- राजेन्द्र सिंह बेदी
जब मारग्रेट को पता चला कि वह लड़का स्त्री के बारे में बिल्कुल कुछ नहीं जानता, तो उसने लड़के का हाथ पकड़ते हुए कहा, "क्या तुम आज शाम मेरे मेहमान बनोगे?.."
"सोलह?"
"जी हां, सोलह. तीसरी लाइन में." बुकी ने एक हाथ से अपने बालों को दबाते हुए कहा, "आपको तकलीफ़ उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी साब! कंडक्टर आपकी मदद करेगा."
"धन्यवाद, धन्यवाद!" उसने मुस्कुराते हुए एक और चवन्नी काउन्टर पर रख दी. बुकी ने चवन्नी जेब में डालते हुए आंखें बन्द कर लीं, जैसे उसका दिमाग़ बहुत थक गया हो. वह दिनभर कलकत्ता की एक बीमा कम्पनी में टाइप किया करती, और रात को इस शानदार थिएटर में टिकटें बेचा करती. थोड़ी-सी तनख्वाह के अलावा किसी रंगीन मिजाज़ नवयुवक के लिए किसी लड़की की बगल में सीट बुक कर देने के बदले में उसे चवन्नी ज़्यादा मिलती थी और उसकी आमदनी पर एक बड़ा परिवार पल रहा था. एक बूढ़ीं, हठीली मां थी, जो खाना मिलने में ज़रा-सी देर हो जाने पर अपना मुंह ख़ुद ही नोच लेती थी. उसके अतिरिक्त एक विधवा बहन थी, जिसे उसके पति ने दो वर्ष पहले केवल इसलिए छोड़ दिया था कि आग जलाने पर वह सारे घर में धुआं भर देती थी. और फिर, छोटे भाई थे, और भांजे...
कुछ देर बाद मन्द चाल से वही नवयुवक काउन्टर की ओर आया और आते ही उसने अपनी उंगलियां लकड़ी के काउन्टर पर बजाई और बोला, "लेकिन, मैम, वहां तो कोई लड़की नहीं है."
बुकी ने आंखे खोलते हुए कहा, "कहीं बाहर होगी, साब... उसने मुझसे टिकट ख़रीदा है. शायद आपको इन्तज़ार करना पड़ेगा."
"ओफ़!" नवयुवक ने परेशानी से कहा, "हमेशा ऐसा ही तो होता है मिस."
फिर वह नवयुवक कुछ दूर जाकर सागवान के सुन्दर चौखटे में लगे हुए स्टिल्ज को देखने लगा. उसने आज रात को के लाल लेबल फाड़ने
शुरू कर दिए फिर, वह बुकी के पास लौटते हुए बोला, "मायूसी से तो इन्तज़ार अच्छा है."
बुकी उस अधीर नवयुवक की ओर देखकर मुस्कुरा दी और दिल ही दिल में उसके सुन्दर बालों को सराहने लगी. कितने अच्छे हैं इसके बाल! दौलत और चिन्ता से धिरे हुए सेठों की तरह यह गंजा नहीं है. न ही तोन्दीला है. और न ही दुबला. बस... ठीक है. इसके बाल धान के खेतों की तरह है, जिन्होंने मानसूनी हवाओं से पूरा फ़ायदा उठाया हो. इसके तौर-तरीक़े और बातों से शराब की बू आती है. यद्यपि इसने शराब नहीं पी है. इसका कारण यही है कि यह बहुत ही ज़्यादा जवान है. जैसे अंगूर पक जाते हैं तो उनसे शराब की बू आने लगती है.
