने कार धुलाई वाले को पैसे दे चलता किया.
शाम को बेटे ने पूछा, “मम्मी, कार धुलाई वाले को क्यों हटा दिया?”
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मीनू ने शांत लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा, “ख़ुद जल्दी उठो और जो चाहो करवाओ अपने बूते. मेरी सुबहें क़ीमती हैं.”
– नील मणि
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