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कहानी- आख़िर अब तक क्यों?.. (Short Story- Aakhir Ab Tak Kyon?)

बॉस संकेत समझ गए थे. उनका चेहरा तमतमा-सा गया था. होंठों की बुदबुदाहट से साफ़ लग रहा था कि वे मन ही मन शुभा के लिए कोई अश्लील-सी गाली बक रहे हैं. औरत के ख़िलाफ़ कितना विषाक्त वातावरण है ऑफिसों में, जबकि कहा रोज़ जाता है कि अधिकार समान हैं, अवसर समान हैं, सम्मान समान है, क्या समान है? हर जगह तो पुरुष तानाशाह नज़र आ रहा है.

बस स्टॉप पर बुरी तरह खीझी और झल्लाई शुभा बस का इंतजार कर रही थी… इंतज़ार? अब तक वह इंतज़ार ही तो करती रही है. इन अट्ठाइस सालों में उसने और किया ही क्या है? पंद्रह-सोलह साल की उम्र से लेकर इस उम्र तक इंतज़ार किया है- बस इंतजार… पता नहीं बस को क्या हुआ? कहां रुकी रह गई? क्या गड़बड़ी हो गई उसमें कि वह अब तक आई ही नहीं कि बैठ कर वह निश्चिंत हो अपनी जीवन यात्रा चैन और सुकून से तय कर ले? तब से अब तक उसे लगता रहा कि कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा, स्थितियां संभल जाएंगी. सब कुछ ठीक हो जाएगा. कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई तो होगा ही, जिसे ईश्वर ने उसके लिए पैदा किया होगा… वह एक दिन घोड़े पर बैठकर ज़रूर उसके दरवाज़े पर आएगा और वह उसके गले में वरमाला डालेगी… लेकिन पंद्रह-सोलह की कच्ची उम्र से लेकर अब तक वह सपनों का राजकुमार दरवाज़े पर नहीं आया.
पंद्रह-सोलह साल की कच्ची उम्र से लेकर पच्चीस-छब्बीस तक उसकी आशा बनी रही, लेकिन फिर उसका धीरज चुकने लगा… बारंबार होती अपनी नुमाइश से उसे बुरी तरह चिढ़ और खीझ होने लगी… ईश्वर उसके प्रति इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? क्या पुरुषों से भरी इस धरती पर उसके लिए कोई पुरुष नहीं बना है? वह यूं ही रह जाएगी कुंआरी? घबराहट के कारण उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा और वह गालों पर तपन अनुभव करने लगी, उसकी मित्र लेडी डॉक्टर ने इस मनोदशा में एक बार उसका ब्लड प्रेशर नापा था. बढ़ा हुआ निकला था… शांत रहने की हिदायत दी थी उसने.
शांत..? पर सुख, चैन या शांति क्या सिर्फ़ घर, बाहर और दफ़्तर भर में ही महसूस की जा सकती है? नहीं, कतई नहीं, वह सब तो व्यक्ति के भीतर होनी चाहिए. मन में, मस्तिष्क में, दिल में. अगर वहां नहीं है, तो बाहर की सुख-शांति उसके लिए निरर्थक होती है. बाहर सब कुछ शांत हो और भीतर हाहाकार हो, कुहराम मचा हुआ हो तो..?
डॉक्टर सहेली रमा ने ही उसे बताया था, "अब ज़्यादा देर ठीक नहीं है. जल्दी से किसी के गले में वरमाला डाल, अट्ठाइसवां चल रहा है. फिर उन्तीस, तीस और तीस के बाद तो औरत में सब कुछ ख़त्म होने का सिलसिला शुरू हो जाता है. बच्चे पैदा करने की सही उम्र तो पच्चीस और तीस के बीच ही होती है. उसके बाद तो मां बनना औरत के लिए ख़तरनाक भी हो सकता है."
