कहानी- एक चादर सुंदर-सी (Short Story- Ek Chadar Sundar-Si)

 

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यहां आकर आपकी बातें सुनकर जाना यह भी एक दुनिया है, जो पॉज़ीटिव और सिंपल है. जहां किसी को तुच्छ नहीं समझा जाता, बल्कि उन ख़ूबियों का उल्लेख किया जाता है, जो व्यक्ति में होती हैं. चाह लें, तो हम लोग भी अपना माहौल ऐसा पॉज़ीटिव और सिंपल बना सकते हैं. हर कोई बना सकता है, पर हम पता नहीं क्या पा लेने के फेर में न ख़ुद ख़ुश रहते हैं, न दूसरों को रहने देते हैं.

कच्चे बड़े आंगन में वाणी के विवाह की चहल-पहल है. वैसे शादी जब से पैकेज प्रोग्राम हो गई है, चहल-पहल घरों में नहीं, शादी-घरों में होती है. शादी-घर से विवाह सम्पन्न कर अपने-अपने घर में शांति की नींद सो जाओ. लेकिन ऐसे उत्सव छोटी हैसियतवालों के लिए नहीं. उनके लिए होते हैं, जिनके पास पर्याप्त पैसा है. चमत्कार कहें, संयोग या वाणी का सौभाग्य. छोटी हैसियतवाले घर को एकनाथ जैसा सिविल जज वर मिल रहा है. इंतज़ाम कुछ इस तरह करना है, जो वरपक्ष के अनुरूप लगे. अधिक पैसा भी ख़र्च न हो, तो बारात का स्वागत, जयमाल, प्रीति भोज, पुजारी गार्डन (शादी-घर) से होगा. सप्तपदी और विदाई संकरी गली में स्थित पुश्तैनी मकान से.
अब दूर-पास के नातेदार आठ दिन पहले से नहीं आते. यहां तो घर की छोटी हैसियत से बड़ी हैसियत के हो गए घर के सदस्य ही शादी के दिन या एक दिन पहले पहुंचे हैं कि भीड़भाड़ में उनकी लाइफस्टाइल में व्यवधान न आए.
वाणी का बड़ा, सब-इंजीनियर भाई संजय पत्नी नलिनी और बच्चों के साथ कल रात और छोटा थानेदार भाई संदीप पत्नी जयमाला और पांच माह के बच्चे के साथ आज सुबह आया है.
गणेशी जीजी और प्रभा जीजी ज़रूर अपना-अपना परिवार लिए दो दिन पहले आ गईं. दामादों के लिए सज-धज, राजा बाबू बनकर समारोह में नायक की तरह प्रस्तुत होने के यही तो मौ़के होते हैं. अम्मा ने सूझबूझ से इस तरह कार्य विभाजन किया है कि मालदार बेटे-बहुएं, बेटी-दामाद दृश्य में यूं दिखें मानो शादी का पूरा भार उठाए हैं और मंझला बेटा संजीव, बहू गौरी नेपथ्य में रहते हुए इस तरह पूरा भार उठाए रहें कि दृश्य में उनकी उपस्थिति दिखाई न दे.
“नलिनी, तुम वाणी के साथ पार्लर चली जाना.जयमाला, तुम्हारा बच्चा छोटा है, उसका ध्यान रखो. प्रभा, कुछ कार्ड अभी नहीं बंट पाए हैं, गणेशी के साथ चली जाओ. बाबू अपने घुटनों से लाचार हैं, कहां-कहां जाएं? संजीव को तो देख रही हो. पुजारी गार्डन पता नहीं क्या करने गया है, जो अब तक नहीं लौटा. गौरी इतनी ढीली-ढाली है कि रसोई देख ले वही बहुत है. सब राम भरोसे चल रहा है.”
अपने साथ रहनेवाले संजीव और गौरी से अम्मा खफ़ा रहती हैं. संजय और संदीप अच्छे पद पाकर कुल का नाम चमका रहे हैं. शुरू से पढ़ाई में
कमज़ोर रहा संजीव काला कोट लटकाकर असफल वकालत से घर की लुटिया डुबो रहा है. ऐसे निठल्ले को कौन-सी अप्सरा मिलती? मिल गई साधारण परिवार की साधारण सूरतवाली गौरी. बाबू समझाते हैं, लेकिन अम्मा नहीं समझतीं कि घुटनों से लाचार हुए बाबू यदि पेंशन से घर चला रहे हैं, तो संजय कचहरी के अलावा समय-समय पर गांव जाकर खेती-बाड़ी भी सम्भालता है. गौरी ने इस निपुणता से गृहस्थी सम्भाल ली है कि अम्मा को सेवानिवृत्ति जैसी फुर्सत मिल गई है. आज भी अम्मा बस यही देख रही हैं कि किसने खाना खा लिया है, किसने नहीं. वाणी की मामी अम्मा से बोलीं, “दहेज का सामान तो दिखाओ? क्या-क्या दे रही हो वाणी को? और हां, संजय, संदीप, संजीव क्या दे रहे हैं?”

