वह स्वयं भी तो अपने आपको अब तक उसे भूलने का मात्र छलावा ही तो देती आई है. फिर, अब तक जब वह उसे नहीं भूल सकी है तो क्या अब भूल पाएगी? और फिर एक बार कहीं अपने आपको छलने तो नहीं जा रही वह?और एकाएक ही जैसे उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया.
तीन दिन की सेमिनार ख़त्म हो चुकी थी, इसलिए सब लोग अब जाने की जल्दी में थे, पर शोभा को आराम से पलंग पर कंबल ओढ़े सोता देखकर रमाजी चौंकी थीं. “अरे, चलना है कि नहीं… सात बजे की ट्रेन है. अभी घंटा भर तो नीचे उतरने में लगेगा.”
“ओफ़ ओ..!”शोभा ने करवट ली थी, “भई, तुम लोग जाओ. मैं तो अभी बची हुई दो-तीन दिन की छुट्टी यहीं पहाड़ पर गुज़ारने के मूड में हूं. मुझे तो पहाड़ों की बारिश बहुत पसंद है.”
“ओफ़! तुमसे तो बात करना भी फ़िज़ूल है.”
जाते समय फिर डॉ. प्रसाद और रामनाथनजी ने भी बहुत कहा था शोभा से साथ चलने को, पर वह ज़िद करके रुक ही गई थी.
सबके जाने के बाद वहां और अकेलापन, एकांत हो गया था. शोभा सोच रही थी कि कभी कभी एकांत भी कितना सुखद लगता है. कहीं जाने की जल्दी नहीं उठकर तैयार होकर भागने की जल्दी नहीं. मन चाहे तब उठो, मन चाहे तब नहाओ, खाओ… वाह! लग रहा था कि जैसे काफ़ी दिनों की थकान है. वह देर तक सोती रही थी.
नौ बजे फिर वेयरे की घंटी की आवाज़ से ही नींदटूटी थी, “मैडम, नाश्ता लेने हॉल में आएंगी या यहीं कमरे में भिजवाऊं?” वह पूछ रहा था और शोभा को याद आया कि उसने सुबह से चाय भी नहीं पी है.
“ठीक है, मैं अभी पन्द्रह मिनट में वहीं आ रही हूं.” कहकर वह सीधी बाथरूम में घुस गई थी. खिड़की के शीशे से देखा, अभी भी बाहर फुहारें पड़ रही थी. बारिश में पहाड़ कितने सुहावने हो जाते हैं, दूर बादलों से ढंके पहाड़ और पेड़ों से टपकती पानी की बूंदें… यही सब देखने को तो वह यहां आई है.
दस मिनट में तैयार होकर वह डाइनिंग हॉल की तरफ़ बढ़ गई थी. आज हॉल भी खाली सा था. ये तो सर्किट हाउस हमेशा ही भरा रहता था, पर आज शायद और भी काफ़ी लोग जा चुके थे.
“मैडम, लंच डेढ़ बजे तक तैयार हो जाएगा.” बेयरे ने प्लेटें समेटते हुए कहा. “ठीक है, मैं बाहर ही हूं, बुला लेना और देखो, दो-एक कुर्सियां बाहर लॉन में उस घने पेड़ के नीचे डाल दो. मैं थोड़ी देर वहीं बैठूंगी.”
“पर अभी तो बारिश…” बेयरा कुछ हिचकिचाया था.
“अरे, ये तो हल्की फुहारे हैं. कौन-सा भीग जाऊंगी.” शोभा हंसी.
“ठीक है मैडम…”
पेड़ के नीचे चुपचाप बैठना या पढ़ना उसे अच्छा लगता है, अतः वह पढ़ने के लिए किताब भी साथ ले आई थी. वैसे भी शहर की व्यस्तता भरी ज़िन्दगी में स्वयं के लिए कितना कम समय मिल पाता है. अब आराम से उन किताबों को पढ़ेगी, जो कभी उसने बड़े चाव से ख़रीदी थीं.
किताब हाथ में लेते ही दृष्टि यूं ही सामने फाटक से टकराई थी. एक सफ़ेद कार फाटक पर खड़ी हुई थी और एक लंबा-सा
व्यक्ति गहरी नीली शर्ट और सफ़ेद पैंट पहनें गाड़ी
में बैठ रहा था. उसने ड्राइवर से कुछ कहा था और गाड़ी चल पड़ी थी. अक्षय… पीछे से वह व्यक्ति अक्षय से काफ़ी मिलता जुलता था. अक्षय भी तो अक्सर ऐसी ही गहरी नीली शर्ट और सफ़ेद पैंट पहना करता था और शोभा उसे चिढ़ाया करती थी.
