कहानी- कंटेजियस (Short Story- Co...

कहानी- कंटेजियस (Short Story- Contagious)

“आप ऐसे क्यों नहीं सोचतीं कि सिर्फ़ बीमारी ही कंटेजियस नहीं थी. उस वक़्त कार्तिक के प्रति दिखाया मेरा कंसर्न और केयर भी कंटेजियस था. कार्तिक से मैंने ना केवल बीमारी, बल्कि उसने मेरे केयर और अफेक्शन को भी शेयर किया था.” मेहुल की हिमाकत और तर्क से जया ने ग़ुुस्से में फोन काट दिया.

“हैलो पापा, बिज़ी तो नहीं हो आप…”
“नहीं… बोलो… मेहुल.”
“पापा, मम्मी आसपास हैं क्या?”
“हां-हां बात कराऊं?”
“अरे नहीं, आप से ही बात करनी है. एक छोटी-सी प्रॉब्लम हो गई है.” मेहुल के ऐसा कहते ही आश्‍विन बाहर चले गए. वहां पर बैठी जया, फोन मेहुल का था ये समझ चुकी थी. कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम होगी ये सोचकर आश्‍विन के अंदर आने का इंतज़ार करने लगी.
कुछ देर बाद वो आए और बिना कुछ बोले ही सोफे पर बैठ गए. जया आशंकित-सी बोली, “किसका फोन था… मेहुल का था क्या? कोई परेशानी तो नहीं है, सब ठीक तो है ना…”
“ओ हो जया! तुम्हारी यही प्रॉब्लम है, बहुत जल्दी परेशान हो जाती हो. अरे सब ठीक है, मेहुल भी ठीक है… थोड़ा परेशान है. उसे चिकनपॉक्स हो गया है.”
“हे भगवान! चिकनपॉक्स कैसे हो गया, और आप कह रहे है सब ठीक है… कितना कहा था इस लड़के से की साफ़-सफ़ाई से रहे, लेकिन सुनते कहां हैैं आजकल के बच्चे, सब अपनी मर्ज़ी के मालिक जो हैं.“
“जया तुम्हारी यही आदत पसंद नहीं है, ज़रा-ज़रा सी बात पर परेशान हो जाती हो. इसीलिए मेहुल ने तुम्हें नही बताया… अरे! ठीक है वो.. वैसे भी आज उसका ये तीसरा दिन है.”
“क्या…?” जया अवाक् सी आश्‍विन का मुंह ताकती रह गई. सहसा हड़बड़ाती हुई बोली, “तीन दिन हो गए हैं और उसे अब फ़ुर्सत मिली है फोन करने की… आप अभी; बस अभी मेहुल से बात कराइए…” “देखो जया, उसे अभी तुम्हारे सपोर्ट की ज़रूरत है. ज़रा आराम से बात करना… ” बात पूरी होने से पहले रुआंसी-सी जया फोन मिला चुकी थी.
“मेहुल, कैसा है तू… और पापा क्या बोल रहें हैं तीन दिन हो गए हैं.” “हां मम्मा, दो दिन तो समझ में आया ही नहीं कि ये दाने कैसे हैं. फिर कार्तिक को डाउट हुआ कि शायद ये चिकनपॉक्स है. आज डॉक्टर ने भी कह दिया, तो आपको फोन कर रहा हूं.” मेहुल की आवाज़ सुनते ही जया का गला भर आया…
“कैसे हो गया तुझे चिकनपॉक्स..? किसी को था क्या?”
“मम्मी, ये तो मौसम ही है… किसी को भी हो सकता है…”
“जबसे तुमने पीजी में रहना शुरू किया है, तब से बोल रही हूं, थोड़ी साफ़-सफ़ाई रखा करो. बाहर से आकर हाथ अच्छे से धोना, रोज़ नहाकर…”
“ओहो मम्मी, अब तो हो ही गया है ना. आपको तो बताना ही नहीं चाहिए… इतनी जल्दी हाइपर हो जाती हैं, और वैसे भी ज़्यादा नहीं हुआ है.”
