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कहानी- चलो सुनैना… (Short Story- Chalo Sunaina)

“क्या तुम्हारी ज़िंदगी पूरी हो गई?”
प्रियम के इस प्रश्‍न पर सुनैना ने अपना सिर झुका लिया और जब उठाया उसकी आंखों में दर्द का एक सैलाब आकर जा चुका था. “तुम्हारे बाद, मैं फिर प्यार नहीं कर पाई. विनय को अपना शरीर दिया, मन नहीं दे पाई. तुम्हारी होने के बाद, मैं ख़ुद अपनी ही नहीं रह गई, तो किसी और की क्या होती…”

कभी-कभी उसे ख़ुद से घृणा होती. वो ख़ुद को धिक्कारती, अपमानित करती. अपनी रूह को कोसती. लेकिन उसकी निर्लज्ज रूह अप्रभावित ही रहती. उसने लोगों को कहते सुना था, दिमाग़ ग़लत भी करने को कह सकता है, पर रूह सदमार्ग पर लाती है. लेकिन उसकी तो रूह ही कलुषित हो गई है.
लोगों के स्वस्थ माता-पिता को देखकर उसे ग़ुस्सा आता. सोचती कि जब उसके सिर से माता-पिता का साया उठ गया, इनके पास ये सुख क्यों! जब किसी बेटे को मां का ध्यान रखते देखती, उसी क्षण उस स्थान को छोड़कर आगे बढ़ जाती. लोगों को अपने भाई, बहन, बुआ, चाचा-चाची, ताई-ताऊ के साथ सुखी देखती, तो मन होता कि उसी क्षण धरती समाप्त हो जाए. सब समाप्त. न कोई सुखी परिवार दिखेगा और न उसे स्वयं के अनाथ होने पर पीड़ा होगी.
इन भावनाओं को अधिक बल तब मिलता, जब इस ओल्ड एज होम में कोई अपना जन्मदिन मनाने आता. उस दिन बढ़िया केक खाने को मिलता. खाना भी अच्छा होता. यहां तक कि बच्चे पैर छूकर बुज़ुर्गों का सम्मान भी करते, लेकिन उसका मन होता कि उन बच्चों और उनके परिवार को धक्के मारकर वहां से निकाल दे. वो ऐसा नहीं सोचना चाहती. पर रूह ने कब किसकी सुनी. वह तो चंचला ठहरी.
तो क्या हुआ, अगर सोशल सर्विस करने आए परिवार अपने साथ कैमरा लाना नहीं भूलते. अपने घरों से जिनकी तस्वीरें उतार ली गई हों, उनके लिए तो इतनी तस्वीरों का लिया जाना सुखद होना चाहिए.
तो क्या हुआ अगर ये लोग, इन तस्वीरों को अपने सोशल मीडिया पर डालकर बताते हैं कि जन्मदिन मनाने का सही तरीक़ा क्या है! फिर ख़ूब प्रशंसा बटोरकर अगले साल किसी अनाथालय का प्रोग्राम बना लेते.
आज के इस आधुनिक युग में ऑर्फनेज और ओल्ड एज होम हैशटैग के लिए बहुत इस्तेमाल होते हैं-
हैशटैगबर्थडेऐटऑर्फनेज
हैशटैगसेलिब्रेशनऐटओल्डएजहोम


अब इतना निवेश कर रहे, तो थोड़ा दिखावा तो बनता है. और फिर ओल्ड एज होम में पड़े उन व्यर्थ लोगों को एक दिन का अच्छा खाना भी तो मुफ़्त में मिल रहा, जिन्हें उनके परिवार ने कूड़े की तरह फेंक दिया. एक दिन के लिए ही सही, सम्मान तो प्राप्त हुआ.
भावना नहीं मूल्य महत्व रखता है. जीवन से अधिक मृत्यु बिकती है.