“यह यूनीफॉर्म है क्या तुम्हारे कॉलेज का…” बस, यूनीफॉर्म शब्द सुनते ही अक्षय चिढ़ जाता और शोभा को मज़ा आ जाता.
सोचते ही उसे फिर हंसी आ गई थी. कितनी पुरानी बात हो चुकी हैं यह अब. दस-बारह साल तो हो ही गए होंगे. अक्षय भी आजकल कहां है, उसे मालूम नहीं. फिर, अचानक ही आज उसकी याद क्यों आ गई? मन फिर किताब में लगाना चाहा था, जैसे अपने बरसों पुराने उसी छोटे-से शहर में पहुंच गई हो, जहां कॉलोनी के छोटे-छोटे सरकारी मकान थे. उसके मकान से दो-चार मकान और छोड़कर ही अक्षय का घर था. तब पड़ोस में भी कितनी घनिष्ठता हुआ करती थी.
बचपन का उसका अधिकांश समय अक्षय के यहांही बीतता था. अक्षय की मां का बहुत लाड़ भी था उस पर. अक्षय उस घर का इकलौता बेटा था.बचपन में यह अक्षय को अक्षयदा ही कहती थी. उसके टूटे खिलौनों को जोड़ने से लेकर स्कूल की पढ़ाई की मदद तक के अनेक कार्य वह अक्षय को कब और कैसे सौंपती गई, उसे स्वयं भी याद नहीं.
स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करके अक्षय डॉक्टरी पढ़ने बाहर चला गया था. वह भी दसवीं कक्षा में आ गई थी. तब उसे पहली बार एहसास हुआ था कि अक्षय के जाते ही मन बुझने लगता है और वह आतुरता से प्रतीक्षा करती है कि कब छुट्टियां हों और अक्षय घर आए, अक्षय को बताने के लिए कितनी सारी बातें इकट्ठी हो जाती थीं. अक्षय भी तो अपने कॉलेज के मज़ेदार क़िस्से सुना-सुनाकर उसे ख़ूब हंसाया करता था. फिर उसके कॉलेज के विषय भी अक्षय ने ही चुने थे. शोभा को अब अक्षय को अक्षयदा कहने में कुछ संकोच सा होता था. अक्सर वह बिना किसी संबोधन के ही काम चला लेती. अक्षय के साथ अकेले कहीं आने-जाने में भी झिझक सी लगती. एक दिन उसके कॉलेज की ही किसी लड़की ने टोका था, “कहां जा रही थी कल अपने बॉयफ्रेंड के साथ?” उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया था, चाहकर भी वह कुछ कह नहीं पाई. बाद में ख़ुद पर ही ग़ुस्सा आया कि क्यों नहीं कह सकी कि बॉयफ्रेंड नहीं, अक्षयदा थे.
यह भी पढ़ें: संबंधों से निकलने की नई तस्वीर- फंबलिंग (New image of getting out of relationships- fumbling)
कभी कभी जब बात करते-करते अक्षय चुपचाप उसकी तरफ़ देखने लगता तो वह संकुचित हो उठती थी. पहलेतो कितना लड़ा-झगड़ा करती थी, पर अब क्यों नहीं कुछ कह पाती है? अक्षय का व्यवहार भी अब उसे बदला-बदला सा लगता. आते ही ज़िद करता, “चलो शोभा, बाग तक धूम आएं” या “बाज़ार हो आएं.”
वह टालमटोल करने लगती. पिछले दो दिनों से वह नाटक में चलने की ज़िद कर रहा था. रवीन्द्र नाट्य गृह में बड़ा अच्छा नाटक खेला जा रहा था. दो टिकट उसने एडवांस मंगा रखे थे.
“तुम्हें तो नाटक देखने का बड़ा चाव था न. फिर अब चलती क्यों नहीं?” झुंझलाकर उसने डांटा था”पर अकेली… अंजू को भी ले चलें?”
“क्यों अकेली, तुम्हें क्या मैं खा जाऊंगा?” वह चिढ़ गया था.
