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कहानी- एहसास (Short Story- Ehsaas)

"अजी बड़ी बहू को पटाकर लिखवा लो कि मैं बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं हूं और अनिल की दूसरी शादी कर दो. इसका क्या है, घर में पड़ी रहेगी रोटी कपड़े में, सारा दिन घर का काम करती रहेगी."

दीदी को जब पता चला कि वह गर्भवती हैं, तो ख़ुशी के मारे आंसू आ गए. उन्हें रोकना भी तो सम्भव नहीं था, जिस स्त्री ने शादी के दस साल बाद तक निसंतान बांझ जैसी उपमाओं के पारिवारिक व सामाजिक तीर-बाण झेले हों, जिसकी अपनी आत्मा मातृत्व को तरस गई हो. आज इस ख़बर से सारे दुख के बादल छंटते दिखाई दे रहे है. वो सामाजिक और पारिवारिक अपमान का स्थान सम्मान लेना चाहता हो, वो क्षण अंततः सुखद आभास देते हैं. और सबसे बड़ी ख़ुशी अपनी ही कोख में पल रहे अपने प्रतिबिम्ब के प्रति उमड़ता मातृत्व भाव जो स्त्री को अपने आप में पूर्णता की अथाह ख़ुशी देता है.

दीदी स्वभाव से बहुत धर्म वाली थीं न जाने इतना कुछ सहने की शक्ति उनमें कहां से पैदा होती रहती थी. परिवार भी भरा पूरा. एक बड़ी ननद जो शहर में ही ब्याही गई थी. एक देवर-देवरानी जिसके शादी के भर बाद ही एक पुत्र रत्न पैदा होने से परिवार की दुलारी व सारे दिन बच्चे में लगे रहने से काम न करने का बहाना. उसकी शादी दीदी से साल बाद हुई थी और इस समय उनके तीन बेटे हैं. दीदी को हर समय घर की चक्की में पिसते रहना, सब की फ़रमाइयों पूरी करने के साथ हर समय यह भी सुनना कि इसके बच्चा नहीं है, इसे तो फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है.

एक बार दीदी देवरानी के रोते बेटे को चुप कराने लगी, जो किसी हाल में चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उसी समय बाहर से आती ममता. तुरन्त अपने बेटे को दीदी की गोद से खींचते हुए बोली, "भाभीजी आप तो घर के काम ही किया करें, ये आपके बस का नहीं." इतने में सास बोल पड़ी, "बच्चे की मां को ही बच्चे की ज़रूरत का पता चलता है कि उसे कब क्या चाहिए या उसे कोई परेशानी है. बच्चा पालना कैसा होता है, बच्चा होने से ही पता चलता है."

एक बार तो दीदी की सास की एक सहेली उनके घर आईं और उन्होंने दीदी की सास को सलाह दी, "अजी बड़ी बहू को पटाकर लिखवा लो कि मैं बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं हूं और अनिल की दूसरी शादी कर दो. इसका क्या है, घर में पड़ी रहेगी रोटी कपड़े में. सारा दिन घर का काम करती रहेगी. और हमारे ये तो कहते हैं कि घर से बाहर निकलते समय रांड मिले तो भली पर बांझ न मिले." दीदी ने चाय की ट्रे लाते हुए उनकी सारी बातें सुन लीं अब तो उसके पैरों तले धरती ही खिसक गई. कौन था जो उसके मन की व्यथा को समझता, उसे गले से लगाता, जब जीजाजी ही उसके दुख-दर्द को नहीं समझना चाहते थे. क्योंकि वो भी तो अपने माता-पिता के श्रवण कुमार जो ठहरे, बीवी की आवश्यकताओं और परेशानियों से दूर, पर औरत का यह रूप देखकर मेरा मन ग्लानि से भर उठा.