सुनते ही नए सिरे से उसका दिल धड़कने लगा था. ज़रूर ब्लड प्रेशर फिर बढ़ने लगा होगा. कपोल तपने लगे. चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक उठीं और सांसों की गति तीव्र हो उठी. गहरी सांस ले ख़ुद को सहज करने की कोशिश की शुभा ने. सहसा उसका ध्यान स्टॉप पर उन छोकरियों
पर गया, जो धौल धप्प करती हुई उन्मुक्त चिड़ियों की तरह चहकती-किलोलें करती हुई दीन-दुनिया और बाहर के भयावह समाज व उसके नियम-विधानों से बिल्कुल बेख़बर थीं.

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कभी शुभा भी इनकी तरह बेख़ौफ़ और बेपरवाह थी, इन्हीं की तरह चहकती, चमकती और खिलखिलाती हुई, पर अब…?
मनोविज्ञान में एम.ए. किया था. नौकरी के लिए कई दफ़्तरों में भटकी, लेकिन हर जगह एक ही बात… एम.ए. के अलावा और क्या किया है? यानी? अलावा का मतलब?.. एक मुंहफट बॉस ने तो यहां तक कह दिया, "हम आपको नौकरी दें, तो बदले में हमें क्या मिलेगा?" ग़ुस्सा तो इतना आया कि मेज पर रखा पेपरवेट उसकी गंजी खोपड़ी में मार दे.
महीनों की दौड़-धूप के बाद उसे नौकरी मिली, तो मम्मी-पापा निश्चिंत से हो गए हैं, भाग्य भरोसे बैठे हैं. जब लिखा होगा, लड़का मिल जाएगा और शादी हो जाएगी. ऊपर वाले के यहां देर है, अंधेर नहीं. पहले जब वह एम.ए. कर रही थी और पड़ोस की लड़कियों व सहेलियों की शादियों के कार्ड लगातार आ रहे थे, तो मां-बाप भी कुछ चिंतित-परेशान रहने लगे थे. नाते-रिश्तेदारों से लगातार पत्र व्यवहार कर रहे थे कि शुभा के लिए कोई लड़का बताएं. हमें ज़्यादा अच्छे लड़के की दरकार नहीं है, बस खाता-कमाता हो, अपने पांवों पर खड़ा हो, जिससे मेरी शुभा को रोटी-कपड़े की तकलीफ़ न हो.
क्या औरत को सिर्फ़ रोटी-कपड़े की ही तकलीफ़ हो सकती है और किसी तरह की नहीं? उसे जानवर की तरह क्या सिर्फ़ दो वक़्त खाने की ही ज़रूरत है? और कुछ नहीं चाहिए उसे? कैसे सोचते हैं पापा-मम्मी?
"पापा आपने मम्मी को कैसे चुना?" एक दिन यों ही पापा बहुत मूड में थे तो वह पूछ बैठी थी.
"हमारे ज़माने में लड़के अपने लिए लड़की कहां चुनते थे? बस मां-बाप रिश्ता तय कर देते थे. बहुत हुआ तो घर के कैमरे से खिंचा फोटो आ जाता था, वरना कोई परिचित या पंडित बता देता था कि लड़की रंग-रूप और देखने-सुनने में ठीक है. बस, रिश्ता तय हो जाता था."
शुभा सोचने लगी, अगर पापा के ज़माने में भी मीन-मेख के साथ चुनाव की परंपरा होती, तो पापा से मम्मी का संबंध कतई नहीं होता. कहां पापा और कहां मम्मी! एक औसत दर्जे की स्त्री. न शिक्षा, न घर चलाने का शऊर और न बातों में चतुर-चालाक. एक अदद भोली और मूर्खता की हद तक सीधी औरत.
जब से पिता बीमार रहने लगे हैं और बीमारी के कारण उनकी नौकरी छूट गई है, जैसे घर में कलह का स्थाई निवास हो गया है. पापा ग़ुस्से में आकर अपनी दवा भी बंद कर देते हैं और तब घर में एक भुतहा सन्नाटा और अनचाहा आतंक व्याप्त हो जाता है. अगर पिता को कुछ हो गया तो? यह सवाल सांप की तरह फन उठाकर फुफकारने लगता है.
