कहानी- आख़िरकार (Short Story- Aakhirkar)

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”शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…” प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है?

सामने के फ़्लैट में रहनेवाली श्यामली से दया का मिलना तो कम हो पाता था, लेकिन दया का उसकी हर गतिविधि पर ध्यान जाने-अनजाने चला ही जाता था. दोनों के घर की रसोई की खिड़कियां आमने-सामने ही पड़ती थीं, तभी तो श्यामली कई बार मज़ाक में कह भी चुकी थी, “लगता है आपका सारा दिन रसोईघर में ही बीतता है.” सुनकर दया चुप रह जाती.
यूं देखा जाए, तो दोनों की दिनचर्या में भी काफ़ी अंतर था. श्यामली बैंक में काम करती थी. पति अक्सर दौरे पर रहते थे और बच्चे बाहर हॉस्टल में थे. श्यामली का क्या, थोड़ा-बहुत कच्चा-पक्का बना लिया और कभी मूड नहीं हुआ, तो बाहर से कुछ मंगा लिया, पर दया… वह तो जब से ब्याहकर इस घर में आई थी, तभी से अधिकांश समय रसोईघर में ही बीता. तब तो भरा-पूरा ससुराल था. सब साथ रहते थे और वह थी घर की बड़ी बहू.
आज भी जब कभी वे दिन याद आते हैं, तो वह सोचती है कि कितना कुछ बदलाव आया था उसके व्यक्तित्व में इस घर में आकर.
बेटी रीना उस दिन पूछ रही थी, “मम्मी, आप क्या बचपन से ही इतनी अच्छी कुकिंग करती थीं? मुझसे तो अब तक गोल रोटी भी नहीं बन पाती है.”
“हूं… बचपन… तब कहां कुछ आता था? छोटा-सा परिवार था. मां-बाबूजी और बस दो भाई-बहन.”
बी.ए. करने के बाद उसकी बहुत इच्छा थी आगे और पढ़ने की, पर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि जल्दी शादी हो गई. ससुराल आकर देखा, सास तो घर के हर कामकाज में पारंगत थीं, पर ससुराल के इस पारंपरिक वातावरण में सामंजस्य बैठाना उसे काफ़ी मुश्किल लगा था. चूल्हा छुआई की रस्म तो ख़ैर जैसे-तैसे हो गई, पर जब कुछ दिनों बाद ननद प्रभा ने आदेश दिया कि अब सुबह की चाय भाभी बनाएंगी तो वह चौंक ही गई थी. कम से कम पच्चीस-तीस लोग तो होंगे ही उस समय घर में. और तब तक तो उस घर में गैस भी नहीं आई थी. उसने तो अब तक अपने घर में ज़्यादा से ज़्यादा चार-पांच लोगों की चाय बनाई होगी. चूल्हे पर काम करने की भी आदत नहीं थी. ख़ैर, चूल्हा तो प्रभा ने जला दिया था, पर जब वह भगौने में पानी कप से नापकर डालने लगी तो प्रभा हंसी थी.
“भाभी, कहां तक नापोगी? पूरा भगौना भरकर चढ़ा दो.”
फिर जब शक्कर के नाप के लिए चम्मच टटोलने लगी, तो प्रभा फिर हंसी थी.

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“अरे भाभी, ये जो शक्कर के डिब्बे में बड़ा-सा कटोरा है न, भरकर डाल देना और हां, चाय के डिब्बे में भी एक छोटी कटोरी है, वही नाप है.”
प्रभा ही थी, जो उस समय हर काम में उसकी मदद कर देती थी, सब्ज़ी के तेल- मसाले से लेकर रोटी और परांठे के आटे तक का नाप-तौल वही बताती रहती. फिर तो काम करते-करते उसकी भी आदत हो गई थी.
सास ने तो सिलाई, बुनाई, अचार, पापड़ तक घर के सारे काम सिखाए थे और कब वह एक अल्हड़ लड़की से एक कुशल गृहिणी बन गई, वह स्वयं भी नहीं समझ पाई थी.
धीरे-धीरे संयुक्त परिवार से वे लोग एकल परिवार हो गए. बच्चे भी अब बड़े होने लगे थे, पर घर को सुव्यवस्थित रखने, सुचारु रूप से चलाने में ही उसका पूरा दिन खप जाता था. मेहमानों की आवाजाही भी बनी ही रहती थी.
पति प्रभात तो शुरू से ही कम बोलते थे और अधिक टोका-टोकी भी नहीं करते थे. फिर भी कई बार वह महसूस करती कि अन्य कामकाजी महिलाओं को देखकर शायद वे भी कामकाजी पत्नी की ही कामना करते होंगे. घर के बढ़ते ख़र्च से बजट भी डगमगाने लगा था. बेटे की कॉलेज की पढ़ाई थी. फिर बेटी रीना की शादी आ गई तो कर्ज़ बढ़ गया था.
तब तो उसने एक बार रीना से कहा भी था, “मैं भी शादी के बाद बी.एड. करके नौकरी कर लेती, तो अच्छा रहता. पैसों की इतनी कमी तो महसूस नहीं होती. अब देख तेरी शादी के बाद अगर छोटा-सा भी फ्लैट लेने की सोचेंगे तो उसके लिए भी भारी कर्ज़ का इंतज़ाम करना होगा.”
“मम्मी…” रीना ने तो तुरंत टोक दिया था. “आप नौकरी करतीं, तो हम भाई-बहन की इतनी अच्छी परवरिश कैसे हो पाती? पापा तो नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते थे. फिर हमें साफ़-सुथरा, सजा-संवरा घर, स्वादिष्ट खाना कैसे मिलता? मुझे तो अब तक याद है कि हम भले ही कितनी देर में घर पहुंचते, आप हमेशा ही हमें गरम-गरम खाना खिलाती थीं. अब मुझे देखो न, दीपू का कहां इतना ध्यान रख पाती हूं. कभी-कभी तो उसे बुखार में भी घर छोड़कर ऑफ़िस जाना पड़ता है.”
“पर रीना, तेरे पापा ने तो शायद ही कभी महसूस किया हो कि घर में रहकर मैंने कभी कोई योगदान दिया है इस गृहस्थी को चलाने में.”
“मम्मी…” रीना ने फिर बात काट दी.
“आप भी कैसी बातें कर रही हो? पापा कब मुंह पर किसी की तारीफ़ करते हैं, पर इसका यह मतलब तो नहीं है कि वे समझते ही नहीं हों कि आपने कितना कुछ किया है? हमारे लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए भी. यहां तक कि चाचा-बुआ सबके लिए और अभी भी तो करती ही रहती हो. अब जब पापा रिटायर हो जाएंगे, तब ख़ूब समय होगा आप दोनों के पास, ज़िम्मेदारियां भी तब कम हो जाएंगी. तब पापा आपको बता पाएंगे कि कितना योगदान है आपका इस परिवार को बनाने में. आप लोग फिर ख़ूब घूमने जाना, अपना दूसरा हनीमून मनाने.”
दया तब हंसकर रह गई थी.
“बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे.” रीना को हल्की-सी झिड़की भी दी थी उसने.