इस ओल्ड एज होम में रहना 49 वर्षीया सुनैना की विवशता नहीं, निर्णय था. वह बैंक में नौकरी करती और छुट्टी के दिनों में यहां का काम भी देख लिया करती. जीवन में हर रिश्ते से छले जाने के बाद अपने लिए लिया गया यह उसका प्रथम निर्णय रहा. उसने रोक लिया जाना चाहा भी नहीं, और जो रोक सकते थे, उन्होंने उसे जाने दिया. इस ओल्ड एज होम की संचालिका उसकी बचपन की मित्र है. जब मित्र ने हाथ बढ़ाया, सुनैना ने थाम लिया.
अपनी प्रत्येक छुट्टी के चार-पांच घंटे वो यूं ही बालकनी में बैठकर सोचने के लिए रिज़र्व रखती. अभी वो कुछ देर और सोचती रहती अगर पीछे से ओल्ड एज होम की केयर टेकर नम्रता की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ती, “सुनैना दीदी, आज अपना फेवरेट काम छोड़ो और बाहर चलो.”
सुनैना ने तुनकते हुए जवाब दिया, “क्यों आज ऐसा क्या है? तुम जानती तो हो मैं किसी की सोशल सर्विस या ट्रॉफी बनने में इन्ट्रेस्टेड नहीं हूं.”


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“सब जानती हूं. तभी आपको बुलाने आई हूं.” नम्रता ने सुनैना के कंधे को हिलाते हुए प्यार से कहा, तो उसके चेहरे पर भी मंजुल मुस्कान खिल गई. बोली, “ऐसा कौन आया है बाहर?”
नम्रता उसके गले में बांहें डालकर बोली, “कोई ऐसा जो इस ओल्ड एज होम के साथ हमारे ऑर्फनेज को भी अडोप्ट करनेवाला है. सब ठीक रहा, तो अगले महीने से आपको मेंटनेंस नहीं देना पड़ेगा.”
“ये कौन हातिमताई आ गया?” सुनैना ने कुर्सी से उठते हुए कहा, तो नम्रता ने उसका हाथ पकड़ा और बाहर ले जाते हुए बोली, “उसके लिए आपको बाहर चलकर
देखना होगा.”
नम्रता के साथ चलकर सुनैना बाहर हॉल में आ गई. उसने देखा कि सभी लोग हॉल में ही हैं और उन सभी के बीच में एक पुरुष खड़ा कुछ कह रहा है. सुनैना की तरफ़ उस लंबे पुरुष की पीठ होने के कारण वह उसे नहीं देख पाई. किन्तु जब वह उसकी दिशा में मुड़ा, उसके मुख पर दृष्टि पड़ते ही सुनैना जैसे छुपने के लिए कोई जगह तलाशने लगी.
वो प्रियम ही तो है, जिसका साथ छोड़ने से पहले उसने अलविदा कहना भी ज़रूरी नहीं समझा. सुनैना उस समय अदृश्य हो जाने की प्रार्थना करने लगी. ऐसा होना तो संभव नहीं, सो वहां से चले जाने के लिए पलटी कि वही परिचित आवाज़ कान में फ़िर पड़ी, “सुनो, सुनैना!”
सुनैना ने वहां से भाग जाना चाहा, लेकिन, उसके पैर जैसे जम गए हों और शब्द चुप. उसे कुछ न कहता देख नम्रता ने कोहनी मारी और ख़ुद ही बोली, “मुझे ऐसा क्यों लग रहा कि आप दोनों एक-दूसरे को जानते हैं?”
प्रियम ने सुनैना को देखते हुए नम्रता को जवाब दिया, “बहुत अच्छे से! हम…” लेकिन अपनी बात पूरी कर पाता, उससे पहले ही सुनैना ने बोल दिया, “हम कॉलेज में सहपाठी थे.” सुनैना ने यह बात इतनी शीघ्रता में कही कि नम्रता भी उसे घूरे बिना नहीं रह पाई. बोली, “आपको कॉलेज का पुराना साथी क्या मिल गया, आप में तो कॉलेज गोइंग गर्ल वाली चंचलता आ गई. कहां छुपाकर रखा था आपने इस सुनैना को!”