“नहीं, पर पापा से भी तो पूछना होगा.”
“तुम उस बूढ़े खुसट की क्यों इतनी परवाह करती हो?”
अचानक ही अक्षय के मुंह से निकले ये शब्द उसके हृदय पर बाण की तरह आ लगे थे.
“अक्षय…” वह जैसे चीख पड़ी थी.
“हिम्मत कैसे हुई तुम्हें मेरे पापा के लिए यह कहने की?” क्रोध से उसका सारा शरीर कांप रहा था. “सॉरी शोभा… मेरा यह मतलब नहीं था.”
“चले जाओ यहां से और अब आइन्दा इस घर में कदम मत रखना.”
“शोभा…” अक्षय और कुछ बोल पाता कि वह तेजी से अंदर दौड़ गई थी और अपना कमरा बंद कर लिया था. बिस्तर पर औंधे मुंह गिरकर देर तक सिसकती रही थी. वह तो अच्छा हुआ कि अंजू और मंजू उस समय घर पर नहीं थीं. मां भी शायद पड़ोस में कहीं गई हुई थीं और पापा ऑफिस से घर नहीं लौटे थे.
दो-तीन दिन तक उससे फिर ठीक से खाया पिया भी नहीं गया था. अक्षय के वे ही शब्द उसके कानों में गूंज जाते और उसे लगता कि उसके दिल-दिमाग़ से लेकर नस नस तक में कडुवाहट घुलती जा रही है. घर से बाहर निकलने तक का मन नहीं होता था. तीन-चार दिन बाद ही अंजू ने बताया था कि अक्षयदा छुट्टियां ख़त्म होने पर चले गए हैं. उसने एक शब्दभी नहीं कहा था.
उस दिन कॉलेज से घर लौट रही थी कि सड़क पर ही अक्षय दिख गया था. शायद कहीं से पैदल आ रहा था.
“शोभा…” उसने आवाज़ दी. उसे और क्रोध हो आया. यह कौन-सा तरीक़ा हुआ बात करने का?
घर पर आकर ढंग से बात नहीं हो सकती थी क्या? शोभा ने बिना बात का जवाब दिए ही साइकिल तेज़ कर दी थी. फिर भी उसे उम्मीद थी कि अक्षय ज़रूर पीछे-पीछे घर आएगा. दो बार खिड़की के पास आकर उसने देखा भी, पर अक्षय शायद वहीं से लौट गया था. फिर एक दिन सुना कि वह वापस जा चुका है. अक्षय को उसकी कोई परवाह नहीं, न चाहते हुए भी उसकी आंखें भर आई थीं. वह ही क्यों उसके बारे में इतना सोचती रहती है? अब कभी नहीं सोचेगी, कभी नहीं. उसने बार-बार मन में दोहराया था, शायद यह भी मन का ही कोई संकल्प रहा होगा. दो महीने बाद ही पापा का तबादला हो गया था और वे लोग उस शहर को छोड़कर मीलों दूर पहुंच गए थे.
बीए करके वह एमए कर रही थी. मां के पास कभी कभार अक्षय की मां का कोई पत्र आ जाता. पत्र से ही मालूम हुआ कि अक्षय की पढ़ाई पूरी हो गई है, वह मुंबई में है. फिर एक पत्र से पता चला कि अक्षय अपनीही पसंद की किसी लड़की से शादी करके विदेश जा रहा है. उस रात वह अपनी आंखों में दबे आंसू रोक नहीं पाई थी. उसे लगा कि अगर वह सुनती कि अक्षय की पारंपरिक ढंग से शादी हो रही है, तब शायद इतना दुख नहीं होता. पर अक्षय का प्रेमविवाह… उसे जैसे रह-रहकर दंश देने लगा था. अब तक वह अक्षय के साथ अपने संबंध को परिभाषित नहीं कर पाई थी, पर आज अचानक ही जैसे सारा सत्य स्वयं ही प्रकाशित हो उठा था.
उसने पढ़ाई तथा दूसरी व्यस्तताओं में अपने आपको डुबोए रखने का प्रयास किया था. अंजू, मंजू कभी अक्षय को लेकर कोई बात करतीं भी तो वह अनसुनी ही करती थी. पढ़ाई के बाद मां-पापा ने उसके लिए रिश्ते देखने शुरू किए, पर कहीं उसका सांवला रंग आड़े आता तो कहीं दहेज की मोटी रकम. एम.ए. के बाद उसने पी.एच.डी. कर ली थी, फिर विश्वविद्यालय में ही नौकरी भी मिल गई थी.
