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कहानी- डे आउट… (Short Story- Day Out…)


कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका बाल मन समझ गया हो कि अब उसकी मां हमेशा के लिए उससे दूर जाने वाली है, इसीलिए वह एक दिन उसके साथ बिताना चाहती है. बच्चों की संवेदना बहुत गहरी होती है. क्या चेरी भी...

“मांं, क्या ऐसा नहीं हो सकता कभी कि हम दोनों का डे आउट हो?” चेरी ने अपनी दोनों नन्हीं-नन्हीं बांहें अमिता के गले में डालते हुए कहा.
“हम दोनों का डे आउट मतलब? मैं समझी नहीं बिटिया, क्या कहना चाहती हो, डे आउट का क्या मतलब होता है?” अमिता ने कौतूहल से पूछा.
“हम दोनों मतलब स़िर्फ आप और मैं. क्या किसी दिन ऐसा हो सकता है कि चेरी और मां अकेली घूमने निकले. बस चेरी और मां का डे आउट हो. मेरी छुट्टी वाले दिन?” चेरी ने विस्तार से समझाया.
“अच्छा अब समझी कि डे आउट क्या होता है.” उसका मतलब समझ कर अमिता मुस्कुरा दी.
“ज़रूर बिटिया क्यों नहीं, कल तुम्हारी छुट्टी है न, तो हम दोनों ही बाहर घूमने चलेंगे.”
“पूरा दिन बस आप और मैं ख़ूब घूमेंगे, आइसक्रीम-पिज़्ज़ा खाएंगे, पार्क में खेलेंगे. कितना मज़ा आएगा न!” चेरी उस कल्पना से ही ख़ुश होकर चहकने लगी, “प्रॉमिस न मां, पक्का वाला?”
“हां बेटा, प्रॉमिस, पक्का वाला प्रॉमिस. अब सो जाओ. सुबह जल्दी उठी हुई हो और आज तो तुम दोपहर में भी सोई नहीं हो.” अमिता ने चेरी के कपड़े बदले, उसे ब्रश करवाया और उसे पलंग पर लिटाकर ख़ुद उसके पास बैठ कर उसके सिर पर थपकियां देने लगी. कुछ ही देर में चेरी को नींद आ गई. निश्‍चिंत होकर सो रही थी वो, क्योंकि उसे पता था कि मां उसके पास है.
अमिता के कॉलेज जाने के बाद दिनभर चेरी अपनी नानी के साथ रहती है. शायद इसीलिए वह स़िर्फ अमिता के साथ ही एक पूरा दिन व्यतीत करना चाहती है या इसका एक दूसरा कारण भी है.
अक्सर बाहर जाते समय या तो उन मां-बेटी के बीच एक तीसरा होता है या अमिता के उस तीसरे के साथ बाहर जाते समय चेरी फिर नानी के पास छोड़ दी जाती है. उसे घर पर दुबारा अकेला छोड़ कर जाने से अमिता का मन भी टूट जाता है, लेकिन जीवन की कुछ मजबूरियां ऐसी होती हैं, जिनके बारे में निर्णय लेने के लिए मन के विरुद्ध कुछ ़फैसले लेने पड़ते हैं. चेरी का बाल मन दोनों ही स्थितियों में आहत होता है. जब वह साथ जाती है तब भी उस तीसरे की उपस्थिति उसे असुरक्षित व असहज बना देती है और घर पर रहने पर भी वह एकदम गुमसुम हो जाती है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका बालमन समझ गया हो कि अब उसकी मां हमेशा के लिए उससे दूर जाने वाली है, इसीलिए वह एक दिन उसके साथ बिताना चाहती है. बच्चों की संवेदना बहुत गहरी होती है. क्या चेरी भी...
अमिता ने एक नज़र भर चेरी को देखा. सात साल की हो जाएगी उसकी प्यारी बिटिया पंद्रह दिन बाद. गोरी नाज़ुक सी लाल-लाल गाल और गुलाबी होंठ, तभी उसने उसका नाम चेरी रखा था. अमिता के हाथ पर अपना नन्हा सा हाथ रखे चेरी एकदम निश्‍चिंत होकर गहरी नींद में सोई थी. अमिता का दिल भर आया, कितने सुकून और विश्‍वास से भरी सो रही है अपने आने वाले भविष्य से बेख़बर अनजान...

