व्यंग्य- शादी का एल्बम (Satire S...

व्यंग्य- शादी का एल्बम (Satire Story- Shadi Ka Albam)

मेहराजी शादी की एल्बम और वीडियो फिल्म न बनने से काफ़ी ख़ुश हैं. उनका निजी अनुभव है कि जब-जब उन्होंने किसी की शादी की वीडियो देखी है, उनकी तबीयत ख़राब हो गई है. कारण क्या है यह तो उन्हें भी नहीं पता. कई बार तो पूरी वीडियो देखने के चक्कर में उन्हें इतने चक्कर आए कि डाॅक्टर को दिखाने तक जाना पड़ा.

ज़माना कितना बदल गया है, आजकल के बच्चे (हमारी निगाह में बच्चे ही हैं, भले उनकी शादी तय हो गई है और दो-तीन साल में ऊपरवाले ने चाहा, तो बच्चे उनकी गोद में खेल रहे होंगे) न जाने क्या-क्या शेयर करते हैं. कहां-कहां शेयर करते हैं. मुझे तो लगता है आजकल शादी बाद में होती है!
क्या करूं नहीं चाहता यह सब लिखना, लेकिन न लिखूं, तो मुझे पढ़ेगा कौन, पब्लिक मुझे आउटडेटेड ट्रीट करने लगेगी. एक राइटर को सब कुछ पसंद है, बस एक आदमी या किसी आंटी की तरह उसे बूढ़ा आंटी या आउटडेटेड कहे जाना बिल्कुल पसंद नहीं है.
जैसे कि आजकल की शादी में दूल्हे-दुल्हन के मां-पिता को देखकर शक हो जाता है कि असली हैं या किराए के. कारण यह कि उनके चेहरे, चाल-ढाल (नोट- चाल-ढाल लिख रहा हूं, इसे चाल-चलन मत पढ़िएगा, वरना बच्चे अपने सीनियर्स के कैरेक्टर पर शक करने लगेंगे), कपड़े-लत्ते देख विश्वास ही नहीं होता कि इनके बच्चे इतने बड़े हो गए कि शादी हो रही है.
बाकी रही-सही कसर ये ब्यूटीपार्लरवाले पूरी कर देते हैं. आजकल ब्यूटीपार्लर पर लिखा होता है कि यूनिसेक्स. हमारे ज़माने में नाई की दुकान होती थी, जिसे हमारे दादाजी हज्जाम कहते थे. वह भी उनसे इतना डरता था कि पता चले हजामत बनवानी है, तो कंघी-कैंची ले के घर आ जाता. उसके बाद भी शीशा दिखाने से घबराता था कि न जाने कितने डांट पड़ जाए. और अगर वो कटिंग देखकर मुस्कुरा देते, तो उसे लगता आज का दिन बढ़िया है.
ब्यूटीपार्लर का काॅन्सेप्ट तो फिल्मों में दिखाई देता था, वह भी जिसे माडर्न दिखाना होता था. वैसे हक़ीक़त यह है कि उस ज़माने की एक्ट्रेस और आज किसी मुहल्ले के ब्यूटीपार्लर से निकाल रहे सामान्य कैरेक्टर का आमना-सामना हो जाए, तो यक़ीन मानिए बड़ी-बड़ी एक्ट्रेसेस हार जाएं, निराश हो जाएं. वैसे ही आजकल इंस्टा के ट्रेंड में पोस्ट हुई फोटो देखकर, तो पुरानी एक्ट्रेसेस का हार्ट फेल हो जाएगा. उन्हें लगेगा उस ज़माने में तो कोई कंपटीशन ही नहीं था.
वैसे जिसे हम तब की वाइम्प समझकर पूरी फिल्म देखने जाते थे, आजकल उससे ज़्यादा ग्लैमर से भरे साॅन्ग, तो फिल्म के टीजर में यूट्यूब पर लोड हो जाता है. आजकल के बच्चे कहते हैं, “ओह पापा, ये ओल्ड साॅन्गस मत बजाया करिए दहशत हो जाती है.
‘देखा उसे तो सामने रुखसार नम भी था, वल्लाह उसके दिल में एहसास-ए-ग़म भी था.. थे उसकी हसरतों के ख़ज़ाने लुटे हुए, डूबी हुई थी फिर भी वफ़ाओं के रंग में… पता नहीं क्या-क्या हमें तो कुछ समझ ही नहीं आता कि ये कह क्या रहा है, सिरदर्द और हो जाता है.”