अंजू और मंजू के लिए अब मां और सचेत हो गई थी. बेटियों के विवाह कम उम्र में ही कर देना अधिक श्रेयस्कर है, सोचकर उन्होंने बी.ए. के बाद ही अंजू और मंजू दोनों के रिश्ते तय कर दिए. देखने में भी दोनों शोभा की अपेक्षा अधिक सुंदर थीं.
फिर मां का अचानक ही छोटी-सी बीमारी के बाद निधन हो गया था. विवाह के नाम से शोभा को अब अपने आप से विरक्ति होने लगी थी.
“पापा… अब आप मेरे विवाह की चिन्ता छोड़िए और यह घर छोड़कर मेरे साथ ही रहिए.”
ज़िद करके वह पापा को अपने साथ ही ले आई थी. सचमुच ही अब उसे अपने अकेलेपन में ही रस मिलने लगा था. पर आज… अचानक ही क्यों इतनी ढेर सी बातें याद आ गई? झुंझलाकर उसने फिर से खुली किताब में मन लगाना चाहा कि फिर कार रुकने और फाटक खुलने की आवाज़ आई और उसका ध्यान बंट गया. सामने से आते व्यक्ति को देखकर इस बार वह सचमुच ही चौंक गई थी.
अक्षय… हां अक्षय ही तो है तेज़ी से चलता हुआ अक्षय एकाएक ही शोभा के पास आकर चौंककररुक गया था.
“शोभा… तुम… यहां…”
और वह अचकचा कर खड़ी हो गई थी. एकाएक कोई शब्द ही मुंह से नहीं निकला था. पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया था.
“यहां कैसे आए?” उसने सहज होने का प्रयास किया था.
“मैं आजकल अहमदाबाद में हूं आबू रोड में कुछ काम था. सोचा कि छुट्टी यहीं पर बिताऊंगा,”
शोभा ने सोचा कि पूछे, अकेले ही आए, पर चुप रही.
“विदेश से कब लौटे?”
“पिछले साल आ गया था. और सुनाओ कैसी हो? यहां कैसे?”
“आजकल जयपुर में हूं. यहां सेमिनार में आई थी. सेमिनार तो ख़त्म हो गया, पर मैं…”
वह और कुछ बोल पाती कि उसे लगा, अक्षय की दृष्टि जैसे उसके सिर के बालों में उलझ कर रह गई है. वह अचकचा सी गई. ध्यान आया कि आज तो ढंग से तैयार भी नहीं हुई थी. यूं भी आजकल अपने प्रति लापरवाह सी रहती है, पर अक्षय इतने ध्यान से क्या देख रहा है? शायद मांग के आसपास चमकते चांदी के बालों को. मन कुछ बुझ-सा गया था.
“और सब कैसे हैं?”
“ठीक हैं. अंजू और मंजू ब्याह कर ससुराल गई, मां रही नहीं. पापा मेरे पास ही हैं जयपुर में.”
“तुम्हारे पास?” वह कुछ और पूछ पाता कि तभी ड्राइवर ने आकर सूचना दी, “साब, विनोदजी बाहर खड़े आपका इंतज़ार कर रहे हैं.”
“अच्छा अच्छा… मैं आ रहा हूं. नीचे जाकर बोल तो दिया न कि हम लोगों का लंच बाहर है?”
“जी साब.” कहकर ड्राइवर चला गया.
“तुम तो अभी यहीं हो न शोभा? मुझे यहां थोड़ा-सा काम है. शाम तक फ्री हो जाऊंगा, तब मिलते हैं ओ. के.”
अक्षय चला गया था. शोभा कुछ बोल भी नहीं पाई थी. अपने पर ग़ुस्सा भी आया कि क्यों चुप रही? कह देती कि उसे भी काम है.