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अचानक अमिता की आंखें भर आईं, नहीं-नहीं मेरी बिटिया का भविष्य अनजान नहीं होगा, मैं उसके भविष्य को अपने हाथों से गढूंगी सुरक्षित और प्रेम से भरपूर... चेरी को चादर ओढ़ा कर अमिता ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और खिड़की के पास रखे अपने टेबल कुर्सी पर बैठ गई. खिड़की के बाहर वाले आंगन में लगे पेड़-पौधे दम साधे खड़े थे. हवा भी स्तब्ध सी थी जैसे सारे के सारे किसी मुक़दमे के ़फैसले को सुनने के लिए सांस रोक कर खड़े थे.
अमिता के माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिला आईं. सीने में कुछ घुमड़ने लगा. थोड़ी देर पहले चेरी की कही बातें याद आने लगीं, “स़िर्फ चेरी और मम्मी का डे आउट...” आंख की कोर पर एक बूंद झिलमिला आई. अमिता ने एक पेन उठाया, दो कोरे काग़़ज़ लिए और लिखने बैठ गई-  
राकेश,
पत्र देखकर तुम्हें आश्‍चर्य ज़रूर होगा. आजकल मोबाइल का ज़माना है, जो बात हो फोन पर झट से कर लो और मेरे-तुम्हारे बीच तो इस बेतार के यंत्र की आवश्यकता भी नहीं है बातें करने के लिए, दो मंज़िल ऊपर ही तो रहते हो, कभी भी साथ बैठकर बातें हो सकती हैं. लेकिन नहीं तुम्हारे सामने बैठकर शायद उतना खुलकर सब व्यक्त नहीं कर पाती, जितना पत्र लिखकर कर पाऊंगी.
पिछले दो सालों से हम एक-दूसरे को जानते हैं. जानते क्या हैं, काफ़ी नज़दीक हैं हम एक-दूसरे के. मेरे जीवन की शायद ही कोई ऐसी बात होगी जो तुम्हें नहीं पता होगी. इसलिए वही सारी बातें दोबारा पढ़कर तुम्हें आश्‍चर्य होगा. शायद तुम्हें ऊब भी होगी कि मैं क्या वही पुरानी बातें दोहरा रही हूं, लेकिन प्लीज़ पत्र आख़िर तक पढ़ना, क्योंकि पुरानी बातों को दोहराए बिना मैं नई बात तुम्हें समझा नहीं पाऊंगी.
तुम्हें तो पता है ना बहुत कम उम्र में ही मेरे ससुर जी ने एक सामाजिक समारोह में मुझे देखा, तो आनन-फानन में मेरी सुंदरता देखकर मेरी मां से उन्होंने मेरा हाथ अपने इकलौते बेटे के लिए मांग लिया था. तब मैं मात्र उन्नीस वर्ष की थी और फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. पढ़ने में बहुत तेज़ थी, इसलिए शादी के झंझट में पड़ना नहीं चाहती थी. लेकिन मेरे पिता नहीं थे और मां इतना अच्छा और समृद्ध रिश्ता हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी. मेरी सुंदरता की वजह से वैसे भी वह आवारा लड़कों के कारण परेशान रहती थी. मां ने दुनियादारी की ऊंच-नीच को देखते हुए तुरंत हां कर दी. महीने भर से भी कम समय में मैं अंकुश से विवाह करके अपने ससुरगृह आ गई. विदाई में ससुरजी ने मात्र एक जोड़ी कपड़े में मेरी विदाई करवाई थी.
विवाह के पहले हमने अंकुश की बस तस्वीर ही देखी थी, क्योंकि उस समय वह विदेश में था. फोन पर बस मां से ही दो-एक बार अंकुश की औपचारिक बातचीत हुई थी. दो बार वीडियो कॉल पर उसे देखा था. अंकुश विवाह के एक दिन पहले ही भारत आए. उसी दिन सगाई हुई और दूसरे दिन शादी.