नम्रता की इस बात का सुनैना क्या ही उत्तर देती. इस बात को जल्दी में कहने के पीछे सुनैना का डर था. कैसे बता देती वो कि उसे प्रियम के सच कह देने का डर था. हालांकि अगर प्रियम सच कह भी देता, तो क्या हो जाता. अपने इस मूर्खतापूर्ण व्यवहार पर अब उसे मन-ही-मन रोष होने लगा. लेकिन, कह दिए जाने के बाद, विचार अपने कहां रह जाते. तभी नम्रता की बात का जवाब उसने एक नकली मुस्कान से दे दिया.
लेकिन प्रियम चुप नहीं रहा. अपनी गंभीर आवाज़ में बोला, “इन्हें बातें छुपाने की पुरानी आदत है. यूं ही कॉलेज में हम इन्हें गुप्तेश्‍वरी नहीं पुकारते थे.”
यह सुनते ही नम्रता हंस पड़ी और हंसते हुए सुनैना को देखा, जो प्रियम को ग़ुस्से से घूर रही थीे. इससे पहले कि नम्रता कुछ पूछती, सुनैना ने प्रियम से तेज़ आवाज़ में पूछा, “कौन कहता था मुझे गुप्तेश्‍वरी? झूठ क्यों कह रहे हो?”
सुनैना का यह कहना था कि नम्रता और प्रियम एक-दूसरे को देखकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे. सुनैना को समझ आ गया कि ये भी प्रियम का एक प्रैंक है, जिसमें इस बार उसने नम्रता को भी शामिल कर लिया. बोली, “तुम बिल्कुल नहीं बदले प्रियम!”
यकायक प्रियम गंभीर हो गया और बोला, “किसी एक को तो रुकना ही था न!”
सुनैना कुछ कह नहीं पाई. उनके मध्य के मौन को तोड़ते हुए नम्रता ने कहा, “मुझे ख़ुशी है कि सुनैना दीदी को एक साथी मिल गया.”
प्रियम ने सुनैना के पीले पड़ गए चेहरे पर एक दृष्टि डालकर कहा, “लेकिन लगता है जैसे आपकी दीदी मुझे यहां देखकर ख़ुश नहीं हैं.”
प्रियम की बात सुनकर सुनैना जैसे नींद से जागी हो, “ऐसा तो कुछ नहीं है. मैं ख़ुश हूं. बस इतने सालों बाद तुम्हें सामने देखकर थोड़ी चौंक गई थी.”
प्रियम ने अपने कदम बढ़ाए और सुनैना के निकट जाकर खड़ा हो गया और अपना सिर हल्का नीचे झुकाकर उसकी आंखों में देखते हुए बोला, “ऐसी बात है तो
फिर चलो.”
प्रियम की इस बात से सुनैना के साथ-साथ नम्रता भी चौंक गई, “कहां चलना है?”
प्रियम की आंखों में शरारत तैर गई.
“बाइक राइड पर.”

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“तुम पागल हो गए हो, ये भी कोई उम्र है?” सुनैना ने नम्रता की तरफ़ देखते हुए कहा, जैसे उससे अपनी बात का समर्थन चाह रही हो. लेकिन नम्रता चुप ही रही. न हां कहा और न ना. नम्रता की तटस्थता ने सुनैना की स्थिति को कमज़ोर कर दिया. इस बात का लाभ उठाकर प्रियम ने कहा, “क्या हो गया तुम्हारी उम्र को? अच्छी-ख़ासी तो लग रही. और अगर मेरे लिए परेशान हो, तो याद दिला दूं कि मैं तुमसे पूरे तीन महीने बारह दिन छोटा हूं.”
इस बार नम्रता के साथ-साथ सुनैना भी चाहकर अपनी हंसी नहीं रोक पाई. हंसते हुए ही कहा, “मुझे सब याद है. लेकिन क्या तुम सच में इस उम्र में बाइक चला पाओगे?”