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आपसे क्या बताऊ ये सिरदर्द बड़ी ग़ज़ब चीज़ है. कहते हैं दर्दे शर (सीने का दर्द) होता है, शादी से पहले और दर्दे सिर शादी के बाद. यह सब तो शायराना और ख़्वाबों ख़्यालों की बाते हैं. मुद्दा है शादी के एल्बम का, जिसके चलते आज तक मेरे दोस्त मेहराजी अपनी लाइफ में भाभीजी से ताने सुनते हैं और महीने-दो महीने इस मुद्दे पर लड़ाई के एक-दो एपिसोड देखने को मिल ही जाते हैं.
हुआ कुछ यूं कि मेहराजी ठहरे अल्हड़ बेवकूफ़ क़िस्म के आदमी (वैसे ज़्यादातर मर्द ऐसे ही होते हैं, यह राज़ की बात मैं बताना नहीं चाहता था, पर अनजाने ही लिख गया हूं. हो सकता है मेरे दोस्त मुझसे नाराज़ हो जाएं, पर कोई बात नहीं. अब तो काफ़ी उम्र हो गई है. क्या फ़र्क़ पड़ता है. वैसे भी जब यहां से जाऊंगा, तो साथ क्या जाएगा. सो सोचता हूं, दोस्तो में थोड़ा बुरा बन भी गया तो क्या?
अब सोचकर देखिए आज के ज़माने को जहां 64 मेगापिक्सल, एक से एक अड्वान्स फीचरवाले कैमरे हैं मोबाइल में, से कम के मोबाइल से तो फियानसी की फोटो लेने पर सगाई टूट जाती है और शादी से पहले जो लड़का प्री-वेडिंग शूट नहीं कराता, उससे कोई लड़की शादी को राजी ही नहीं होती.
बाकी की कहानी मुझे नहीं पता यह भी किसी तरह ब्लाग या चोरी-छिपे बच्चों की गॉसिप सुन के समझ पाया हूं और लिख इसलिए रहा हूं कि आजकल मैगजीन बच्चे पढ़ते ही नहीं. वे तो अपने मम्मी पापा को गिफ्ट कर देते हैं, सो मुझे लगा की मेरे ये इन्फार्मेशन ग्रूम्स के डैड का नाॅलेज तो ज़रूर बढ़ाएगी और वो अपने बच्चों का प्री l-वेडिंग शूट अलाऊ कर देंगे. वो ये नहीं सोचेंगे की हमारे ज़माने में तो एक-दूसरे को देखना भी मना था. चिट्ठी-पत्री भी बुरी निगाह से देखी जाती थी. आज की तरह नहीं की मोबाइल पर लगे हैं रात-दिन.