"मेरी तरह आज आपको भी देर हो गई है शायद." विनय बाबू ने निकट आकर कहा, तो वह कुछ सावधान हुई. क्या जिंदगी में विनय बाबू को भी देर हो गई है? उसकी तरह क्या उनकी भी बस नहीं आई? वे तो अपनी चार्टर्ड बस से जाते हैं. आज वह बस निकल गई है शायद… औरत की ही ज़िंदगी में देर नहीं हो जाती, पुरुष की भी हो जाती है. उसे हल्की तसल्ली सी हुई. कोई तो है जो उसकी तरह विलंबित है.


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मन हुआ विनय बाबू से पूछे, बाल-बच्चे हैं या..? पर औरत का पुरुष से ऐसा बेहूदा सवाल करना अशोभनीय होगा शायद. शुभा के दफ़्तर में काम नहीं करते विनय बाबू, परंतु उसी बिल्डिंग में सातवें माले पर किसी अन्य दफ़्तर में एकाउंटेंट हैं. आंखों पर अभी से मोटा चश्मा लग गया है. चेहरे पर बेवक़्त झुर्रियां उभर आई हैं. गालों के ऊपर हड्डियां इतनी उभरी हैं कि देखनेवाले की आंखों में चुभने लगें. अस्त-व्यस्त वस्त्र पहनना उनकी फ़ितरत है और जूतों पर कभी पॉलिश न करना आदत. जाड़े में हमेशा चौकड़िया का कोट और उसके नीचे गंदुभी रंग का पैंट.
लोगों को कितनी ग़लतफ़हमियां है कि दिल्ली में हर तीसरा आदमी लखपति है. हर नौकरी करनेवाला हज़ारों-लाखों पीट रहा है और उसकी पांचों उंगलियां घी में हैं. इस दिल्ली में विनय बाबू और शुभा भी तो हैं, जो बस किसी तरह जी रहे हैं. आख़िर शुभा ने पूछ ही लिया, "बच्चे किस-किस कक्षा में हैं विनय बाबू?"
अचकचा से गए विनय बाबू. कुछ देर अपने चश्मे के पीछे कुछ ज़्यादा उभर कर बड़ी हो गई आंखों को उसकी तरफ़ उठाते ताकते रहे, फिर बोले, "अब लड़कियां अफसरों या बिज़नेसवालों को मिलती हैं शुभाजी… हम जैसे दिनभर हिसाब-किताब करनेवालों को कौन अपनी लड़की देता है भला? हम लोग ज़िंदगीभर दूसरों की आमदनी और ख़र्च का जोड़-तोड़ करते रह जाते हैं, अपनी ज़िंदगी के लिए कुछ नहीं जोड़ पाते."
जाने क्यों, अचानक फिसल गया शुभा के मुंह से, "कौन-कौन है घर में?" हालांकि यह सवाल उसे नहीं करना चाहिए था, पर जब कर बैठी तो अब पछताने से क्या होगा? बस अभी भी नहीं आई थी. उस तरफ़ की बसें अक्सर लेट आती हैं.
कुछ देर कुछ सोचते हुए चुप रहे विनय बाबू. फिर एक लंबी सांस लेकर छोड़ी, जैसे सीने पर कोई भारी बोझ रखा हो और उसे हटा कर कुछ कहने में उन्हें वक़्त लगा हो.
"बूढ़े मां-बाप के अलावा एक विधवा बहन है, जिसे ससुरालवालों ने घर से भगा दिया. बड़े भाई और भाभी की एक ट्रेन दुर्घटना में फिरोजाबाद के पास मृत्यु हो गई. उनके दो बच्चों की ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है."