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पर अब तो प्रभात वास्तव में रिटायर होने जा रहे हैं. आज ऑफ़िस का आख़िरी दिन है. पार्टी वगैरह भी है, फिर अगले ह़फ़्ते बच्चे भी आ जाएंगे. पापा का रिटायरमेंट और साठ वर्ष पूरे होने की ख़ुशी दोनों ही साथ मनाने का कार्यक्रम है. सोचती हुई दया बाहर लॉन में आकर बैठ गई थी.
श्यामली भी शायद अभी बैंक से लौटी थी. स्कूटर खड़ा करके अंदर जा रही थी. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. जाने-अनजाने पता नहीं क्यों वह अपनी और श्यामली की तुलना करने लगती है. चुस्त, स्मार्ट श्यामली बैंक की नौकरी के बाद भी कितना व़क़्त निकाल लेती है. उस दिन पता नहीं कितने टीवी सीरियल्स की बातें कर रही थी?
“दयाजी, आजकल टीवी पर बहुत अच्छे प्रोग्राम्स आ रहे रहे हैं, आप ज़रूर देखना. कई बार तो बहुत अच्छी फ़िल्में भी आती हैं.”
वह सोचती कि वह तो कभी भी पूरी फ़िल्म देख ही नहीं पाती है. घर-परिवार, मेहमान, घर के कामकाज से मुश्किल से कुछ समय निकालकर अख़बार देख लिया या न्यूज़ सुन ली तो बहुत हो गया.
उसकी ननद, देवर-देवरानी सब यही कहते हैं, “बस भाभी, आप हो तो मायका-ससुराल सब यहीं है हमारा.”
चलो, सबकी अलग-अलग ज़िंदगी और ज़िम्मेदारियां होती हैं, वह क्यों तुलना करे किसी से अपनी. सोचकर उसने फिर आज ख़ुद को समझा लिया था.
प्रभात को भी लौटने में काफ़ी देर हो गई. वह सोच रही थी कि एक कप कॉफी बनाकर पी ले. तभी स्कूटर की आवाज़ सुनाई दी.
‘चलो, ये भी आ गए, अब साथ ही बैठकर कॉफी पी लेंगे.’ सोचते हुए वह रसोईघर में आ गई थी.
प्रभात कपड़े बदलकर सोफे पर आराम से पसर गए थे. वह कॉफी के साथ कुछ बिस्किट्स भी ले आई थी.
“अरे, खाना-पीना तो बहुत हो गया, बस कॉफी ही लूंगा.”
“बहुत थक गए लगते हो?” वह पास आकर बैठ गई थी.
“थका तो नहीं हूं, पर सोच रहा हूं कि कल से करूंगा क्या? बरसों से रोज़ सुबह तैयार होकर ऑफ़िस जाने की आदत रही है, अब घर पर अकेले…”
“क्यों? अकेले क्यों… हम दो तो हैं न. अब बरसों बाद समय मिला है, तो घूमेंगे, कहीं बाहर जाएंगे, अब तो आपकी ज़िम्मेदारियां भी पूरी हो गई हैं.”
दया ने कॉफी का कप आगे बढ़ाया और फिर अपना कप उठाया.
“शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…”
प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है? अपने ही ख़यालों में डूबी दया यह सोचती रही…

– डॉ. क्षमा चतुर्वेदी

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