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एनी वे मेहराजी ने अपने अल्हड़पने में शादी की वीडियो फिल्म ही नहीं बनवाई. उस ज़माने में वीडियो बनवाना आसान काम नहीं था. काफ़ी ख़र्चा आता था और मेहराजी के बाबूजी ने उन्हें घुड़क क्या दिया, वे तो शादी की फोटोग्राफी भी भूल गए. वह तो भला हो उनके एक दोस्त का, जो अमेच्योर फोटोग्राफी सीख रहा था अपने शौक से और उसने उस ज़माने के फेमस कैमरे निकान से उनकी कुछ फोटो निकाल दी, वरना ज़िंदगीभर मेहराजी अपने शादी का प्रूफ़ ढूंढ़ते रह जाते, जैसे सर्फ एक्सेल के प्रयोग के बाद कपड़े में दाग़. यह अलग बात है कि उस ज़माने की शादियां बिना गवाह, फोटो और प्री-वेडिंग शूट के भी स्टेबिल हैं और आज की शादियां ढेर सारे प्रूफ़, हैपी मैरिड लाइफ के क्लोजअप फोटो और फेसबुक, इंस्टा पर पोस्ट के बाद भी झटके खा रही हैं.
मामला बड़ा सेंटीमेंटल है, उस ज़माने में ब्यूटीपार्लर बड़े मुश्किल से मिलते थे. मेहंदी भी ख़ास मौक़े पर पूरे हाथ में सजाई जाती थी. लाल जोड़े की ख़ूबसूरती में दिखनेवाला चेहरा भी वाक़ई असली गुलाबी होता था. आज की तरह नहीं कि सुबह मेकअप धुला और दूल्हे ने दुल्हन बदल जाने की शिकायत के बारे में एफआईआर लिखाने की योजना बना डाली. यह अलग बात है कि आज पुलिसवाला पहले दूल्हे को ही समझाता है कि बेटा सम्हल जाओ कहीं दुल्हन ने यही शिकायत करा दी, तो तुम सपरिवार बिना जमानत के पांच साल के लिए भीतर हो जाओगे. कोई बचा नहीं पाएगा और जब वह लुटा-पिटा घर वापस लौटता है, तो दुल्हन मुस्कुराते हुए पूछती है, “क्या हुआ आज भी सुबह माॅर्निंग वाॅक पर गए थे. कुछ दिन घर से बाहर मत निकालो वरना दोस्त मज़ाक बनाएंगे, वैसे किस-किस से मिल आए.” और वह बेचारा अचानक सुर बदल देता है, “अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं मैं देख रहा था मम्मी-पापा उठे कि नहीं.”
वह उसके झूठ का लाज उसी वक़्त रख लेती है.
“अरे, मुझसे पूछ लेते. अभी तो मैं दोनों के पैर छू के आशीर्वाद ले कर आई हूं.” वह ख़ुश हो जाता है कि चलो इसने संस्कार तो अच्छे पाए हैं. मम्मी-पापा ख़ुश रहे और क्या चाहिए.