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लड़केवालों की ओर से बहुत कम रिश्तेदार आए थे और जो आए भी थे, वे भी शादी के तुरंत बाद ही अपने घरों को लौट गए. घर एकदम से सुनसान सा हो गया. किसी भी दरो-दीवार पर विवाह या नई बहू के आने की कोई ख़ुुशी या चमक का लक्षण मात्र भी दिखाई नहीं दे रहा था. नौकरों ने मेरा सामान कमरे में रखा. आस-पड़ोस की दो-तीन महिलाएं थोड़ी देर मेरे पास बैठीं, फिर चली गईं.
घर में कदम रखने के बाद से अंकुश कहीं दिखाई नहीं दिया था. रात में भी वह कमरे में नहीं आया. फिर वह बस कभी-कभार खाने-नाश्ते के व़क्त दिखाई दे जाता था. कम उम्र होने के बाद भी मैं समझ गई थी कि मेरे गृहस्थ जीवन के लक्षण अच्छे नहीं है. मेरे साथ कहीं कुछ बहुत ग़लत हो गया है. धीरे-धीरे पता चला अंकुश का मन इस विवाह में नहीं था. मैं वह चिट्ठी थी, जो नियति का डाकिया ग़लती से अंकुश के पते पर डाल गया था. मेरे जीवन के साथ एक भद्दा मज़ाक किया गया था.
जल्दी ही पर्दे के पीछे से छुपी हुई कहानी सामने आई. अंकुश को एक विदेशी लड़की से प्यार था, लेकिन उसके पिता नहीं चाहते थे कि उस विदेशी लड़की से अंकुश का विवाह हो. दोनों के बीच इस बात को लेकर काफ़ी मनमुटाव व बहस हुई. अंकुश के पिता ने उस लड़की से विवाह के लिए साफ़ मना कर दिया था. दुर्भाग्य से वह लड़की एक एक्सीडेंट में मारी गई. अंकुश मानसिक रूप से विचलित हो गया. पिता की समझाइश, दबाव, क़समें, इनमें से किसी एक या इन सभी कारणों के आगे झुक कर अंकुश भारत वापस आकर मुझसे शादी करने को तैयार हो गया. दिन, हफ़्ते, महीने बीतने को हुए. मैंने पढ़ाई जारी रखने का निर्णय लिया और बीएससी, एमएससी किया, एचडी भी कर ली. ससुरजी मेरा बेटी समान ध्यान रखते. शायद कहीं वह मेरी इस हालत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानते हुए अपराधबोध से ग्रस्त भी थे. उस घर में पति-पत्नी और ससुर नहीं, बल्कि पिता-पुत्री और एक ऐसा मेहमान रहता था जो जब भी आता तो दोनों को झुलसा देता था.