“मैडमजी, बाइक चलाने के लिए उम्र नहीं, फिटनेस चाहिए और एक नज़र मुझ पर डालिए… क्या मैं कहीं से भी आपको अनफिट नज़र आ रहा हूं.”
प्रियम ने अपने कंधे पर हाथ मारते हुए कहा, तब पहली बार सुनैना ने उसे ठीक से देखा. छह फुट का प्रियम पहले बहुत दुबला-पतला हुआ करता था. मज़ाक में सुनैना तो उसे कभी-कभी काग़ज़ भी कह दिया करती थी. लेकिन आज उस दुबले-पतले प्रियम की जगह एक कसरती बॉडीवाला हैंडसम और सफल बिजनसमैन
खड़ा था.
वो कुछ देर और प्रियम को देख लेती अगर नम्रता उसके कान में न फुसफुसाती, “आंखों से ही खा जाने का इरादा है क्या दीदी इस हैंडसम को? वैसे सोच लो, अगर तुम नहीं जाना चाहती, तो मैं जाने ले लिए रेडी हूं.”
नम्रता की इस बात का जवाब सुनैना को धीरे से देना था, लेकिन उसे एहसास भी नहीं हुआ और वो तेज़ आवाज़ में बोल गई, “अरे, मैं जा तो रही हूं. बस ज़रा कपड़े बदल लूं.”
प्रियम के चेहरे पर ख़ुशी दौड़ गई. बोला, “ठीक है तुम तैयार होकर आओ. मैं अपने किसी आदमी को भेजकर बाइक का इंतज़ाम करता हूं.”
जब सुनैना तैयार होकर बाहर आई, प्रियम उसे देखता रह गया. सफ़ेद सलवार-कुर्ते के साथ उसने इंद्रधनुष रंग का दुपट्टा ले रखा था. कब सुनैना उसके पास आकर खड़ी हो गई, प्रियम को पता ही नहीं चला.
प्रियम का यूं निहारना सुनैना को बेचैन कर गया. धीरे से बोली, “अब चलोगे या घूरते ही रहोगे.”
“मन सोच रहा है तुम्हें. लेकिन वही मन कह रहा है कि किसी और को भी तुम्हारा इंतज़ार है. अब आओ बैठ जाओ और सुनो, क्रॉस लेग बैठना, जैसे पहले बैठती थी.” प्रियम ने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा.
“पहले की तरह अब कुछ नहीं है प्रियम, न तुम, न मैं, न हमारी पदवी और न परिस्थिति. इसलिए प्लीज़ मुझे फोर्स मत करो.”
“ठीक है. जैसे बैठना हो, बैठो.” प्रियम की आवाज़ में आई गंभीरता ने सुनैना के मन को भी छुआ. बैठते-बैठते वो रुकी और कुछ सोचकर क्रॉस लेग बैठ गई. प्रियम के चेहरे पर मुस्कान लौट आई.
उसने कहा, “लेट मी टेक यू टू स्टार्स.” और बाइक आगे बढ़ा दी.
थोड़ी देर में ही बाइक ने देहरादून शहर को पीछे छोड़ दिया. बाइक जब भी उछलती सुनैना का शरीर, प्रियम की पीठ से टकरा जाता. हर बार वो थोड़ा पीछे हो जाती और सीट के पीछे लगे रॉड को पकड़ लेती. इस बार जब ऐसा हुआ और वो पीछे होने लगी, प्रियम ने अपना हाथ पीछे किया और सुनैना के पीछे जाते हाथ को पकड़कर अपनी कमर से लगा लिया. सुनैना का शरीर जैसे तितली बन गया और उसने ख़ुुद को खुला छोड़ दिया. प्रियम को पकड़ते ही उसका सिर अपने आप उसके कंधे पर झुक गया.
