हास्य व्यंग्य- कईसै तरै भवसागर (...

हास्य व्यंग्य- कईसै तरै भवसागर (सोशल मीडिया) नर… (Satire- Kaise Tarre Bhavsagar (Social Media) Nar…)

गुरुदेव! इस सोशल मीडिया रुपी माया का विस्तार तो इसके निर्माता भी नहीं जानते, तो मैं अल्प बुद्धि प्राणी क्या बताऊं? ऊपरी तौर पर समझ लीजिए यह आभासी माया इतनी प्रबल है कि ऐसे मनुष्यों को आपस में इकट्ठा कर बांध देती है, जो एक-दूसरे से ना कभी मिले, और ना ही कभी मिलेंगे, फिर भी उनके बीच राग, द्वेष, प्रेम, नफ़रत, ईर्ष्या, प्रशंसा, निंदा, तुलना जैसे विकारों के ऐसे प्रबल बंधन बन जाते हैं जैसे सांसारिक परिचितों, नाते-रिश्तेदारों के बीच भी नहीं बनते.

गुरु-शिष्य संवाद…

वत्स! माया क्या है?

गुरुदेव! जो अस्तित्व विहीन है, भ्रम है, आभासी है फिर भी सत्य प्रतीत होती है, वही माया है. यह मनुष्य की विवेक बुद्धि हर उसके मस्तिष्क पर स्वयं आरुढ़ हो जाती है और उसे संचालित करने लगती है. जब तक मनुष्य की आंखों पर माया आवरण रहता है, उसे ऐसी दुनिया नज़र आती है, जो वास्तव में है ही नहीं और वह उसी माया में उलझा एक दिन संसार से विदा ले लेता है.

वत्स! मुझे ऐसा क्यों लग रहा है तुम सोशल मीडिया की बात कर रहे हो?

आप तो सच में अंतर्यामी हैं प्रभु! इस माया का दूसरा नाम सोशल मीडिया भी है.

वत्स! इस माया का कैसा स्वरूप है, कैसा विस्तार है, जरा बखान करो?

गुरुदेव! इस सोशल मीडिया रुपी माया का विस्तार तो इसके निर्माता भी नहीं जानते, तो मैं अल्प बुद्धि प्राणी क्या बताऊं? ऊपरी तौर पर समझ लीजिए यह आभासी माया इतनी प्रबल है कि ऐसे मनुष्यों को आपस में इकट्ठा कर बांध देती है, जो एक-दूसरे से ना कभी मिले, और ना ही कभी मिलेंगे, फिर भी उनके बीच राग, द्वेष, प्रेम, नफ़रत, ईर्ष्या, प्रशंसा, निंदा, तुलना जैसे विकारों के ऐसे प्रबल बंधन बन जाते हैं जैसे सांसारिक परिचितों, नाते-रिश्तेदारों के बीच भी नहीं बनते. फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर जैसी ऐप इस माया की मोहिनी अप्सराएं हैं, जो अपने आकर्षण से लोगों को ऐसे बांध लेती हैं जैसे अजगर अपनी पकड़ में आए प्राणी को लपेट लेता है और फिर वह कभी मुक्त नहीं हो पाता.

वत्स! इस सोशल मीडिया रुपी मायावी आभासी संसार में कर्म सिद्धांत कैसे हैं, कर्म बंधन कैसे बनते हैं?

गुरुदेव, यहां का अपना कर्म सिद्धांत है, जो कर्मों के लेन-देन के आधार पर ही चलता है. यहां कर्मों का लेन-देन कमेंट और लाइक द्वारा होता है. उन्हीं के आदान-प्रदान से बंधन तैयार होते हैं. एक मनुष्य की पोस्ट पर जब दूसरा मनुष्य लाइक या कमेंट करके चला जाता है, तो एक बंधन तैयार होता है. दूसरा इस बंधन से तभी मुक्त हो सकता है, जब वह पलट कर उसी मनुष्य की पोस्ट पर लाइक और कमेंट करे. जब तक वह ऐसा नहीं करता उस पर ऋण चढ़ा रहता है, जो उसके बंधन का कारण बनता है.