धीरे-धीरे मुझे समझ में आ गया कि अंकुश के मन में उस लड़की के लिए प्यार उतना नहीं था जितनी कि अपने निर्णय को नकारे जाने की तिलमिलाहट थी. अपने पिता पर इसी ग़ुस्से ने उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को भयंकर नकारात्मकता से भर दिया था.
मुझे बच्चों से बहुत प्यार था. हमेशा सपना देखा था एक छोटा सा घर और प्यारे से बच्चे, लेकिन इतना सा सपना भी आंखों में समा नहीं पाया, बह गया आंसुओं के साथ. आसपास के बच्चों को देखकर मन हुलस कर रह जाता था. जान पहचान वाले या मां पूछती, तो मैं पढ़ाई का बहाना बना देती. बाद में तो मां को भी सच्चाई पता चल ही गई.
लेकिन उस सपने के सच होने की संभावना भी कितनी अजीब हालत में हुई. अंकुश के अत्यधिक शराब के नशे में मानसिक विकृति के हाल में बलात्कार का शिकार हो गई. लेकिन महीने भर बाद जब कोख में पनप रहे अंकुर के बारे में पता चला, तो सब मलाल धुल गए. आठ साल बाद ख़ुशी का एक कतरा पलकों पर आया था. लेकिन अंकुश ने न जाने किस तपते मन से उसे रोपा था कि नौ महीने मैं अपने शरीर पर उस झुलसन का परिणाम भुगतती तड़पती रही. निरंतर ईश्‍वर से प्रार्थना करती रही कि मुझे चाहे जितनी पीड़ा दे दे, मगर मेरी कोख के अंकुर को स्वस्थ रखना. ईश्‍वर ने मेरी सुन ली. मेरी बिटिया बहुत स्वस्थ और प्यारी हुई. लेकिन उसके जन्म की संभावना के समय से ही अंकुश बहुत कलह करता था मुझसे कि इस बच्चे को ख़त्म कर दो. शायद वह मेरे साथ अनजाने में ही सही किसी भी तरह के जुड़ाव या रिश्ते की डोर की याद या निशानी नहीं रखना चाहता था. मैं पूरे समय अंकुश के डर के साए में जीती रही और हर पल अपने बच्चे की सुरक्षा की कामना करती रही. लेकिन मैं अपने बच्चे को जन्म देने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थी.
अपने मानसिक हालत की वजह के चलते अंकुश जीवन और रिश्तों के साथ कभी तालमेल नहीं बिठा पाया. हमसे बदला लेने की, हमें दुख-तकलीफ़ पहुंचा कर ख़ुुश होने की उसकी विकृत मानसिकता कहूं या अपनी प्रेमिका के प्रति आत्मग्लानि कहूं कि चेरी के जन्म के दो महीने पहले ही अंकुश ने ढेर सारी शराब पीकर नींद की गोलियां खाकर अपनी ही जीवन लीला समाप्त कर ली.
विदेशी लड़की के प्रेम और घरवालों की मनाही की एक घिसी-पिटी पुरानी कहानी के चक्र में मेरी ज़िंदगी बलि चढ़ गई. विवाह के अग्निकुंड में भस्म हो गई. ससुरजी का बिज़नेस अंकुश के चलते पहले ही बर्बाद हो गया था. फिर भी उन्होंने मेरी बेटी के सुरक्षित भविष्य के लिए अच्छी-ख़ासी रकम बैंक में फिक्स कर दी थी. बड़ा मकान बेचकर कर्ज़ चुकाया और मेरे नाम यह फ्लैट ले दिया. मुझे कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर स्थापित करवा कर मेरे प्रति किए गए अपराधों का एक तरह से प्रायश्‍चित करके उन्होंने भी परलोक का रास्ता देख लिया. मैं अपनी मां के साथ इस फ्लैट में आ गई.
चेरी तब दो बरस की थी. उसकी प्यारी सी हंसी और बातों के उजाले में मेरी ज़िंदगी के सारे अंधेरे दूर हो गए. अपनी बेटी के साथ मैं हर दुख, हर बुराई भूल गई थी. फिर दो बरस हुए तुम ऊपर वाले फ्लैट में रहने आए. मुलाक़ातें हुईं और स्वाभाविक तौर पर हम एक-दूसरे के नज़दीक आ गए. मिलना, बातें, बाहर लंच-डिनर और फिर तुम्हारी ओर से विवाह का प्रस्ताव. लगा कि शायद जीवन में एकाकीपन का दौर ख़त्म हो गया है. मुझे एक सच्चा हमसफ़र और चेरी को सिर पर एक पिता का सुरक्षित साया और दुलार मिलेगा. लेकिन नहीं ज़िंदगी तो एक बार फिर से एक तमाशे की डुगडुगी लिए राह में खड़ी थी.

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जब तुमने कहा, “मैं चेरी को नहीं स्वीकार कर सकता. मैं दूसरे के बच्चे को अपना नाम नहीं दे सकता. उसे अपनी मां के ही पास रहने दो. हम अपना ट्रांसफर करवा कर यहां से दूसरे शहर जाकर नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत करेंगे. हमारे घर हमारा अपना बच्चा होगा. तुम्हारा और मेरा.”
तो मैं सन्न रह गई. विवाह की तारीख़ तक पक्की हो जाने के बाद ऐसा आदेश. पहले नहीं कहा, क्योंकि तुम्हें पता था पहले कह देने से मैं शादी से इनकार कर देती. इसलिए इस कुत्सित भाव को तुमने अब तक मन में ही छुपा रखा था. सोचा होगा शादी की तारीख़ तय हो जाने के बाद यह मजबूर हो जाएगी, फिर कैसे मना कर पाएगी शादी से. सब लोगों को तो ख़बर हो गई है. वाह रे पुरुष! दूसरे की पत्नी को स्वीकार कर सकता है, अपना नाम दे सकता है, लेकिन उस नारी की संतान को नहीं अपना सकता.
क्षमा करना राकेश मुझे लेकर तुम बहुत उत्साहित हो, बहुत सारी तैयारियां कर रखी हैं, बहुत से सपने देखे हैं तुमने, लेकिन मेरी आंखों का सपना तो बस एक ही है- मेरी बेटी. अंकुश ने अपने कारण से मुझे मातृत्व से वंचित रखा आठ वर्ष तक और अब आगे की एक पूरी उम्र तुम मुझे उस सुख से वंचित रखना चाहते हो अपने निजी स्वार्थ के कारण. लेकिन मातृत्व स्त्री का प्राकृतिक और नैसर्गिक अधिकार है. उसी तरह मेरी बेटी को भी अपनी मां का प्यार पाने का एक स्वाभाविक और प्राकृतिक अधिकार है. मैं अपने और उसके दोनों के अधिकार को नहीं त्याग सकती, किसी भी परिस्थिति में नहीं.
मैं समझ लूंगी कि मेरी क़िस्मत में साथी का सुख लिखा ही नहीं है. अब पता चला कि क्यों तुम्हारे साथ बाहर आते-जाते समय चेरी इतना असहज रहती थी. बच्चे अंतर्मन की बातें बड़ों की बजाय जल्दी और सही समझते हैं. वह बच्ची कहीं ना कहीं समझ गई होगी कि तुम्हारी मंशा क्या है. उसने तुम्हारे मन के भावों को अपने भीतर पढ़ लिया होगा, तभी तुम्हें लेकर वह इतना असुरक्षित महसूस करती थी. तभी आज वह मेरे साथ अकेले बाहर जाने का कह रही थी.