“अच्छा, मैं पापा को वहां भेज रही हूंं तुम घर आ जाओ…”
“बिल्कुल नहीं, मेरे इम्तिहान आनेवाले हैं. वैसे भी ट्रैवलिंग सेफ नहीं है, कंटेजियस डिसीज़ है.”
“अच्छा, फिर मैं आ जाती हूं…”
“आप तो बिलकुल मत आना. मुझे पढ़ाई करनी है. डिस्टर्ब होगा.”
“वैसे भी दो ही कमरे हैं. एक में मैं हूंं, दूसरे में कार्तिक और सौरभ हैं.” “तुम्हारे दोस्तों को कोई प्रॉब्लम नहीं है…”
“नहीं… मम्मी, सौरभ कुछ दिनों के लिए कहीं और शिफ्ट हो गया है… कार्तिक मेरी मदद के लिए यहीं रुका है.”
“मेहुल, मेरा मन नहीं मान रहा है, इसमें बड़े परहेज़ की ज़रूरत होती है. नीम की पत्तियों का इंतज़ाम, खानपान में परहेज़ और…” रफ़्तार से बोलती जया की परहेज़ों की लंबी सूची पर मेहुल ने विराम लगाया. “मम्मी मैंने नेट पर सब सर्च कर लिया है. डॉक्टर को भी दिखा दिया है. उनके निर्देशों को अच्छे से फॉलो कर रहा हूं और नीम की पत्तियों का ढेर लगा है. रही मेरे खाने-पीने की बात, तो कार्तिक मेस से बनवाकर ला देता है. नीम का तेल, नरियल पानी, जूस सब अरेंज कर देता है…”


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“एक बात बता मेहुल, सौरभ चला गया है दूसरी जगह; ऐसे में कार्तिक तुम्हारे साथ कैसे… उसे कोई दिक्क़त नहीं होती है क्या?” “मम्मी, सौरभ को हम लोगों ने ही दूसरी जगह शिफ्ट होने को कहा था. इम्तिहान के दिनों में रिस्क लेना ठीक नही है और रही बात कार्तिक की, तो उसे पहले हो चुका है तो कोई टेंशन नही. और वो मेरे साथ-साथ अपना ध्यान भी रखता है. दूसरे कमरे में रहता है… यहां तक कि बाथरूम भी बेचारा ऊपर वाले पीजी का इस्तेमाल करता है. मैं रेस्ट कर रहा हूंं. बाहर नहीं निकलता हूंं, दूसरों का भी ध्यान रखना पड़ता है ना… फ़िक्र मत करो, मैं अपना हालचाल देता रहूंगा.” उस दिन जया पूरे दिन किसी ना किसी से फोन पर बात करते हुए इस बीमारी से ठीक होने के नुस्ख़ों को संग्रहित करती रही. मेहुल को फोन कर चेताती रही. एक-एक पल काटना मुश्किल था, लेकिन आश्‍विन शांत थे, वे जया को समझाते, “तुम्हारी चिंता मात्र से मेहुल ठीक नहीं होगा, इस वक़्त उसे ज़रूरत है तुम्हारे निर्देशों की और दुआओं की. तीन दिन से उसने संभाला ही है.”
“क्यों संभाला है उसने सब अकेले… ऐसे समय पर हमें मेहुल के साथ होना चाहिए.”
“जया हमारे वहां जाने से या उसके यहां आने से उसका समय ख़राब होता. मेरे हिसाब से वो अकेले ज़्यादा ज़िम्मेदारी से परिस्थितियों से निपटेगा.” रात को जया की ज़िद्द पर स्काइप पर मेहुल ने बात की, उसे देखकर तो मन भर आया, लेकिन कमरे का हुलिया देखकर वो तनावमुक्त हो गई थी. कैमरा घुमाकर एक-एक चीज़ का मुआयना करवाया मेहुल ने… नीम की पत्तियां, नीम का तेल, नारियल पानी, जूस, दानों पर लगाने वाली क्रीम पोटेशियम परमैग्नेट सब कुछ वहां रखा दिखा.
“मेहुल, तुझे इतना सब कुछ किसने बताया?”
“कुछ कार्तिक ने और बाकी सब गूगल बाबा ने…” मेहुल ने हंसकर जवाब दिया.