कुछ देर के बाद वह नवयुवक पर्दा उठाकर बड़े ध्यान से थिएटर की छत का निरीक्षण करने लगा. छत में बनावटी तारे चमक रहे थे. वह जानता था कि जब थिएटर की बत्तियां बुझा दी जाएंगी, तो वे तारे और अधिक चमकने लगेंगे और बहुत सुन्दर दिखाई देंगे. छत की ओर दृष्टि उठाने से आकाश का धोखा होगा और सचमुच वह इस दृश्य को पसन्द करेगा और अपने साथ बैठी हुई लड़की को कहेगा, "तारे कितने सुन्दर हैं. और... और यह सच है कि उसने तारों भरे आकाश पर कभी दृष्टि नहीं दौड़ाई थी और न ही इस कलकत्ता को पसन्द किया था, जो प्रतिदिन रात को आकाश पर दिखाई देता था. पर छत पर चमकते हुए तारों को तो वह इसलिए पसन्द करता था कि उन्हें देखकर सचमुच के तारों का धोखा होता था और मनुष्य, सदा असलियत की बजाय धोखे को पसन्द करता है.
फिर वह नवयुवक बरामदे में एक दीवार के सहारे खड़ा हो गया. बुकी को विश्वास था कि वह इस निश्चिन्त नवयुवक को पसन्द नहीं कर सकती है, इसका कारण था कि वह बहुत रहमदिल थी और इसीलिए वह इसके बारे में अपने विचारों को प्यार से अलग रखना चाहती थी, वरना उसके लिए यह कितना आसान था कि शो शुरू हो जाने पर बुकिंग ऑफिस के सामने हाउस फुल का बोर्ड लगाकर उस नवयुवक की बगल की सीट पर स्वयं जाकर बैठ जाती.
उसने अपने सामने पड़े हुए सीटों के प्लान पर दृष्टि दौड़ानी शुरू की. आख़िर ऐसे ही अधीर नवयुवक को किसी लड़की की बगल में सीट देने से उसे चवन्नी मिलती थी. उसकी उंगली प्लान में खाली सीटों के साथ-साथ दौड़ने लगी. दूर खड़े नवयुवक को बुकी के नाख़ूनों पर गुलाबी नेलपॉलिश चमकता हुआ दिखाई दे रहा था. वह घूर-घूरकर उस पॉलिश को देखने लगा, जैसे उसे उनके पॉलिश होने में यक़ीन न हो और वह उन नाख़ूनों को छूकर देखना चाहता हो.
छब्बीस... सत्ताइस... तीस, चौथी लाइन... बारह... बुकी की दृष्टि एक सीट पर जाकर रुकी. वह शायद इस सीट पर निशान लगाना भूल गई थी. इस सीट के लिए भी तो एक लड़की ने टिकट ख़रीदा था. वह उस लड़की को जानती भी तो थी मिसेज़ डिसूज़ा. उसके साथ मिस्टर डिसूज़ा नहीं थे. वे थे या नहीं थे, यह बात बुकी हल्के-हल्के सिरदर्द में बिल्कुल भूल चुकी थी. उसे तो उनकी शक्ल तक याद नहीं रही थी. उसने अपने थके हुए दिमाग़ पर ज़ोर डालना शुरू किया. यहां तक कि वह उस चवन्नी को कोसने लगी, जो उसे इस काम के लिए मिलती थी.
"जेंटलमैन...", बुकी ने उस नवयुवक को बुलाते हुए कहा, "मैंने आपकी सीट चौथी लाइन में तेरह पर रखी है और बारह पर मिस डिसूज़ा की जगह है." बुकी ने जान-बूझकर मिसेज को मिस कहा. आख़िर प्रकृति ने स्त्री के माथे पर तो ऐसे अन्तर का कोई निशान नहीं लगाया है और फिर, बुकी को अपनी चवन्नी प्यारी थी, उसे अपनी मां से बहुत प्यार था और बहन पर उसे तरस आता था.
नवयुवक ने धन्यवाद कहा, वह हॉल के अन्दर चला गया.