उस दिन वह मम्मी-पापा और भाई के साथ बैठी खाना खा रही थी, तभी शुभा ने मम्मी से पूछ लिया था, "मेरा नाम शुभा क्यों रख दिया मम्मी आप लोगों ने? मैं तो बड़े मनहूस समय में पैदा हुई
"तेरे पापा ने रखा था यह नाम." मम्मी मुस्कुराई थीं, "जिस दिन तू पैदा हुई थी, पूरे सौ रुपए तनख़्वाह बढ़े थे तेरे पापा के घर में बेहद ख़ुशी छा गई थी. मैंने तुझे पहली संतान के रूप में जन्म दिया, तो तेरी नानी और मेरी सासजी के मुंह लटक गए कि लड़की आ गई, कंगाली में आटा गीला. पर तेरे पापा बेहद ख़ुश हुए थे.
"मेरे लिए तो मेरी बिटिया लक्ष्मी लेकर आई है. आज ही से मेरी तनख़्वाह में पूरे सौ रुपए का इज़ाफ़ा हुआ है और उसी वक़्त तेरा नाम इन्होंने घोषित कर दिया था- शुभ है मेरे लिए मेरी बेटी, इसलिए इसका नाम होगा शुभा."
देर से आई बस में कहीं पांव टिकाने तक को जगह नहीं थी. किसी तरह दबी-पिसी शुभा और उसके पीछे विनय बाबू बस में धंसे रहे. पसीने की गंध और चिपचिपाहट, सुबह-सुबह ही किस क़दर गर्म हो गया है दिन… बाप रे! यह देश है या जलता हुआ आंवा..?


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शुभा की पीठ से सटे खड़े थे विनय बाबू बस में, पर कहीं कोई संवेदन और पुरुष छुहन का एहसास उसके भीतर नहीं जागा था… क्या व्यक्ति की परिस्थितियां उसे इतनी संवेदनहीन, चेतनाशून्य और स्पर्श विहीन बना देती हैं? या ऐसा तो नहीं कि विलंब होने से उसका संवेदन तंत्र ही संवेदनशून्य हो गया हो. अगर ऐसा हो गया होगा तो..? तो क्या वह मात्र एक चलती-फिरती लाश भर रह जाएगी अब..? जीवित हाड़-मांस की संवेदनशील युवती नहीं रह जाएगी वह, जिसे किसी पुरुष की छुअन, उसकी निकटता, उसकी देह-गंध मदमस्त बना देती है और उसके शरीर का रोम-रोम सितार के तारों की तरह झनझना उठता है.
दफ़्तर में दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं उसके पहुंचने पर… ब्याहाता सहकर्मी महिलाएं कहती हैं, "लो आ गई मोहतरमा." और लंपट क्रिस्म के पुरुष सहयोगियों की आंखों में चमकता वाक्य वह साफ़ पढ़ लेती है, "बुरे काम के लिए क्या बुरी है यार." कोई-कोई हमदर्द बनने का स्वांग रचता है, "अब और कितनी देर करोगी शुभा? कोई ठौर- ठिकाना जल्दी तय कर लो, वरना हाथ मलती रह जाओगी," और कुछ साथियों को उस पर तरस आने लगता, "बेचारी!" एक-दो की अश्लील हरकतों पर वह फनफनाई हुई बॉस के चैंबर में पहुंच कर फफक पड़ी थी, "सर, अपना स्टाफ लेडीज़ के साथ बहुत बदतमीज़ी से पेश आता है."
बॉस ने उसकी सारी बात सुनी, लेकिन जिस तरह मुस्कुराकर बात को टाल गए, उससे उसे एकदम ग़ुस्सा आ गया था. परंतु यह नौकरी की मजबूरी ही थी कि वह बॉस से कुछ कह नहीं सकी थी. बॉस को एक बार कंपनी के काम से मुंबई जाना था. उन्होंने शुभा को बुलाया, "साथ चलना पड़ेगा तुम्हें."
"कहां सर?" वह अचकचाई थी.
"मुंबई. कंपनी का ज़रूरी काम है. रिकॉर्ड्स की तुम्हें ही सही जानकारी है. सब साथ ले चलने होंगे."