धीरे-धीरे आठ दिन हो गए थे. मेहुल ठीक होने लगा था. नवें दिन अपने डॉक्टर से जया की बात करवाई, तो वो भी हंस रहे थे, “आजकल नेट युग में लोग समस्याओं की जड़ तक पहुंचकर इलाज खोज लेते हैं और तो और दो-तीन दवाओं के नाम भी इनसे ही मुझे पता चले… तब मैने कहा कि ये अपने आप ही ठीक हो जाएगा, बस सावधानी बरतने की ज़रूरत है. मेरे सभी निर्देशों को बहुत अच्छे से फॉलो किया है आपके बेटे ने. पहले तो मैने कह दिया था कि पैरेंट्स को बुला लो, लेकिन ये बोला, पैरेंट्स क्या करेंगे? ख़ुद टेंशन में रहेंगे और हमें भी टेंशन ही देंगे.” डॉक्टर की बातों पर जया हंस पड़ी, लेकिन उसका मन भीग-भीग गया.
“क्या करता बेचारा मेहुल, इम्तिहान के दिनों में ख़ुद का ध्यान रखना तो ज़रूरी था ही. वो भी अकेले. क्या वो नहीं जानती, ख़ुद के खाने पर उसका कितना कंट्रोल है. उसका बस चले तो दिनभर तला-भुना खाए… और कार्तिक, उसने भी तो कितना ध्यान रखा.” जया को रह-रह कर कार्तिक पर भी स्नेह उमड़ आता.
“ऐसे समय पर उसका साथ देनेवाला लड़का बहुत ही सुंदर मन का होगा, वरना कौन करता है दूसरों के लिए इतना. पराए शहर में दोस्तों का साथ कितना ज़रूरी होता है, वो आज समझ पा रही थी.” “तुम्हारा बेटा अब ठीक है. ख़ुश तो हो ना…” जहां आश्‍विन बोल रहे थे, वहीं जया डॉक्टर से हुई बात बताकर हंस रही थी. उसे याद आया जब मेहुल के दाने सूखने लगे थे, तब बड़ी चिंता थी. जानती थी कि ऐसे समय में उठनेवाली खारिश मेहुल को परेशान कर देगी.
उसने स्काइप पर मेहुल से कहा, “अभी बहुत खारिश होगी, तुम अपने नाख़ून मत लगाना; वरना वो दाग़ छोड़ जाएंगे.”
“मम्मी आप चिंता मत करो, मैं नीम की पत्तियों से सहलाकर खारिश मिटा लेता हूंं. ये टिप मैंने नेट पर पढ़ी थी. देखो ये डॉक्टर की दी हुई क्रीम है, इससे स्किन मॉइश्‍चराइज़ करता हूंं, तो इरिटेशन कम होती है.” उसकी बात से जया प्रभावित थी.
वह मेहुल को जितना बताती, मेहुल उसके सामने और बहुत से तार्किक तथ्य रखकर चौंका देता. जब जया ने मेहुल से उसकी डायट के बारे में बात की और तली-भुनी चीज़ो से दूर रहने को बोला, तब उसने बताया, “मम्मी, डॉक्टर ने भी ऑयली चीज़ें खाने को मना किया है, इसलिए अपना ध्यान रखता हूंं. बिल्कुल बॉयल खाना अरेंज होना मुश्किल है, फिर भी कार्तिक जुगाड़ कर ही देता है. हालांकि बोर हो गया हूंं फीका खाकर… लेकिन मुझे जल्दी ठीक होना है. मैंने नेट पर सर्च किया था, तो पता चला ऑयली फूड इसलिए मना करते हैं, क्योंकि किसी-किसी के इंटेस्टाइन में भी दाने हो जाते है ऐसे में ऑयली और स्पाइसी फूड प्रॉब्लम करते हैं.” जिस तर्क से मेहुल ने समझाया था, वो लॉजिक तो जया ने कभी लगाया ही नहीं.
जान गई थी कि इन बच्चों ने काफ़ी गहरे तक जानकारियां खंगाल डाली हैं. नेट से दूर रहने की सलाह देनेवाली जया आज की तकनीक का लोहा मान गई थी. दस-बारह दिनों के भीतर मेहुल बिल्कुल ठीक था. इम्तिहान भी सकुशल सम्पन्न हो गए थे. जया ने राहत की सांस ली.