तुम्हें जो लड़की पसंद हो, उससे विवाह कर लेना. तुम्हें आनेवाले जीवन के लिए बहुत सी शुभकामनाओं के साथ...
तुम्हारा मेरा साथ बस यहीं तक था. आगे मेरा रास्ता स़िर्फ और स़िर्फ मेरी बेटी के साथ ही जाता है. इस मामले में मेरा निर्णय अटल है जो बदल नहीं सकता. इसलिए इस विषय में न मुझसे बात करना, न अब कभी मुझसे मिलने की कोशिश करना.
अमिता

पत्र समाप्त करते ही अमिता ने एक गहरी सांस ली. मन पर पिछले कई दिनों से पड़ा हुआ बोझ एकदम हल्का हो गया था. पेड़-पौधे भी सहज होकर सांस लेने लगे, धीरे-धीरे प्रसन्नता से लहराने लगे. अमिता ने पत्र तह करके लिफ़ा़फे में रखा और कुर्सी से उठकर लाइट बंद करके पलंग पर चेरी के पास लेट गई.
चेरी का प्यारा चेहरा नींद में एकदम मासूम सा लग रहा था. अमिता ने उसका माथा चूम लिया. धरती अकेली अपनी अरबों-खरबों संततियों पशु, पक्षियों, पेड़-पौधों को संभालती है, तो वह क्या अपनी बेटी को नहीं पाल सकती. नहीं चाहिए उसे किसी भी पुरुष का साथ. वह पूरी तरह सक्षम है अपने आपको और अपनी बेटी को संभालने में. जीवन में बिटिया के प्यार से बढ़कर कुछ नहीं है. और फिर मां भी तो है. उन तीनों की यही दुनिया सबसे प्यारी है. कई रातों बाद उसे चैन की नींद आई थी.
सुबह चेरी के उठने के पहले ही अमिता पत्र राकेश के घर के दरवाज़े के नीचे से अंदर सरका आई.
घर आकर उसने चेरी को उठाया, “चलो बिटिया आज मम्मी और चेरी का डे आउट है ना! उठकर तैयार हो जाओ.”
“सच मम्मी?” चेरी आंखें मलते हुए उठी और ख़ुश होकर बोली, “स़िर्फ मैं और आप ना... और कोई नहीं?”
“हां बिटिया स़िर्फ मैं और तुम और आज ही नहीं हमेशा के लिए स़िर्फ चेरी और मम्मी का डे आउट होगा. बस कभी-कभी नानी को भी साथ ले चल सकते हैं न?” अमिता ने कहा.
“ओ मम्मा तुम कितनी अच्छी हो, दुनिया की सारी मम्मियों से अच्छी. हां, नानी भी चेरी और मम्मी के साथ डे आउट मना सकती है.” चहकते हुए चेरी ने अपनी बांहें अमिता के गले में डाल दीं. अमिता की मां दरवाज़े पर खड़ी दोनों को देखकर प्यार से मुस्कुरा दी.

कहानी- डे आउट

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