"मिस नेहा को लिवा जाते सर तो…" उसने डरते-डरते कह दिया था, "पापा की हालत बहुत ख़राब है. उन्हें किसी भी वक़्त अस्पताल में ले जाना पड़ सकता है. सारी व्यवस्था मुझे ही करनी पड़ेगी…"
बॉस संकेत समझ गए थे. उनका चेहरा तमतमा-सा गया था. होंठों की बुदबुदाहट से साफ़ लग रहा था कि वे मन ही मन शुभा के लिए कोई अश्लील-सी गाली बक रहे हैं. औरत के ख़िलाफ़ कितना विषाक्त वातावरण है ऑफिसों में, जबकि कहा रोज़ जाता है कि अधिकार समान हैं, अवसर समान हैं, सम्मान समान है, क्या समान है? हर जगह तो पुरुष तानाशाह नज़र आ रहा है.
पच्चीस-छब्बीस की थी जब एक पैंतालिस वर्षीय महाशय दो बच्चों के बाप थे, का रिश्ता आया था, लड़का इंटर में था और लड़की हाईस्कूल में. पत्नी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी. घर संभालने के लिए कमाऊ लड़की चाहिए थी. पिता भी राजी होने लगे थे, "आदमी की उम्र कोई मायने नहीं रखती शुभा, वह कभी बूढ़ा नहीं होता. इससे अच्छा रिश्ता हमें शायद ही मिले…" और शुभा ने एकदम इनकार कर दिया था- कुंआरा रहना मंजूर, पर दुहाजू के घर को संभालने की ज़िम्मेदारी निभाने नहीं जाएगी वह. कई दिन तक घर में तनाव रहा था. मां भी कोसती रही थीं उसे, पर वह टस-से-मस नहीं हुई थी.
मनोविज्ञान में एम.ए. करने के बाद वह पीएच.डी. करना चाहती थी. सबसे अच्छे अंक थे कक्षा में उसके, प्रोफेसर साहब बहुत प्रभावित थे. वह उनके घर भी गई थी, "सर, अब क्या करूं..?"
"चाहो तो शोध शुरू कर दो. कुछ वक़्त लगेगा, कोशिश करके शायद स्कॉलरशिप दिलवा दूं तुम्हें…" उन्होंने कहा था.
"सर, घर के हालात अच्छे नहीं हैं. बिना नौकरी किए हम लोग अब ज़िंदा रहने की स्थिति में नहीं हैं." वह लगभग रुआंसी हो आई थी. पलकें भीग गई थीं और गला भर्रा आया था.
"बिना शोध कार्य के महाविद्यालयों में प्रवक्ता पद तो मिलने से रहा शुभा. और इंटर व हाई स्कूल में नौकरी के लिए तुम्हें दो साल बी.एड. करना पड़ेगा और कोई नौकरी मिल सके तो तलाशो…" उन्होंने कहा तो लगा, कहीं उनके मन में उसके लिए सहानुभूति है. उसी सहारे वह कह बैठी, "सर, आप कुछ मदद कर दीजिए. आप तो यहां कई स्कूलों-कॉलेजों में साक्षात्कार लेने जाते रहते हैं. आप चाहेंगे तो कहीं पांव टिकाने की जगह मिल जाएगी सर."
"ठीक है. दो-तीन दिन बाद घर आना. कुछ हो सका, तो बताऊंगा." पहले लगा, शायद टाल दिया उन्होंने, पर जब वे दुबारा उससे पूछ बैठे, "आओगी तो वक़्त बता दो." फिर कुछ सोच कर बोले, "फोन नंबर ले लो. कहीं से फोन कर लेना आने से पहले… कोई व्यस्तता हुई तो मना कर दूंगा."
वह बाकायदा फोन कर, समय लेकर उनके पास पहुंची थी. अपने फ्लैट में वे उस वक़्त अकेले थे. हल्का-सा भय लग रहा था शुभा को, पर वह किसी तरह हिम्मत जुटाए वहां बैठी रही थी, "सर कुछ सोचा आपने?"