“सच आश्‍विन, किस तरह से इस लड़के ने संभाला है सब अकेले… मुझ पर दबाव ना डालता, तो एक पल की देरी ना करती वहां पहुंचने में…”
“हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए कार्तिक का जिसने उसकी इतनी मदद की है.”
“आप ठीक कह रहे हैं, सोच रही हूंं कार्तिक के लिए कोई गिफ्ट भेज दूं. मैं अभी मेहुल से बात करती हूंं.” कहते हुए जया ने फोन लगा दिया था. उससे फोन पर पूछा, तो मेहुल बोला, “मम्मी, गिफ्ट की ज़रूरत नहीं है. फिर भी आप चाहती हैं, तो आज मेरे और कार्तिक के लिए मूवी और डिनर स्पांसर करवा दो.” जया हंसते हुए बोली, “तुम मेरी कार्तिक से बात करवा दो कम से कम मैं उसे थैंक्स तो बोल दूं.” मेहुल ने कार्तिक को फोन दिया, जया ने भावुक होकर उसे थैंक्स बोला, तो कार्तिक ने झेंपते हुए कहा, “आंटी, मैं अपने दोस्त की मदद नहीं करता तो कौन करता? आप दूर थे, इसलिए ज़्यादा परेशान थे. वरना यहां सब कुछ आराम से मैनेज हो गया था.”
“फिर भी कार्तिक, चिकनपॉक्स कितना कंटेजियस होता है. ये जानते हुए भी…”
“तो क्या हुआ आंटी, कुछ दिन पहले मुझे भी तो चिकनपॉक्स हो गया था. तब मेहुल ने भी तो ख़तरा उठाकर मेरी देखभाल की थी. मेरी फैमिली तो बहुत दूर थी. चेन्नई से मां का आना संभव नहीं था. मेहुल की हेल्प से जब मैं ठीक हुआ तो मेरी मम्मी ऐसे ही इमोशनल थी जैसे आज आप हैं.” कार्तिक के खुलासे पर दो पल तो जया के मुंह से कुछ निकला ही नहीं…
“क्या तुम्हें भी चिकनपॉक्स हुआ था?” फोन मेहुल ने ले लिया था. “अरे मम्मी, पुरानी बात हो गई है. अब फोन रख रहा हूं और हां कार्तिक को देनेवाली ट्रीट याद रखना.” फोन रखते ही जया का ग़ुस्सा फट पड़ा था.


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“आश्‍विन कितना बेवकूफ़ है ये मेहुल. उसने हमें बताया नहीं की ये कंटेजियस डिसीज़ उसे कार्तिक से हुई है. ख़ुद का ज़रा ध्यान नहीं है. ऐसा भी क्या दोस्ती निभानी कि ख़ुद के लिए मुसीबत ओढ़ ले.” क्रोध में बोलती जया का मूड पूरे दिन ख़राब रहा.
दूसरे दिन मेहुल से बात करते समय भी ग़ुस्सा टपक रहा था.
“मम्मी एक हफ़्ते का टर्म ब्रेक है. कार्तिक का घर बहुत दूर है, वो घर नहीं जा रहा है क्या मैं उसे अपने साथ ला सकता हूंं.”
“बस कर मेहुल… इस कार्तिक की वजह से तेरे ऊपर मुसीबत आई कितने बेवकूफ़ हो तुम. तुमसे स्मार्ट तो सौरभ है, जो कहीं और शिफ्ट हो गया था.”
“मम्मी जब कार्तिक बीमार था, तब सौरभ भी हमारे साथ था. मुझे चिकनपॉक्स तब हुआ जब इम्तिहान होनेवाले थे. ऐसे में सौरभ का रुकना ठीक नहीं था और कार्तिक को कोई ख़तरा नहीं था, क्योंकि उसे तो पहले ही हो चुका था. और वैसे भी हम जानते हैं कि चिकनपॉक्स कंटेजियस होता है, इसलिए ख़ुद भी दूूर रहते थे.”
“तुम लोग ख़ुद को बड़े अक्लमंद समझते हो, ये जानते हुए भी कि ये कितना कंटेजियस है तुमने बेवकूफ़ी की.”