ऐसे बंधनों के कुचक्र में फंसने का मूल कारण क्या है वत्स? क्या धन?

नहीं गुरुदेव! इसका कारण है- मान. मनुष्य अपनी पोस्ट पर मिले लाइक और कमेंट को अपनी मान-प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं. उसकी तुलना दूसरों को मिले लाइक-कमेंट से करते हैं. और इसी तुलना रूपी कीचड़ में ईर्ष्या, द्वेष, निंदा रूपी कमल खिलते हैं.

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वत्स! यह तो बड़ी विचित्र माया लग रही है, इसके बारे में कुछ और जानकारी दो.

गुरुदेव! इस माया की ऐसी महिमा है कि इसने बहुत-सी आध्यात्मिक परिभाषाएं बदल दी हैं.

वत्स! कुछ उदाहरण देकर समझाओ.

जी गुरुदेव! जैसे-
ज्ञानी- सोशल मीडिया के सभी संसाधनों के प्रयोग का ज्ञाता, फॉलोअर्स बनाने की कला में दक्ष, कम संसाधनों में भी अच्छी सेल्फी लेने में सिद्धहस्त ही ज्ञानी है.
अज्ञानी- जो आज के समय में भी सोशल मीडिया का उपयोग करना नहीं जानता वही अज्ञानी है.
विद्या- हर वो गुण, कला जिसका प्रदर्शन सोशल मीडिया पर हो सकता वह विद्या है.
अविद्या- जिस गुण-कला का प्रदर्शन सोशल मीडिया पर न हो सके, वह चाहे कितनी ही सार्थक और मनोहारी क्यों न हो, अविद्या है.
धनी- जिसके जितने फॉलोअर्स, वह उतना ही धनी है.
निर्धन- इस आभासी संसार में फॉलोअर्स रहित मनुष्य निर्धन है.
निर्भय- जो दूसरों की पोस्ट पर जाकर बिना किसी भय के कमेंट में उनकी ऐसी-तैसी कर आए, वह निर्भय है.
भीरू- जो अपना प्रोफाइल लॉक करके रखे वह भीरू है.
सच्चा मित्र- जो आपकी हर पोस्ट पर सहर्ष लाइक-कमेंट करके जाए वही आपका सच्चा मित्र है.
शत्रु- जो आपकी पोस्ट पर मन मुताबिक़ प्रतिक्रिया न दे वह आपका शत्रु है.
संयमी- जो तभी कोई पोस्ट लिखे, जब उसके पास कहने को कुछ सार्थक हो, वह संयमी है.
चंचल प्रकृति- जो दिन में जब-तब, कभी भी, कुछ भी निरर्थक सामग्री लेकर वॉल पर प्रकट हो जाए, वह चंचल प्रकृति मनुष्य है.

ये तो बड़ी विचित्र माया है वत्स! इससे निकलने का कोई उपाय?

गुरुदेव! अभी तक मनुष्य ने उस उपाय की खोज नहीं की है, क्योंकि जो उपाय खोजने गया वह भी उसी भवसागर में डूब गया.

इसका अर्थ यह है कि यह शुभ कार्य हमारे ही हाथों होना है. ऐसा करो वत्स! सोशल मीडिया की सारी ऐप्स पर हमारा भी अकाउंट बनाओ. भवसागर में उतरने पर ही उससे पार जाने के रास्ते मिलते हैं.

मगर गुरुदेव यह बरमुडा ट्रायंगल से भी ख़तरनाक भवसागर है, जो इसके आसपास से भी गुज़रा, उसे यह खींच लेता है और अंततः डूबो देता है.

वत्स! क्या तुम हमारे जैसे सिद्ध पुरुष के आत्मबल पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हो? संसार की ऐसी कोई माया मोहिनी नहीं, जो हमें बांध सके. तुम निश्चिंत हो कर आदेश का पालन करो.

जो आज्ञा गुरुदेव!

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वह दिन था और आज का दिन, गुरुदेव आज भी सोशल मीडिया रूपी भवसागर में डुबकियां लगा रहे हैं, लेकिन उसके पार नहीं जा पा रहें हैं…

दीप्ति मित्तल

Photo Courtesy: Freepik

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