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सच, आज औरत की दुर्दशा करनेवाली औरत ही है और कोई नहीं. लेकिन मैं भी लाचार दीदी की कोई मदद नहीं कर पा रही थी. बस उनके दुख, दर्द को सुनकर एहसास भर कर लेती थी और जब तब उन्हें हिम्मत दिलाती रहती, हर बार यही कहती रहती, "दीदी, सब दिन एक से नहीं होते. हर रात के बाद भोर की एक नई किरण आती है."
मैं दीदी की छोटी बहन अनु, मेरी शादी दो वर्ष पूर्व रोहन (आई.ए.एस) के साथ हुई थी. संयोग से चार माह पूर्व ही रोहन का तबादला भी यहीं हो गया था. मैं भी जबलपुर कॉलेज से त्यागपत्र देकर यहीं गर्ल्स कॉलेज में लेक्चरर के पद पर कार्य करने लगी थी. मेरे यहां आने के बाद दीदी बहुत संतुष्ट नज़र आती थीं और इस ख़बर के बाद तो वह हमेशा मुझसे कहती रहती थी कि अनु, तेरे क़दम तो मेरे लिए बहुत मुबारक़ हैं. दीदी के दो माह बाद ही मैंने भी कन्सीव कर लिया था. मेरा व दीदी का मिलना होता रहता था, न जाने ये बदलाव स्वार्थवश, स्थाई या अस्थायी था. एक दिन हम दोनों का खाना दीदी के घर था. खाने के बाद बस यों ही गपशप होती रही. दीदी की सास बोली, "अनु, तुम्हारी दीदी भी तुम्हारा साथ देने के लिए इतने समय से प्रतीक्षा कर रही थी. और हां, अनु अब तो तुम्हें भी नौकरी छोड़नी पड़ेगी."
मैंने कहा, "क्यों अम्माजी, जो महिलाएं नौकरी करती हैं वह बच्चे नहीं पाल सकतीं या घर के काम नहीं सम्भाल सकतीं? और दीदी वाली ग़लती मैं नहीं कर सकती. हमारे माता-पिता ने कितनी मुश्किलों में भी हमें शिक्षित कर अपने पांव पर खड़ा किया और हम ख़ुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लें. वैसे दीदी ने भी अपनी ख़ुशी या मजबूरी में, जो भी हो, नौकरी छोड़ने का निर्णय ग़लत ही लिया."

दीदी की सास बोली, "अरे बच्चे होंगे तब पता चलेगा." मैने हंसते हुए ममता दीदी की ओर देखकर कहा, "क्यों अम्माजी, ये ममता दीदी जो आए दिन शॉपिंग का शौक पूरा करती हैं. उतना समय नौकरी में पूरा किया जाए तो क्या बुराई है."
उस दिन के बाद से दीदी की सास व देवरानी मुझ से ख़ुश नहीं रहती थीं, पर अब वह दीदी को अक्सर कहती कि तुम्हारी बहन बहुत तेज़ है. न जाने क्यों मुझे पुरुषों की अपेक्षा नारी द्वारा नारी के अधिकारों का हनन अधिक कष्टप्रद लगता था और यह सच भी है. जब भी पुरुष वर्ग नारी का शोषण करता है कहीं-न-कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष नारी का ही हाथ नज़र आता है. मुझे याद है, दीदी जब छोटी थी, तो हर समय मां कहती रहती थीं, "तुम घर के बाहर खेलने नहीं जाओगी." और दीदी हमेशा इस बात पर खीझती थी कि भैया जाएगा और मैं नहीं, क्यों? जबकि वो तो घर का काम भी नहीं करता है और बाहर खेलने भी जाता है.

