व्यंग्य- काला क़ानून बनाम सफ़ेद ...

व्यंग्य- काला क़ानून बनाम सफ़ेद क़ानून (Satire- Kala Kanoon Banam Safed Kanoon)

सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो…


म्हारे समझ में कती न आ रहो अक कृषि क़ानून इब कूण से कलर का है! अभी हफ़्ता पाच्छे सरकार की नज़र में यू क़ानून घणा दुधारू हुआ करता हा! पर किसानन कू समझाने में सब फेल हुए! ता फेर, देश हित में दरबारश्री ने दुधारू से अचानक बांझ नज़र आने लगे तीनों क़ानून कू वापस ले लिया! (बेलाग होकर कहें तो ये फ़ैसला बड़ी हिम्मत और जोख़िम भरा था! जिसने दरबारश्री के समर्थकों और विरोधिओ को सकते में डाल दिया है)
विपक्ष और विरोधिओं को किसी करवट चैन नहीं मिलता. अब विपक्षी सवाल उठा रहे हैं कि सैकड़ों किसानों की बलि लेने के बाद ही सरकार को कृषि क़ानून का नुक़सान क्यों नज़र आया. उसके पहले यही क़ानून किसानों को मालामाल करता हुआ नज़र रहा था. सरकार किसानों को मंहगाई, मंदी और लुटेरों की मंडी से बचाकर आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी, लेकिन किसानों को फ़ायदा ही नहीं रास आ रहा था. कमाल है, बौद्धिक चैतन्यता का बड़ा अजीब दौर आ चुका है- लोग अपना फ़ायदा ही नहीं चाहते. जिस नए क़ानून से देश के किसान गुफ़ा युग से निकल कर सीधे विश्व गुरु होनेवाले थे, उसके ही ख़िलाफ़ सड़क पर बैठ गए. विपक्षी दलों ने तीनों क्रान्तिकारी कृषि क़ानूनों के विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम में घुन ढूंढ़ना शुरु कर दिया. ये हस्तिनापुर की सत्ता के ख़िलाफ़ संयुक्त कौरव दलों का सरासर विद्रोह था. फिर भी दरबारश्री के ज्ञानी मंत्री और चारण अज्ञानी किसानों से तमसो मा ज्योतिर्गमय की उम्मीद लगाए बैठे थे.


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सोशल मीडिया के सूरमाओं ने आंख और अक्ल दोनों पर गांधारी पट्टी बांध ली थी. ऐसा करने से बुद्धि और विवेक का सारा लावा  ज्वालामुखी की शक्ल में श्रीमुख से बाहर आ रहा था. इन जीवों की अपनी कोई विचारधारा आत्मचिंतन के अधीन नहीं थी. इन्हें अधीनता और ग़ुलामी से इतनी नफ़रत थी कि उन्होंने आज़ादी की एक नई तारीख़ ही ढूंढ़ कर निकाल ली. इन प्रचण्ड वीर समर्थकों के कलम और कलाम दोनों से फेसबुक पर लावा फैल रहा था. अब उन सभी वीर पुरुषों की अक्षौहिणी सेना औंधे मुंह पड़ी है. कलम कुंद है और गला अवरुद्ध. अंदर से आग की जगह आह निकल रही है- ये क्या हुआ… कैसे हुआ.. क्यों हुआ?.. छोड़ों ये न पूछो…
लेकिन लोग चुटकी लेने से कहां बाज आते हैं. तरह-तरह के तीर सोशल मीडिया पर उड़ रहे हैं.
‘अगला आत्म ज्ञान कब प्राप्त होगा’… मूर्खों को ज्ञान देने का जोख़िम कौन उठाए. बुज़ुर्गों की सलाह तो यह है कि बेवकूफ़ों के मुहल्ले में अक्लमंद होने की मूर्खता नहीं करना चाहिए, वरना अकेले पड़ जाने का ख़तरा है.
दरबारश्री कभी भी कोई कदम ऐसा नहीं उठाते, जो नौ रत्नों के विमर्श और सहमति के बगैर हो. बड़े सियासी योद्धा और ज्योतिषाचार्य इस फ़ैसले के पीछे का लक्ष्य ढूंढ़ रहे हैं. विपक्ष सामूहिक ख़ुशी मनाने की बजाय सामूहिक चिंतन शिविर में बैठ गया है.
मगर भक्त सदमे में हैं. अनुप्राश अलंकार जैसी स्थिति है- नारी बीच साड़ी है या साड़ी बीच नारी है?.. कन्फ्यूजन गहरा गया है. विषम परिस्थिति है. गांडीव भारी हो गया है. सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो… क्रोध में गाली देने का जी करता है रे बाबा…
मित्रों में वर्माजी सांड की तरह फुफकार रहे हैं. निरस्त हुए कृषि क़ानून की दुधारू उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कह रहे हैं, “क़ानून को वापस लेने से मुझे तो कुछ ऐसा फील हो रहा है जैसे आलू की फसल को पाला मार गया. देश हित में लाए गए तीनों कृषि क़ानून खेत और किसानों को नई दशा और दिशा देते. अब तो सब कुछ दिशाहीन हो जाएगा…”
मैंने पूछने का दुस्साहस किया, “आपको खेती किसानी का बहुत नॉलेज है. गांव में खेती होती होगी ना?”
वो आगबबूला होकर बोले, “भैंस का दूध सेहत के लिए फ़ायदेमंद होता है या नुक़सानदेह, ये जानने के लिए भैंस ख़रीदने की ज़रूरत नहीं होती मूर्ख.”
चौधरी कन्फ्यूजन में है. वो अभी तक फ़ैसला नहीं कर पाया कि उसे ख़ुश होना चाहिए या नाराज़. कल मुझसे पूछ रहा था, “उरे कू सुण भारती, इब क़ानून कूण से रंग कौ हो गयो?”


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“कौन-सा क़ानून? सभी क़ानून एक जैसे ही हैं.”
“घणा वकीड़ मत नै बण. मैं किसान वाड़े क़ानून कौ बात करूं सूं. पहले तो घणा दुधारू बताया हा, इब के हुआ. किसने दूध में नींबू गेर दई. इब घी न लिकड़ता दीखे कती. इब और कितनी दुधारू योजना ते मक्खी लिकाड़ी ज्यांगी?”
मेरे पास तो नहीं है, किसी बुद्धिजीवी के धौरे जवाब हो तो दे दे…
                                            
– सुलतान भारती

Satire

Photo Courtesy: Freepik
        
   

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