प्रियम ने मसूरी के कुछ पहले एक छोटे से घर के सामने बाइक रोक दी. सुनैना को कुछ समझ नहीं आया, तो उसने पूछ लिया, “ये किसका घर है प्रियम? और हम यहां क्यों हैं?”
प्रियम मुस्कुराता हुआ बोला, “तुम जानती हो. बस भूल गई हो. मैं याद दिलाऊंगा, मेरे साथ चलो सुनैना…” और उसका हाथ पकड़कर घर की बॉउंड्री का गेट खोलकर अंदर चला गया.
छोटा-सा लॉन. हरी घास, एक किनारे अमरूद का पेड़. अनेक रंग के गुलाब खिले थे, जिनके बीच खड़ी थी बस दो रजनीगंधा, कुछ दूर लेकिन बहुत पास. रजनीगंधा पर नज़र पड़ते ही सुनैना चलते-चलते रुक गई. प्रियम की आंखों में उतरकर बोली, “तुम मुझे छू लो, इतने पास चाहे कभी न आना, लेकिन तुम मन को न पढ़ सको, इतने दूर कभी न हो जाना…”
“तो, तुम्हें याद आ गया सुनैना..!”
“मुझे वो याद आ गया जिसे तुम कभी भूले ही नहीं.”
“भूलने की क्रिया, याद के चले जाने के बाद होती है. और तुम, मेरी याद में नहीं, मुझमें रहती हो.”
“प्रियम…”
“अब अंदर चलो…”
इतना बोलकर प्रियम ने घर का दरवाज़ा खोल दिया.
“अंदर चलो. पिछले कुछ सालों से ये घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है. आज जब तुम्हारे आने से पहले तुम्हारे आने की ख़बर आई, तो चलकर देखो तो दीवारें कहीं रो तो नहीं रहीं…”

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सुनैना ने प्रियम को आश्‍चर्य से देखा और बोली, “क्या तुम पहले से जान गए कि मैं उस ओल्ड एज होम में हूं.”
“तुम तीस साल पहले मुझे छोड़कर गई थी. मैंने पंद्रह साल पहले इस घर को बनाया और तब से तुम्हें तलाश रहा हूं. लेकिन तुम्हें पाने की चाहत में नहीं. मैंने बस एक दिन तुम्हारे साथ इस घर में रहना चाहा. यह घर तुम्हारी प्रतीक्षा में है. मुझे दो साल पहले तुम्हारे पति की मृत्यु की जानकारी हुई. ये भी पता चला कि तुम दिल्ली में रहती हो. जब वहां पहुंचा, तो पता चला तुमने दिल्ली छोड़ दी है. लेकिन मैंने तुम्हें खोजना नहीं छोड़ा. एक सप्ताह पहले तुम्हारे उस ओल्ड एज होम में होने का पता चला.”
सुनैना प्रियम के क़रीब आई और बिना झिझक उसके चेहरे को अपनी हाथों में थामकर बोली, “तुम मेरे साथ इतने नॉर्मल क्यों हो? तुम्हें तो मुझसे नफ़रत करनी चाहिए. प्रेम में एक अलविदा कहना तो बनता है. मैंने तो तुमसे वो हक़ भी छीन लिया.”
प्रियम ने सुनैना के हाथों को चूमकर कहा, “तुम्हारे जाने का और जाकर न आने का दर्द बहुत है. लेकिन नफ़रत, अगर मेरी आंखें तुम्हारी विवशता नहीं पढ़ पातीं, तब भी शायद नहीं करतीं. तुम्हारे लिए मेरे प्यार को कोई घृणा छू नहीं सकती. वैसे भी, एक बात है, जो तुम नहीं जानती…” प्रियम कहते-कहते रुक गया और उसकी कुछ खोजती सी दृष्टि को अपनी दृष्टि से बांधकर सुनैना ने पूछा, “क्या नहीं जानती मैं?”
“तुम्हारा मेरी दहलीज़ तक आना और फिर वहीं से लौट जाना.”