बुकी ने एक सिगरेट सुलगाई और फिर बड़े ध्यान से प्लान को देखने लगी. जब वह एश-ट्रे को अपने निकट सरका रही थी तो एक बदसूरत सा लड़का आया और उसके पास आकर खड़ा हो गया. बुकी ध्यान से उसके चेहरे की ओर देखने लगी. वह अभी कम उम्र का था, उसकी नसें भीग रही थीं और उसके चेहरे से मालूम होता था कि वह स्त्रियों के बारे में कुछ नहीं जानता था, पर जानना चाहता था. मां और बहन के अतिरिक्त उसने संसार में कोई स्त्री नहीं देखा था. उसके चेहरे पर हल्की सी शर्म के पीछे एक डर दिखाई दे रहा था, जो उसके चेहरे के भद्दे नक्शों को और भद्दा बना रहा था.
लड़के ने टिकट के पैसों के अतिरिक्त एक चवन्नी बुकी की ओर सरका दी. बुकी का मुंह खुला रह गया, "तुम चाहते हो..." वह बोली और चवन्नी को एक नज़र देखते हुए उसने जेब में रख लिया और फिर अपने सामने पड़े हुए प्लान पर झुक गई. हाउसफुल था. सिर्फ़ सोलह नम्बर की सीट खाली थी. वह सीट, जो उसने सुन्दर नवयुवक के लिए पहले बुक की थी, पर साथ की सीट पर लड़की न होने से खाली रह गई थी. बुकी ने सोचा, अब वह लड़की ज़रूर आ बैठी होगी. कितनी सुन्दर थी वह लड़की! उसके बालों की लहरें यूं दिखाई देती थीं, जैसे धान के खेत पर हवा सरसराती हुई गुज़र रही हो. शायद उसने अपने बाल किसी युवक का ध्यान खींचने के लिए ऐसे बनाए हैं. उसकी बगल में इस मूर्ख, भद्दे छोकरे को जगह देना उस लड़की का अपमान करना है, और फिर यह छोकरा कम उम्र ही नहीं, बल्कि देहाती भी है. चौबीस परगना की तरफ़ का रहने वाला ही तो
दिखाई देता है.
इसके चेहरे से साफ़ प्रकट है कि न तो यह छत के तारों की प्रशंसा से बात शुरू कर सकता है, और न ही उस लड़की के बालों को धान के खेतों से उपमा दे सकता है. यह गधा तो असली तारों को पसन्द करता है, और कहीं से धान काटता हुआ उठकर कलकत्ता चला आया है.
बहुत से नवयुवक उसकी ओर बढ़े आ रहे थे, पर सब सीटें बिक चुकी थीं. प्लान उसके लगाए हुए निशानों से लाल हो गया था. उसने हाथ के इशारे से सबको बता दिया कि अब इस दर्जे में कोई जगह नहीं है और वे नवयुवक अपने ओवरकोट थामे और पतलूनों के पांयचे उठाए वापस चले गए.
उस समय बुकी के दिल में उस देहाती लड़के के लिए एक विचित्र सा मातृभाव पैदा हुआ. उसने अपनी खिड़की के सामने हाउसफुल की तख्ती लटका दी और खिड़की बन्द करके बाहर निकल आई. उसने उस लड़के के कांपते हुए हाथों में टिकट दे दिया और फिर उसे कंडक्टर तक ले गई. लगातार कांपते रहने से लड़के का चेहरा और भी भद्दा बन गया था. कंडक्टर ने सावधानी से उसे सोलह नम्बर की सीट पर बैठा दिया. चुकी दरवाज़े में खड़ी उस लड़के और उसके बगल की सीट पर बैठी लड़की को देखती रही. लड़की ने घबरा कर अपनी दाईं ओर देखा और कसकर अपनी कुर्सी को पकड़ लिया. उसे अपनी शाम के बरबाद हो जाने में कोई शक न रहा. बुकी ने सोचा, शायद वह लड़की उसकी तरह अपनी चवन्नी या दस के नोट को पसन्द करती हो. इसके बाद एक लुभावनी धुन पर गाना गाया जाने लगा "तारों भरी रात के नीचे..."