जब नवीं कक्षा में आई, तो पढ़ने में होशियार होने पर भी कला विषय ही दिलाया गया, क्योंकि विज्ञान या वाणिज्य जिन स्कूलों में थे उनमें सह-शिक्षा थी और मेरी मां इस बात के लिए कभी राजी नहीं थी. इसीलिए आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें लड़कियों के कॉलेज में ही प्रवेश दिलाया और तो और मां के ढेर सारे नियमों के तहत, जैसे- और नहीं हंसना, जवाब नहीं देना, भैया के दोस्तों से ज़्यादा हंसकर नहीं बतियाना, ऐसे नहीं उठना, ऐसे नहीं बैठना, देर तक नहीं सोना और भी न जाने क्या-क्या.
वर्षों औलाद न होना भी माहौल कुछ ऐसा बना दिया था कि पहला लड़का ही होना चाहिए. दीदी को यह आशंका भी बेचैन किए रहती थी, अब क्या होगा! अगर लड़की हो गई, तो फिर मुझे सास व इनके अपमान की भोग्या बनना पड़ेगा. आख़िर क़िस्मत का लिखा कौन टाल सकता है. दीदी ने एक बहुत सुन्दर बिटिया को जन्म दिया. मैं व रोहन दीदी से अस्पताल में मिलने गए. मुझे देखते ही दीदी मुझसे लिपटकर रोने लगी व बोली, "भगवान ने इतने वर्षों बाद मेरी गोद भरी वह भी बिटिया से, जो घरवालों को कतई पसंद नहीं."

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मैंने कहा, "हद हो गई दीदी, आप भी ऐसी बात कर रही हैं. भगवान का शुक्रिया अदा करो जिन्होंने इतनी प्यारी बेटी दी है और बेटी तो मां की सबसे अधिक हमदर्द होती है."
"वह तो सब सही है अनु, यूं तो मैं बेटी पैदा कर बहुत ख़ुश हूं. मेरी तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मैं इस बेटी को परिवार व समाज में सम्मानजनक स्थान दिला पाऊं और यह भी साबित कर सकूं कि बेटी भी मां-बाप का नाम रोशन करती है."
"अरे वाह दीदी आज मेरे लिए तो सबसे बड़ी ख़ुशी की बात है कि दीदी ने बिटिया के होने के साथ ही अपने अन्दर इस संकल्प को बल दिया है." रोहन भी बोल उठे. "आज दीदी आप में पैदा हुए इस आत्मविश्वास को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई." इतने में दीदी की सास आईं और मुझे देखकर बडी रुआंसी सी आवाज़ में बोलने लगीं, "इतने सालों बाद बच्चा हुआ, वो भी लड़की." मैं तुरंत बोल उठी, "अम्माजी, अपनी दो बुआओं के बाद तो घर में इतने सालों बाद भतीजी आई है, आपको तो ख़ुश होना चाहिए."
दो माह पश्चात् ही मैंने एक बेटे को जन्म दिया, पर कसक सी थी कि दीदी के इस बार बेटा हो जाए, तो शायद उन्हें अपने सास-ससुर से सम्मानजनक स्थान मिल जाएगा.
किसी भी क़ीमत पर दीदी को को दिलाने की इच्छा समय के साथ बलवती होती जा रही थी. मेरा बेटा तीन वर्ष का हो चुका था. एक दिन दीदी के घर आई, "दीदी, आप अस्पताल चलेंगी." दीदी परेशान होती हुई बोली, "क्या हुआ तुझे?"
"अरे दीदी परेशान मत हो, थोड़ा चेकअप कराना है."
दीदी ने बताया, "अनु, मुझे भी दिखाना है पन्द्रह दिन ऊपर हो गए हैं, किन्तु विशेष परेशानी नहीं बस थोड़ी कमज़ोरी सी लगती है."
मैंने मज़ाक किया, "क्यों दीदी इस बार दोनों की तारीख़ एक ही आएगी क्या?" डॉक्टर ने दोनों मुआयना किया. बड़े ही आश्चर्य से बोले, "क्या बात है, दोनों के बीच बस हफ़्ते का ही फ़र्क़ है, क्या योजना प्रेग्नेंसी है?" मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, ऐसी बात तो नहीं, महज़ एक इत्तेफ़ाक, पर सुखद है."

अब मैं अक्सर दीदी को याद दिलाती रहती थी, "देखना दीदी इस बार आपको बेटा और मेरी बेटी होगी." दीदी के घर जाती उनके ससुरालवाले व जीजाजी के साथ हमेशा शर्त लग जाया करती कि इस बार दीदी को बेटा ही होगा. यह सुनकर ही उनके परिवारवाले ख़ुश हो जाया करते.