खाना खाने के बाद कमरे में आकर उसे स्वयं पर ही लज्जा आई थी. क्यों वह सहज नहीं हो पाती है? अब तो वह परिपक्व हो चली है. अगर अक्षय मिल भी गया तो क्या हुआ? ढंग से दो-चार बात कर लेगी. ट्रेन में तो रात को रिज़र्वेशन मिलना मुश्किल होगा. सुबह की बस से जयपुर चली जाएगी. उसका अब यहां अधिक रुकने का मन नहीं हो रहा था. रमाजी ठीक ही कहती थीं, बारिश में तो पहाडों पर और बोरियत होती है. गिचपिच-सा मौसम… सब कुछ गीला-गीला. बाहर भी घूमने नहीं निकल सकते. दोपहर में फिर नोंद भी नहीं आई थी. पता नहीं, अक्षय कब आएगा? उसने तो समय भी नहीं पूछा था.
वह शाम को फिर हाथ मुंह धोकर तैयार हो गई. बारिश भी अब थम गई थी. कमरा बंद कर वह बाहर लॉन में निकल आई थी. तभी बाहर कार का हॉर्न बजा था. कदम पता नहीं, कैसे ख़ुद-ब-ख़ुद फाटक की तरफ़ मुड़ गए थे.
“सारी शोभा, मुझे देर हो गईं. ये है मि. विनोद.” अक्षय ने कार से उतरकर अपने पास खड़े व्यक्ति से शोभा का परिचय कराया.
विनोद ने भी नमस्कार किया, “ये हैं शोभा…” पता नहीं कुछ देखते हुए क्या सोचा हो.
“मुझे विनोद को ट्रेन पर छोड़ने आबू रोड तक जाना है, तुम भी चलो.” अक्षय ने शोभा की तरफ़ देखते हुए कहा था. कुछ न कहकर वह चुपचाप कार में बैठ गई थी.
“तुम्हारा भी तो आज ही अहमदाबाद जाने का प्रोग्राम था. रुक क्यों गए?” विनोद ने रास्ते में पूछा था.
“हां, थोड़ा सा काम रह गया है. कल तक फ्री हो पाऊंगा.” अक्षय ने कहा था.
शोभा चुपचाप खिड़की के बाहर देख रही थी. मन में ढेरों प्रश्न उमड़ रहे थे. पूछे कि रीता कैसी है? बच्चे होंगे. आए क्यों नहीं वे लोग? पर कुछ भी पूछ नहीं पा रही थी. आते समय ये पहाड़, ये वृक्ष, ये मौसम, सभी कुछ कितना अच्छा लगा था, पर अब इतना बेमानी क्यों लगने लगा?
स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि गाड़ी आने ही वाली है. अक्षय कुछ दूर खड़ा हुआ विनोद से बातें कर रहा था. शोभा चुपचाप रेल की पटरियों को देख रही थी. कभी उसके पासकितनी बातें होती थीं अक्षय से कहने-सुनने की, पर आज… आज वह और अक्षय जैसे नितान्त अजनबी हो गए हैं एक-दूसरे के लिए, दोनों की जीवन-धाराएं अलग-अलग दिशाओं में मुड़ चुकी है. ठीक इन रेल की समानान्तर पटरियों की तरह, जो कभी आपस में नहीं मिलती हैं. न चाहते हुए भी एक लंबी सांस निकल गई थी.
ट्रेन में विनोद को बिठाकर अक्षय और शोभा बाहर आ गए थे.
“तुम्हें यहां पर कोई काम तो नहीं है?” अक्षय ने पूछा था.
“नहीं…”
“तो फिर ऊपर ही चलते हैं, वहीं चाय पिएगे.”
“अकेले कैसे आए?” कार में बैठकर शोभा ने पूछा था.
“अकेले… अब अकेला ही हूं. रीता न्यूयॉर्क ही रुक गई. उसका यहां आने का कोई इरादा नहीं है.”
शोभा ने देखा कि अक्षय का चेहरा एकाएक ही तनावग्रस्त हो गया है. जेब टटोलकर उसने सिगरेट केस और लाइटर निकाला और गर्दन पीछे की सीट पर टिका दी.
वातावरण कुछ बोझिल सा हो गया था. वह पूछना चाह रही थी कि रीता क्या अब कभी भी…
पर वह चुप रही.
“रीता के साथ जो कुछ भी था, समाप्त हो गया है.”
कुछ देर बाद अक्षय ने खिड़की का आधा शीशा खोलते हुए कहा था. कार में सिगरेट की महक फैल गई थी.
शोभा उसी प्रकार अनमने ढंग से बाहर देखती रही. अक्षय ने जब दूसरी के बाद फिर तीसरी सिगरेट सुलगानी चाही तो वह अपने आपको रोक नहीं पाई थी.