बुकी ने एक गहरी ठंडी सांस ली और अपने मन में धुन को गुनगुनाने लगी "तारों भरी रात के नीचे..." पर अभी दूसरे शो का प्लान बनाना था और उसे तीन-साढ़े तीन रुपए हाथ लग चुके थे. अब तो वह बहुत ही थक गई थी. अपनी आंखों को तीखे प्रकाश से बचाने के लिए उसे हॉल का अन्धेरा पसन्द था. वह सोचने लगी, तारों भरी रात के नीचे लुभावना गाना सुनकर उस बदसूरत लड़के को तारों-भरा सुन्दर आकाश याद आएगा या हॉल की छत? इसके चाद बुकी चाहर निकल आई. कंडक्टर जानता था कि बुकी इस जगह खड़ी होकर कुछ क्षणों के लिए फिल्म देखा करती है और फिर झट ही बाहर निकल जाती है, मानो पर्दे पर कोई बहुत ही भयानक दृश्य दिखाया जा रहा हो. हालांकि यह चाल न थी. वह आराम से गाना भी सुन सकती थी. उसे ऐसा लगता था, जैसे उसके दिल का बर्तन छोटा है, वह संगीत बहुत बड़ा है और गीत उसके दिल में समा नहीं सकता, वह अपना छलकता हुआा दिल लेकर बाहर निकल आती और तारों भरी रात के नीचे चौबीस परगना के किसी गांव के तालाब का किनारा उसे याद आ जाता, जहां उसका प्यार परवान चढ़ा और जुट गया था.
वह मैनेजर के कमरे के पास खड़ी होकर सिगरेट सुलगाने लगी. कुछ देर बाद हॉल में प्रकाश हो गया, इन्टरवल हो चुका था. बुकी ने फिर एक बार पर्दों के पीछे से सोलह और उसके साथ की सीट की ओर देखा, वह लड़का और लड़की एक-दूसरे के लिए वैसे ही अपरिचित थे और अपनी-अपनी जगह पर सिमट कर बैठे हुए थे. अगर वह लड़का इस लुभावनी धुन की प्रशंसा कर देता, तो कितनी अच्छी बात होती, पर वह तो गुमसुम बैठा था.
अब वह इन्टरवल में भी कोई बात शुरू कर सकता था, पर वह बाहर चला आया. उसका चेहरा बहुत उतरा हुआ था. वह बार-बार आंखें झपकाता था और अपने होंठों पर बेतहाशा ज़ुबान फेरता था. इन सब हरकतों से वह बिल्कुल एक उजड्ड देहाती मालूम होता था.
"हेलो मिस." उसने बाहर निकल कर डरते हुए कहा.
बुकी ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा और बोली, "हेलो बॉय.. एंज्वायड ऑलराइट?"
उस लड़के ने टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में जवाब दिया, "मैम मैं तो कलकत्ता देखना चाहता हूं और और..." उसके बाद वह हकलाने लगा, "मेरा चाचा केदारपुर में दुकान करता है."
बुकी का जी चाहा कि वह स्पष्टता से काम लेती हुई कह दे कि कलकत्ता बिल्कुल इसी हॉल की छत जैसा है, पर उस लड़के ने छत को ध्यान से देखा ही नहीं था और बुकी भी एकाएक परेशान और उदास हो गई. उसके सिर का दर्द बढ़ गया. वह उस देहाती लड़के को पसन्द करने लगी थी. वह बहुत रहमदिल थी. इसके बाद जब शो खत्म हुआ, तो बुकी ने मैनेजर से छुट्टी ले ली. उस समय वह देहाती बदसूरत लड़का बाहर आया. बुकी उसके निकट चली गई और बोली, "हेलो बॉय! तुम कहां के रहने वाले हो?"
"हर्षपुर, चौबीस परगना का."
"मैं जानती हूं. हर्षपुर में एक बार मिस्टर रे के यहां एक महीना ठहरी थी."
"रे? हां...हां..!" लड़के का चेहरा चमक उठा, "मैं रे को जानता हूं, वे हमें पढ़ाते रहे हैं."