“मम्मी, कल तक आप कार्तिक की तारीफ़ करते नहीं थक रही थीं. उसने मेरी मदद की, वो आपको बहुत अच्छा लगा, लेकिन मेरी मदद आपको बेवकूफ़ी लग रही है. मम्मी थोड़ा समझदार बनिए, जितनी मदद मैंने कार्तिक की, उससे कई गुना मदद उसने मेरी की. हिसाब बराबर. सच बताइए मम्मी, क्या आप सौरभ से नाराज़ नहीं थी. जो मुझे ऐसी हालत में छोड़कर चला गया था. अब जब मैं कार्तिक को छोड़कर नहीं गया, ये जानकर आपका मूड ख़राब हो गया है. ज़रूरत पड़ने पर आप मेरे पास तुरंत आ जातीं, लेकिन सोचो कार्तिक के पैरेंट्स चेन्नई में रहते हैं, उन्हें आने-जाने में ही तीन दिन लग जाते. मम्मी उसकी बीमारी कंटेजियस थी… तो मेरी केयर और कंसर्न भी कंटेजियस था. मम्मी ये ज़रूरी नहीं है कि चिकनपॉक्स मुझे कार्तिक की वजह से हुआ है कॉलेज में भी कई बच्चों को चिकनपॉक्स हुआ था. मैंने और सौरभ दोनों ने बहुत एहतियात बरती थी. और फिर आप ऐसे क्यों नहीं सोचतीं कि सिर्फ़ बीमारी ही कंटेजियस नहीं थी. उस वक़्त कार्तिक के प्रति दिखाया मेरा कंसर्न और केयर भी कंटेजियस था. कार्तिक से मैंने ना केवल बीमारी, बल्कि उसने मेरे केयर और अफेक्शन को भी शेयर किया था.” मेहुल की हिमाकत और तर्क से जया ने ग़ुुस्से में फोन काट दिया.
“आश्‍विन ये लड़का दुनियादारी कब समझेगा?” कुछ देर की चुप्पी के बाद आश्‍विन बोले, “जया, ठंडे दिमाग़ से सोचोगी और ग़ौर करोगी तो तुम्हें मेहुल पर गर्व होगा. हमारे मेहुल का व्यक्तित्त्व और सोच का दायरा कितना विस्तृत है. एक-दूसरे की परेशानियों को बांट कितनी सहजता से समस्या का हल ढूंढ़ लिया.” आश्‍विन की बात सुनकर जया की आंखें भर आई थी. बार-बार मेहुल के शब्द कौंध रहे थे… कंटेजियस बीमारी ही नहीं मेरा केयर और कंसर्न भी था… सच कहा था आश्‍विन ने, आज उसने बेटे का ये पक्ष भी देखा था.
घर में छाई चुप्पी के कुछ देर बाद आश्‍विन को जया बड़े इत्मिनान से मोबाइल पर बात करती नज़र आई. मां-बेटे के संवाद सुनाई तो नहीं दे रहे थे, लेकिन जया के चेहरे पर छाए उत्साह से वतावरण की नरमी का अंदाज़ा हो गया था. जया की नज़र सहसा आश्‍विन पर पड़ी, तो मुस्कुरा पड़ी, “मैंने कह दिया है कि वो कार्तिक को टर्म ब्रेक में ले आए. बेचारा चेन्नई तो जा नहीं सकता है. यहां आएगा तो उसके लिए चेंज हो जाएगा.”
जया अभी भी बोल रही थी, “हम बड़े भी जाने-अनजाने कैसी ग़लत सोच को बच्चों के सामने रखकर ख़ुद भी छोटे बन जाते हैं. ये तो कहो अपना मेहुल समझदार है, सही-ग़लत समझता है. भरोसा है दुनियादारी निभा ही लेगा.” आश्‍विन मुस्कुराकर सोच रहे थे, ‘वाक़ई कंटेजियस है… सहयोग, समर्पण और स्नेह. लोगों को अपनी चपेट में ले ही लिया. यहां तक कि जया को भी…’

– मीनू त्रिपाठी

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Photo Courtesy: Freepik

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