“बहुत सिगरेट पीने लगे हो.”
उसने हाथ से सिगरेट केस लेना चाहा था. सिगरेट केस तो छूट गया, पर हाथ अक्षय की मुट्ठी में ही रह गया.
“चलो, तुम कुछ तो बोली…” अक्षय ने हंसकर कहा था. फिर अपने देश के क़िस्से सुनाता रहा था.
सर्किट हाउस पहुंचे तो खाना तैयार था. और भी कुछ लोग आ गए थे, इसलिए डाइनिंग हॉल भरा हुआ था.
“कॉफी नीचे कमरे में ही चलकर पिएंगे.” कहकर अक्षय कॉफी का ऑर्डर देकर शोभा को अपने कमरे में ले आया था.
“और सुनाओ, तुम कैसी हो? पापा कैसे हैं?”
शोभा ने देखा कि पापा शब्द कहते हुए अक्षय का स्वर कुछ कांप सा गया था. उसे स्वयं ही हंसी आ गई थी. अक्षय ने धीरे-से उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया.
“जानती हो, मैं आज यहां क्यों रुका? मैं कल तुम्हारे साथ ही जयपुर चलना चाहता हूं. पापा से बात करने…” अक्षय उसकी ओर देखते हुए अर्थपूर्ण हंसी हंसा था. “तुम्हें कोई ऐतराज़ है?”
“ऐतराज..?” शोभा का हाथ अक्षय की मुट्ठी में भी कुछ सिहर-सा गया था.
“अक्षय, क्या तुम नहीं सोचते कि हम बहुत ही जल्दबाज़ी में निर्णय ले रहे हैं.” कुछ देर बाद उसने कहा था.
‘जल्दबाज़ी कैसी? हम एक दूसरे के लिए नए तो है नहीं. इतना पुरानापरिचय रहा है. मुंह से कुछ कहा न हो, पर एक-दूसरे के मन की भावनाएं तो जानते ही थे.”
“पर अक्षय, अब पहले वाली बात तो रही नहीं है न… इसलिए थोड़ा समझने-बुझाने का…”
देर तक मन में घुमड़ने वाले विचार होठों पर आ ही गए.
“ठीक है शोभा, तुम और विचार कर लो. मैं तुम पर कोई दबाव नहीं डालना चाहता.” अक्षय ने शोभा का हाथ छोड़ दिया था.
शोभा ने और दो-चार औपचारिक बातें करनी चाहीं, पर देखा कि अक्षय अनमना-सा ही बना रहा था. पलंग पर अधलेटे हो उसने आंखें बंद कर ली थीं. गुडनाइट कहकर वह उठ खड़ी हुई थी. गुडनाइट कहकर शायद अक्षय ने और कुछ कहना चाहा था, पर शोभा बाहर आ गई थी.
रात देर तक उसे नींद नहीं आई थी. समझ नहीं पा रही थी कि क्या निर्णय ले? क्या अक्षय के साथ वह सचमुच सुखी हो सकेगी? यही बात
अगर अक्षय ने बरसों पहले कही होती तो वह शायद ख़ुशी से झूम उठती. शायद ऐसा ही कुछ सुनने का उसने उन दिनों बेसब्री से इंतज़ार किया था, पर अब… अब अक्षय पहले वाला अक्षय नहीं रह गया है, जो भी हो, अक्षय की ज़िंदगी में और भी कोई आया था. अभी भी उसका कहीं अस्तित्व तो है ही… यह वह कैसे नकार सकेगी? वह अक्षय को साफ़ इन्कार कर देगी. अक्षय का व्यथित चेहरा फिर आंखों के सामने कौंधा.
वह स्वयं भी तो अपने आपको अब तक उसे भूलने का मात्र छलावा ही तो देती आई है. फिर, अब तक जब वह उसे नहीं भूल सकी है तो क्या अब भूल पाएगी? और फिर एक बार कहीं अपने आपको छलने तो नहीं जा रही वह?और एकाएक ही जैसे उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया. बहुत गहराई से उसने अक्षय को अब तक चाहा है और इस सत्य को कल सुबह अक्षय के सामने भी अब स्वीकार करने में वह हिचकिचाएगी नहीं.
– डॉ. क्षमा चतुर्वेदी
अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