इसके बाद वह कुछ देर चुप रहा. फिर बोला, "आप, इतनी अच्छी है क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?"
"नलिनी," बुकी बोली, "लेकिन यहां सब लोग मुझे मारग्रेट कहते हैं. मिस्टर रे के बड़े भाई मेरे पिता थे. उन्हें मरे हुए दस साल हो चुके हैं. उन्होंने एक ऐग्लो-इंडियन लड़की से शादी की थी. वह लड़की मेरी मां है... क्या तुम कलकत्ता देखना चाहते हो?'
लड़के ने सिर हिला दिया.
मारग्रेट बोली, "चलो, कॉफी की एक-एक प्याली पिएंगे."
वे दोनों चल दिए, होटल के दरवाज़े पर दो बड़े-बड़े दूधिया बल्ब दूर से चांद जैसे दिखाई दे रहे थे. मारग्रेट ने उनकी ओर संकेत करते हुए कहा, "दूर से असली चांद का धोखा होता है."
लड़के ने झट हां में हां मिला दी. मारग्रेट बल्बों की ओर संकेत करके कहना चाहती थी, "बस, कलकत्ता ऐसा ही है."
फिर वे होटल में दाख़िल हुए और कॉफी पीने लगे. लड़के के चेहरे से साफ़ प्रकट था कि उसे कॉफी का तलख स्वाद पसन्द नहीं था. वह शायद दूध के मटके चढ़ा सकता था. कॉफी के बाद मारग्रेट ने कई चीज़ों का ऑर्डर दिया. लड़के को उनमें से कई चीज़ों के नाम नहीं आते थे. मारग्रेट पूछती, "यह क्या है?"
"पता नहीं."
"ससिज, कहो सॉसेज."
"ससिज."
"यह क्या है?"
"पता नहीं."
"कटलेट्स, कहो कटलेट्स.'
"कटलेट्स."
वह लड़का कभी भोलेपन से कुछ और कह देता तो मारग्रेट उसे ठीक करती, जैसे बचपन में मां बच्चे को नए-नए नाम सिखाती है और जब वह उल्टा-सीधा नाम लेता है, तो उसे सुधारती है. कॉफी पीने और कुछ खा चुकने पर मारग्रेट ने पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डाला, पर उस लड़के ने थाम लिया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर बिल पर रख दिए, मारग्रेट का ख़्याल था कि कलकत्ता में स्त्री का बिल चुकाने का तरीक़ा उस लड़के को न आता होगा, पर उसने देखा कि वह इससे परिचित था. जैसे सिनेमा में चवन्नी ज़्यादा देकर लड़की के साथ सीट बुक कराने का तरीक़ा उसे किसी ने बता दिया था, इसी तरह स्त्री के साथ कॉफी पी कर या खाना खा कर बिल के पैसे चुकाने का तरीक़ा भी किसी ने सिखा दिया होगा.
मारग्रेट ने बताया कि कलकत्ता बहुत सभ्य हो चुका है और सभ्यता भी अंगूर के दानों की तरह है. जब वह बहुत पक जाता है, तो उसमें से शराब की बू आने लगती है. जब मारग्रेट को पता चला कि वह लड़का स्त्री के बारे में बिल्कुल कुछ नहीं जानता, तो उसने लड़के का हाथ पकड़ते हुए कहा, "क्या तुम आज शाम मेरे मेहमान बनोगे? मैं आज अपनी मां के पास नहीं जाऊंगी. यहां घर से अलग मेरे पास एक बहुत ही अच्छा फ्लैट है. मैं तुम्हें बताऊंगी कि स्त्री क्या चीज़ है? पर वह स्त्री, जिसने तुम्हें सिनेमा के दरवाज़े पर पाया या जिसे तुमने चौबीस परगना में देखा, उसे तुम यहां नहीं पा सकोगे... हां, तुम उस स्त्री को देख लोगे, जो कलकत्ता की है.
अनुवाद - सुखबीर
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