आज का युवा प्रेम और विवाह को पहले की पीढ़ियों से अलग नज़रिए से देख रहा है. अब किसी एक व्यक्ति के साथ तुरंत गंभीर रिश्ते में बंधने की बजाय कई युवक-युवतियां पहले अलग-अलग लोगों को जानना, समझना और परखना चाहते हैं. इसी बदलती सोच से जन्मा है ‘रोस्टर डेटिंग’ का ट्रेंड. इसमें व्यक्ति एक ही समय में दो या उससे अधिक लोगों से डेटिंग करता है, ताकि अंततः वह अपने लिए सबसे उपयुक्त जीवनसाथी चुन सके.
पहली नज़र में यह तरीक़ा आधुनिक और व्यावहारिक लगता है, लेकिन इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण और भावनात्मक चुनौतियां भी छिपी हैं.
क्यों बढ़ रहा है रोस्टर डेटिंग का चलन?
डिजिटल युग ने रिश्तों की दुनिया पूरी तरह बदल दी है. सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स पर हज़ारों प्रोफाइल आसानी से उपलब्ध हैं. ऐसे में युवाओं को लगता है कि कहीं वे ज़ल्दबाज़ी में किसी एक रिश्ते में बंधकर बेहतर विकल्प न खो दें. यही ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ उन्हें लगातार नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है.
इसके अलावा कुछ लोग पहले के असफल रिश्तों, विश्वासघात या तलाक़ के अनुभवों के कारण दोबारा पूरी तरह किसी एक व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर पाते. इसलिए वे एक साथ कई लोगों से मिलते हैं, लेकिन किसी एक के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध होने से बचते हैं.
आत्मविश्वास या केवल मान्यता की तलाश?
जब कई लोग किसी व्यक्ति में रुचि दिखाते हैं तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है. लगातार मिलने वाले संदेश, कॉल और ध्यान से उसे अपना महत्व अधिक महसूस होता है. लेकिन यदि आत्मसम्मान केवल दूसरों की स्वीकृति पर आधारित हो तो यह लंबे समय में भावनात्मक अस्थिरता का कारण बन सकता है.
मनोविज्ञान में इसे ‘चॉइस ओवरलोड’ भी कहा जाता है. विकल्प जितने अधिक होते हैं, सही निर्णय लेना उतना ही कठिन हो जाता है. व्यक्ति लगातार तुलना करता रहता है और किसी भी रिश्ते से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाता.

क्या हैं इसके सकारात्मक पक्ष?
यदि रोस्टर डेटिंग पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ की जाए तो इससे व्यक्ति अलग-अलग स्वभाव और व्यक्तित्व वाले लोगों को समझ सकता है. इससे यह जानने में मदद मिलती है कि किसके साथ उसके विचार, जीवन मूल्य और भविष्य की योजनाएं सबसे अधिक मेल खाती हैं.
इस प्रक्रिया में यदि कोई रिश्ता आगे नहीं बढ़ता तो दोनों पक्ष पहले से जानते हैं कि वे अभी किसी के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं. इसलिए अलग होने पर भावनात्मक आघात अपेक्षाकृत कम हो सकता है.
रिश्तों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव
हर व्यक्ति के लिए यह तरीक़ा समान रूप से सफल नहीं होता. यदि पारदर्शिता न हो, तो सबसे पहले विश्वास प्रभावित होता है. यदि एक साथी स्वयं को विशेष संबंध में मानता हो और दूसरा समानांतर रूप से अन्य लोगों से भी मिल रहा हो तो विश्वास टूटना स्वाभाविक है.
एक साथ कई रिश्तों को संभालना भी आसान नहीं होता. अलग-अलग लोगों की अपेक्षाएं, बातचीत और भावनात्मक ज़िम्मेदारियां व्यक्ति को मानसिक रूप से थका देती हैं. कई लोग कुछ समय बाद भावनात्मक खालीपन महसूस करने लगते हैं.
सबसे बड़ी समस्या लगातार तुलना की है. कोई अधिक सफल लगता है, कोई अधिक संवेदनशील, तो कोई अधिक आकर्षक. यह तुलना किसी भी रिश्ते को गहराई तक विकसित नहीं होने देती.
परफेक्ट साथी की तलाश का भ्रम
वास्तविकता यह है कि चाहे विवाह अरेंज हो, लव मैरिज हो या रोस्टर डेटिंग के बाद किया गया हो, एक समय ऐसा अवश्य आता है जब मन में प्रश्न उठता है कि क्या मैंने सही व्यक्ति चुना है?
इसका कारण अक्सर ग़लत चुनाव नहीं, बल्कि अत्यधिक अपेक्षाएं होती हैं. इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है. जिसके पास समय है, उसके पास धन कम हो सकता है. जो अत्यंत रोमांटिक है, वह हमेशा भरोसेमंद हो, यह ज़रूरी नहीं. और जो पूरी तरह भरोसेमंद है, वह हर समय रोमांचक भी नहीं होगा.
स्वीकार्यता ही रिश्तों की असली नींव
सफल संबंध किसी परफेक्ट व्यक्ति को खोज लेने से नहीं बनते, बल्कि एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करने और साथ मिलकर रिश्ते को मज़बूत बनाने से बनते हैं. प्रेम का वास्तविक अर्थ केवल आकर्षण नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, संवाद और धैर्य है.
रोस्टर डेटिंग आधुनिक जीवनशैली की उपज है. यह कुछ लोगों के लिए सही जीवनसाथी चुनने का माध्यम हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह ईमानदारी, पारदर्शिता और भावनात्मक परिपक्वता पर निर्भर करती है. अंततः किसी भी रिश्ते की मज़बूती विकल्पों की संख्या से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास, समर्पण और स्वीकार्यता से तय होती है. कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, लेकिन दो अपूर्ण लोग यदि साथ मिलकर संबंध निभाने का संकल्प लें, तो वही रिश्ता सबसे सुंदर और सबसे स्थायी बन सकता है.
– वीरेंद्र बहादुर सिंह
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