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इसी कंपनी का पता दिया था, बॉस के नाम पत्र भी लिख दिया था, "मेरे मित्र हैं, चली जाना. कुछ कर सकने की स्थिति में होंगे तो कर देंगे." डरते-डरते शुभा ने दबी जुबान अपने साक्षात्कारों के अनुभव बताते हुए इस कंपनी के बॉस के बारे में पूछा, तो वे हंसने लगे थे, "बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी शुभा? कब तक देह की शुचिता को चाटती रहोगी? इन सब बातों में अब क्या रखा है? इस खुली अर्थ-व्यवस्था वाले देश में अब सब कुछ ख़रीदा-बेचा जा रहा है… नैतिकता, मूल्य, सिद्धांत, अब व्यर्थ के ढकोसले रह गए हैं… जिसके पास जो है, वह उसे दांव पर लगा कर कुछ न कुछ हासिल करने में जुटा हुआ है… और इस खेल में वही जीत रहा है, जो ज़्यादा से ज़्यादा दांव पर लगा रहा है."
"सर… यह आप कह रहे हैं..! आप जैसे विद्वान, जिनकी विद्वता पर हमें गर्व रहा है सर..!" वह हक्की-बक्की रह गई सुन कर.
"उस विद्वता ने मुझे भी क्या दिया शुभा? बीवी इस उम्र में छोड़कर चली गई, उसे नहीं रहना मेरे जैसे बेवकूफ़ और मूल्यों की चासनी चाटनेवाले के साथ. बच्चे अपने-अपने परिवारों में रम गए, जिस उम्र में मेरी देखरेख करनेवाले की मुझे ज़रूरत थी, उस उम्र में मैं अकेला हूं, क्यों? किसलिए अकेला रहूं मैं..?"
आख़िर उनकी इच्छा उनकी जबान पर आ गईं, "कोई जल्दी नहीं है शुभा. घर जाकर ख़ूब सोच-विचार लेना. अपने मां-बाप से भी सलाह कर लेना. जब बुलाओगी, तुम्हारे घर आ जाऊंगा. उम्र में तुमसे शादी तो नहीं कर सकूंगा. हंसी का पात्र बनूंगा ऐसा करके, पर तुम आराम से मेरे साथ इस फ्लैट में रह सकोगी… सारे सुख-आराम यहां तुम्हें उपलब्ध रहेंगे. तुम्हारे माता-पिता और भाई की ज़िम्मेदारी भी मैं उठाता रहूंगा. इतना है पास कि तुम्हें किसी तरह की असुरक्षा का एहसास नहीं होगा. औरत को और क्या चाहिए..? सुरक्षित भविष्य ही न. तो यह देखो मेरा बैंक का जमा खाता… उन्होंने बैंक की पास बुक उसके सामने रख दी. फटी-फटी आंखों वह अनसमझी सी वह सब देखती रही और स्तब्ध सी बैठी रही.
एकदम इनकार करने का साहस नहीं जुटा सकी शुभा, इसलिए किसी तरह कहा उसने, "सर, माता-पिता से बात करूंगी…" कहकर उठ दी वह.
कैसी दुनिया है? कैसा समाज, कैसे लोग..? वह रास्तेभर सोचती रही. अजीब-सी गिजगिजी महसूस हुई उसे.
सर का पत्र लेकर वह साक्षात्कार हेतु इस कंपनी में आ गई थी. अपने प्रमाण पत्र दिखाने लगी, तो बॉस ने कह दिया, "यह सब रहने दो, मेरे मित्र ने कह दिया है, तो नौकरी पक्की समझो. मेरे साथ रहना होगा तुम्हें…" यानी..? बॉस के साथ रहने का मतलब? नियुक्ति पत्र तो मिल गया था, पर आशंका और भय से वह निरंतर कांपती रही है.
शाम को शुभा दफ़्तर से बाहर निकली, तो उसने देखा, विनय बाबू उसी के इंतज़ार में खड़े हैं, "मैंने तय किया है, चार्टड बस से नहीं, तुम्हारे साय जाऊंगा… और अगर चाहोगी तो गली में अपने उस घर को भी दिखाऊंगा जो…" वे अजीब तरह हंसने लगे और उनकी उन्मुक्त हंसी शुभा अपलक ताकती रही.

- दिनेश पालीवाल

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