भावावेश में सुनैना ने प्रियम के कंधों को झकझोर दिया और बोली, “फिर तुमने मुझे क्यों नहीं रोका?”
प्रियम ने सुनैना की कमर को अपनी बांहों के घेरे में लेकर कहा, “क्योंकि मैं जानता था कि जो लड़की, प्यार है नहीं कह पाई, वो अलविदा कैसे कह पाएगी.”
इतना सुनते ही सुनैना की आंखों पर बंधा बांध टूट गया. कुछ देर सुनैना यूं ही रोती रही और प्रियम उसके केशों को चूमता रहा.
थोड़ी देर बाद सुनैना ने प्रियम के सीने से अपना सिर उठाया और बोली, “तुमने तो मुझे मेरे अपराध के लिए बरी कर दिया. लेकिन भगवान ने नहीं किया. तभी शायद मेरे दोनों बेटे नालायक निकले. कुछ अधिक ही बुद्धिमान. अपनी मां को यहां छोड़कर विदेश जो गए, फिर लौटे ही नहीं. मैं दो साल रोई, बहुत रोई. लेकिन फिर एक दिन मेरे आंसू सूख गए. मैंने उन्हें त्याग दिया और इस ओल्ड एज होम में शिफ्ट हो गई.
घर को किराए पर लगा दिया. नौकरी तो थी ही. लोगों ने मना किया. लेकिन लोगों की परवाह करना तो मैंने उसी दिन छोड़ दिया, जब बेटे से त्रस्त अपने मम्मी-पापा को घर लाई. मेरे इस निर्णय से विनय, मेरे पति, बहुत ख़ुश नहीं हुए, लेकिन मेरी नौकरी मेरा संबल बनी. और फिर अपने सास-ससुर के प्रति भी मैंने प्रत्येक कर्तव्य का निर्वहन किया. उनसे कुछ करने की तो उम्मीद कभी नहीं रही. मौन की थी, वो मिल गई.”
“तुम्हारा हर निर्णय सही है.”
अचानक जैसे सुनैना को कुछ याद आया और उसने पूछा, “लेकिन तुमने अपने परिवार के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं.”
प्रियम ने सुनैना को सीढ़ियों पर बैठने का इशारा किया और उसके बैठते ही ख़ुद भी उसके पास बैठ गया.
“बताने लायक कुछ विशेष नहीं है. तुम्हें याद होगा हम एक बच्चा गोद लेने की बात करते थे. तो मैंने एक बेटी गोद ली है. उसका नाम नैना ही रखा है, जैसा तुम चाहती थी. आजकल दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन कर रही है. बस…”
सुनैना की आंखें प्रियम से हट ही नहीं रही थीं. उसके होंठ कुछ कहने के लिए ऐसे हिले, मानो बड़ी मुश्किल से खुल रहे हों, “तुम नैना को ले आए, तुम हमारी नैना को ले आए. लेकिन तुम्हारा क्या? तुम्हारी ज़िंदगी तो अधूरी ही रही!”
“क्या तुम्हारी ज़िंदगी पूरी हो गई?”
प्रियम के इस प्रश्‍न पर सुनैना ने अपना सिर झुका लिया और जब उठाया उसकी आंखों में दर्द का एक सैलाब आकर जा चुका था. “तुम्हारे बाद, मैं फिर प्यार नहीं कर पाई. विनय को अपना शरीर दिया, मन नहीं दे पाई. तुम्हारी होने के बाद, मैं ख़ुद अपनी ही नहीं रह गई, तो किसी और की क्या होती…”
ठीक उसी समय प्रियम ने देखा ढलते सूरज की लालिमा सुनैना के माथे पर पड़ रही है. उसने सुनैना के चेहरे को अपने हाथों में लेकर, उसका माथा चूम लिया.
सुनैना के होंठों पर तीन अक्षर का प्रिय नाम फिसला, “प्रियम!”
“चलो सुनैना, भीतर चलो!”

पल्लवी पुंडीर

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