इस बार भी हम डिलीवरी के लिए अपने मायके निश्चित समय पर पहुंचे. निश्चित समय पर हम अस्पताल पहुंच गए. भगवान ने हमारी सुन ली मुझे बेटी और दीदी को बेटा हुआ.

मैं व दीदी दो माह बाद अपने-अपने घर चली गईं. रोहन व उसके माता-पिता बिटिया से बहुत ख़ुश थे. हमारा तबादला हो गया था व अगले हफ्ते ही हमें जाना भी था. मुझे व दीदी दोनों को ही एक-दूसरे से बिछड़ने का दुख था, पर जाते-जाते दीदी की बिटिया प्रतिज्ञा के पैदा होने के समय उठे उनके मन के संकल्प याद दिला उस पर अमल करते रहने की सलाह दी.

समय अपनी गति से व्यतीत होता रहा और समय के साथ ही बच्चे भी बड़े होते गए. चारों बच्चे पढ़ने में होशियार थे. बढ़ती उम्र व पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के करण और रोहन के साथ तीन साल बाहर चले जाने से दोनों बहनों को आपस में मिले व दिल की बातें किए एक ज़माना गुज़र गया था. दीदी के पत्रों से इतना अवश्य पता चलता था कि जैसे दीदी में अब पहले वाली बात नहीं है. अब उन्होंने अपने परिवार में अपनी इज़्ज़त, स्वाभिमान बनाने के साथ बच्चों को भी बड़ा संस्कारी, शिक्षित व स्वयं के प्रति बच्चों में एक श्रद्धा केन्द्रित की थी.
एक दिन सुबह-सुबह पेपर पढ़ा, तो मारे आश्चर्य व ख़ुशी से आंखों में आंसू लिए चिल्ला पड़ी. रोहन नहा रहे थे. बाथरूम का दरवाज़ा बाहर से ही पीट-पीट कर कहने लगी, "रोहन सुनो, कितनी बड़ी ख़ुशख़बरी है, मुझे तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा, जल्दी बाहर आओ." रोहन घबराए से आधे नहाये बाथरूम से निकले और पूछा, "क्या हुआ?"
"यह देखो पेपर की ख़बर." बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था प्रतिज्ञा शर्मा पिता अनिल शर्मा आई.आई.टी में प्रथम स्थान पर रहीं. रोहन ने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रखते हुए कहा, "हां अनु, यह सच है हमारी प्रतिज्ञा बेटी ही आई.आई.टी में प्रथम है. तुम्हें उसकी तस्वीर देखकर भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा शायद इसलिए कि तुम्हारी आंखों से अभी तक आंसू बह रहे हैं." अनु आंसू पोंछते हुए अपने को संयत करते हुए बोली, "मेरी ख़ुशी के मारे यह स्थिति है, तो दीदी-जीजाजी की स्थिति मेरी कल्पना से बाहर है. आज उसके दादी-बाबा के पैर ज़मीन से न जाने कितने ऊपर उठ गए होंगे." रोहन मेरी स्थिति बहुत अच्छी तरह समझ रहे थे. उन्होंने कहा, "दीदी को फोन लगाओ और बोलो हम एक घंटे बाद रवाना होकर शाम तक ख़ुद पहुंच कर प्रतिज्ञा को बधाई देंगे." यह ऑफिस जाकर कुछ ज़रूरी काम देखकर छुट्टी लेकर आने को कह गए थे. मैंने शीघ्रता से अपने व इनके कपड़े लगाए. कुछ लोगों के फोन आए व कुछ को समाचार दिए और रवाना हो गए. हम लोगों के तबादले जल्दी-जल्दी होने की वजह से दोनों बच्चे होस्टल में थे उन्हें भी समाचार दिया.
सच दीदी ने प्रतिज्ञा के होने के समय जो प्रतिज्ञा की उसके पूरा करने में भाग्य ने साथ दिया. बेटियां पिता व परिवार के दिल की दुनिया में थोड़ी सी ज़मी, थोड़ा आसमां ही तो चाहती हैं. यदि उन्हें उनका अधिकार मिल जाए, प्यार मिल जाए, तो उनके नाम से भी पिता की पहचान बन सकती है.

