कविता- पुल… (Poetry- Pul…)

कविता- पुल… (Poetry- Pul…)

शहर के कोने पर
बहती हुई उस छोटी सी
जलधारा पर बना वो पुल
जिस पर अनायास
आमने-सामने आ गए थे हम
शाम के धुंधलके में
पेड़ों के झुरमुटों भीतर
कूक उठा था कोई पंछी
साथी की तलाश में
बूढ़ा पुल भी अपनी जर्जरता भरी
उत्सुकता में प्रत्युत्तर की आस लगाए
दम साधे खड़ा था
बादल घिर आए थे पुल के ऊपर
आकाश में
बहती जलधार
कलकल के संगीत में
गुनगुना रही थी कोई गीत
पंछी के साथी ने चहक कर
प्रत्युत्तर दिया और उड़ गया
झुरमुट भीतर अपने साथी के पास
बूढ़ा पुल मुस्कुराने लगा
जलधार बहकने लगी
झुरमुट सरगोशियां करने लगे
किनारों को जोड़ने वाला एक पुल
बन रहा था कहीं दिलों के बीच
और भावनाओं की जलधार
बहने लगी थी दो किनारों के मध्य
प्रेम हौले से एक पुल बनकर
हमारे दिलों को एक कर रहा था…

डॉ. विनीता राहुरीकर

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Photo Courtesy: Freepik

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