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भाईसाहब आप उस ज़माने यानी कि मेरे ज़माने में दुल्हन के सेंटिमेंट्स समझिए. कसम से एक लड़की शादी के दिन जितनी सुंदर लगती है, उतनी सुंदर वो लाइफ में फिर रेयर ही नज़र आती है. और आजकल का ज़माना तो था नहीं कि मोबाइल से दोस्तों ने ढेर सारी फोटोज़ निकाल ली या किसी ने एप्पल से फोटो खींचकर शेयर कर दी. उस ज़माने में तो जो कुछ था वह फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर ही था. उस रात उस दिन अगर फोटो खींच गई, वीडियो बन गई, तो बन गई, वरना गई भैंस पानी में.
क्या बताएं मेहराजीवाली भाभीजी ने कितनी मुश्किल से अपनी लाज बचाई है अपनी सहेलियों बीच. उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि बहन क्या बताऊं उस दिन तो मैं इतनी सुंदर लगी थी कि आसमान में बैठी परियों ने नज़र लगा दी और वीडियो फिल्म की रील ही ख़राब हो गई. रहा फोटोग्राफर, तो उसके भाई को भी उसी दिन बीमार होना था, वह तो भला हो इनके दोस्त का, जिसकी बदौलत यह फोटो मिल गई, वरना अपनी शादी तो बिना फोटो के रह जाती. हां, यह देखो मैंने अलग से अपने सहेली के भाई को बोल के बनवा ली थी, कैसी लग रही हूं. और कसम से वो स्टूडियोवाली फोटो उन्होंने अपने बेडरूम और ड्राॅइंगरूम में लगा रखी है. इसके विपरीत मेहराजी बेचारे एकदम उदासीन जीवन के प्रतिरूप से उनके बगल में विराजमान हैं. कलर फोटो में भी ब्लैक एंड व्हाइट से, उस ज़माने की सच्चाई को बयान करते हुए. कारण यह की जिस तरह कोई दुल्हन अपनी शादी के दिन सबसे ख़ूबसूरत नज़र आती है, ठीक वैसे ही कोई लड़का अपने शादी के दिन सबसे नर्वस नज़र आता है अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के मज़ाक के चलते. वो उसे याद दिलाते रहते हैं कि बेटा हंस लो, क्योंकि यह तुम्हारी आज़ादी का आज आख़िरी दिन है. कल से तुम हंसना-बोलना सब भूल जाओगे. वह तो बस, इस ख़्याल में डूबा रहता है कि भगवान जाने कल से कौन-सा मुसीबत का पहाड़ उस पर टूटनेवाला है. ऐसे में जब वह हंसने की कोशिश करता है या मुस्कुराता है, तो चेहरे पर अजीब से भाव उभरते हैं, जो हंसने तो नहीं रोने के काफ़ी क़रीब होते हैं.
वैसे हक़ीक़त यह है कि मेहराजी शादी की एल्बम और वीडियो फिल्म न बनने से काफ़ी ख़ुश हैं. उनका निजी अनुभव है कि जब-जब उन्होंने किसी की शादी की वीडियो देखी है, उनकी तबीयत ख़राब हो गई है. कारण क्या है यह तो उन्हें भी नहीं पता. कई बार तो पूरी वीडियो देखने के चक्कर में उन्हें इतने चक्कर आए कि डाॅक्टर को दिखाने तक जाना पड़ा. यहां तक कि अब तो डाॅक्टर ने उन्हें और घरवालो को सलाह तक दे रखी है कि इन्हें शादी-ब्याह में ले जाइए, तो बस बारह बजे तक ही रखिए. फेरे-वेरे मत देखने दीजिए. और हां, भूलकर भी किसी की शादी की एल्बम या वीडियो मत दिखाइए. यहां तक कि मेहराजी जब फिल्म देखने जाते हैं, तो शादी का सीन आने से पहले ही बाहर निकलकर चाय-काॅफी या दिल को ठंडक देने के लिए कोल्ड ड्रिंक्स पीने लगते हैं. भाभीजी तो इतना डर गई हैं कि उन्होंने शादी की फोटो तक छुपा के रख दी है. और कहीं भी जाती हैं, तो घूमने-फिरने की लेटेस्ट फोटो ही देखती हैं. कहीं कोई शादी की एल्बम दिखाने या वीडियो की बात करे, तो बिना चाय पिए ही चलने की ज़िद करने लगती हैं. वैसे यक़ीन मानिए, जब से भाभीजी ने यह टोटका अपनाया है, मेहराजी को कोई चक्कर नहीं आया है. वैसे मैं ऐसे मम्मी-पापा को बस यही कहना चाहता हूं कि भावनाओं को समझें. जिस प्रकार जो डाॅक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाते, वे अपनी अधूरी हसरते अपने बच्चों की आंखों और पढ़ाई में देखते हैं. वैसे ही जिनकी शादी के वक़्त की जो हसरते बाकी रह गई हैं, वे अपने बच्चों की शादी में सज-संवर कर फोटो शूट करा कर या घूम-फिर कर पूरी कर लें, क्योंकि ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा! हां, मेहराजी जैसे लोगों के लिए भाभीजी की शिकायत दूर करने का यह सुनहरा मौक़ा है. कुछ नहीं, तो एक बार शादी के सिंघासन पर चुपके से भाभीजी के साथ बैठ जाएं और वीडियो बनवा लें. हां, इस मामले में सावधानी रखना आपकी ज़िम्मेदारी है. कोई भी भूल-चूक और ग़लती का ज़िम्मेदार मैं नहीं हूं!

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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