"क्यों रोहन यह सच है ना." रोहन ज़ोर से हंसे और बोले, "मैडम आप शरीर से यहां और मन से दीदी व प्रतिज्ञा से बातें कर रही हैं. मुझसे तो तुमने इतनी देर में किसी तरह की बातचीत की नहीं कि मैं तुम्हें कोई जवाब देता." अनु मुस्कुराते हुए झेंप गई.

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रात आठ बजे हम दीदी के घर पहुंच गए. गाड़ी से उतरते ही सबसे पहले दीदी बाहर आ गई थीं. बस मैं व दीदी एक-दूसरे से ऐसे गले लगे कि मन की सारी ख़ुशी, सारी बातें, मानों इस उपलब्धि की बधाई भी एक-दूसरे को इन आंसुओं से ही देना चाहते थे. इतने में प्रतिज्ञा बोली, "मौसी आप सारी बातें इस तरह करेंगी या मुंह से भी कुछ कहेंगी." प्रतिज्ञा की मधुर आवाज़ ने तो आकर्षित किया ही साथ ही उसे मैं एकटक निहारती रही. कितनी सुन्दर लग रही थी. प्रतिज्ञा के चेहरे पर विश्वास की चमक, सादगी की ख़ूबसूरत अदा, शालीनता से पहने लिबास पर लम्बे-लम्बे बालों की चोटी, क्या इसी लड़की ने आईआईटी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है. उसने मेरे पैर छुए व आशीर्वाद में उसे अपने सीने से लगाया और गौरवान्वित महसूस किया. एक नारी की उपलब्धि ने सम्पूर्ण नारी को सम्मानित किया है. आज प्रतिज्ञा की उपलब्धि ने सारे परिवार की धारणा बदल दी. अतः इस परिवार में आनेवाली पीढ़ियों तक लड़की को अभिशाप नहीं माना जाएगा. आज जीजाजी भी बोले, "प्रतिज्ञा के साथ-साथ उसकी मां भी बधाई की पात्र है." इतने में दीदी की सास भी बोल पड़ीं, "भाई अगर बेटियां ही ऐसी होनहार निकल जाएं, तो बेटों के लिए क्यों परेशान होना पड़े."

"अम्माजी, आप यह बात आज कह रही हैं, जिस दिन प्रतिज्ञा पैदा हुई थी सबसे ज़्यादा दुख आपको ही था. उसके पिता व दादा तो उसे एक माह देखने भी नहीं आए थे. मेरे व प्रतिज्ञा के आप लोगों के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से अनु ने अपनी जान पर खेलकर सामान्य प्रसव को भी ऑपरेशन से करवाकर आपकी दूसरी पोती के बदले अपना बेटा मेरी गोद में डाला." दीदी की यह बात सुनकर सबके साथ मैं भी आवाक रह गई. पर अनायास मेरे मुंह से निकला, "नहीं, दीदी नहीं, यह सच नहीं है."

"आज मुझे बोलने दे. मुझे डॉक्टर माथुर से सब पता चल गया है. आज हमारे परिवार व समाज को भी पता चले कि एक नारी के प्रति नारी सम्मानजनक स्थिति पैदा कर उस ख़ुशी भी दे सकती है."

"नहीं दीदी, नहीं इसमें मेरा भी तो स्वार्थ था. मुझे अपना परिवार पूरा करने के लिए प्रतिज्ञा जैसी सुंदर बिटिया चाहिए थी." परिवार के सभी लोगों की आंखों में पश्चाताप के आंसू साफ़ देखे जा सकते थे.

- कल्पना मोगरा

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