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अम्मा धीरजभरे अंदाज़ में विस्तृत ब्योरा देने लगीं, “संजय और संदीप ने एक-एक लाख रुपया, गणेशी और प्रभा ने मिलकर सोने का सेट दिया है.”
“संजीव ने?”
अम्मा का मुंह वक्र हो गया, “एक साड़ी, एक अंगूठी, जो दो ग्राम से अधिक न होगी और एक चादर!”
“चादर?”
“गौरी ने बनाई है. कह रही थी पैच वर्कवाली कढ़ाई है. पैच वर्क पता नहीं क्या होता है.”
वाणी की बुआ जानती हैं कि अम्मा संजीव और गौरी को निकम्मा सिद्ध करने का कोई मौक़ा नहीं चूकतीं. बुआ ने अम्मा का विरोध किया, “जो बन पड़ा बेचारे ने दिया. मैं तो जब से आई हूं, दोनों को फुर्सत में नहीं देखा. संजीव बाज़ार दौड़ रहा है, गौरी रसोई सम्भाल रही है.”
“ये लोग यहां रहते हैं, इसलिए जानते हैं कैसे क्या करना है. ग़ज़ब नहीं कर रहे हैं.” कहते हुए अम्मा ने प्रसंग बदल दिया.
“वाणी के भाग्य से इतना अच्छा लड़का मिल गया. समझ लो घर बैठे बात बन गई. वाणी को देखकर एकनाथ ऐसा लट्टू हो गया कि उसका बस चलता, तो तुरंत फेरे ले लेता. एकनाथ के पिता नहीं हैं. माताजी और बड़ी बहन हैं. बहन बाल-बच्चेदार है. भगवान से मनाते हैं, वाणी राजी-ख़ुशी विदा हो.”
अम्मा साफ़ छिपा गईं कि संजीव के साथ गौरी अपने ननिहाल मामा की बेटी की शादी में गई थी. एकनाथ वहां मिला. गौरी ने उसका मोबाइल नंबर ले लिया. लौटकर संजीव ने बाबू को सूचित किया, “बाबू, एकनाथ से बात करो. मैं उसका सेल नंबर ले आया हूं.”
बाबू को लगा संजीव सपना दिखा रहा है, “संजीव, छोटी-मोटी नौकरीवाले लड़के के पिता लाखों का दहेज मांगते हैं. एकनाथ मजिस्ट्रेट है. पचास लाख मांगेगा. मेरी हैसियत तुम जानते हो.”
“बाबू, वाणी सुंदर है. अंग्रेज़ी में मास्टर्स किया है. हो सकता है बात बन जाए. नहीं बनेगी, तो कोई बात नहीं. बात तो करो. मैं एकनाथ को कॉल करता हूं. लो बात करो.”
चमत्कार कहें, संयोग या वाणी का सौभाग्य? एकनाथ अपनी माताजी और बहन श्यामा को लेकर जीप गाड़ी में वाणी को देखने इस तरह आ पहुंचा जैसे बाबू के न्योते की प्रतीक्षा कर रहा था. माताजी ने बातों-बातों में कह दिया एकनाथ को बहुत आधुनिक नहीं, घर-परिवार को महत्व देनेवाली लड़की चाहिए. अम्मा हुलहुला गई. गौरी के हुनर को वाणी का हुनर घोषित कर दिया, “हां, ये कुशन, वाणी ने बनाए… मठरी… हां वाणी ने… खाना वाणी ने… खाकर बताएं कैसा है…”
वाणी पसंद कर ली गई. दान-दहेज की मांग नहीं. विवाह की तिथि तय हो गई. संजीव और गौरी प्रबंध में लग गए, जो वाणी की विदाई तक लगे रहे.
वाणी विदा होकर बरबसपुर (एकनाथ के गांव) पहुंची. एकनाथ बरबसपुर का पहला जज. पूरे गांव को आमंत्रित किया गया. लोग पंगत में खा रहे थे. अचार ख़त्म हो गया. माताजी चिंतित हुईं, “क्या परोसें? नाक कट जाएगी.”
श्यामा ने उपाय बताया, “माताजी, वाणी के साथ कई तरह का अचार आया है. ले आती हूं.”
“जल्दी लाओ.”

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वाणी को जिस लंबे कमरे में बैठाया गया था, उसी में एक ओर दहेज के सामान के साथ कार्टन में अचार की बरनियां रखी थीं. श्यामा ने पूछ लिया, “वाणी, इतने तरह के अचार किसने बनाए? गौरी ने?”
वाणी हड़बड़ा गई. श्यामा गौरी को कैसे जानती है? गौरी को तो हमेशा पीछे रख नलिनी और जयमाला को आगे किया जाता है कि सम्पन्न परिवार की हैं. शादी में यही दोनों आगे दिख रही थीं. वाणी संकोचवश न पूछ सकी, ‘दीदी, आप गौरी को कैसे जानती हैं?’ आम के अचार की बरनी खोलकर ख़ुशबू सूंघते हुए श्यामा बोली, “गौरी बहुत बढ़िया अचार बनाती है. सिंघाड़े का, हल्दी की गांठ का, सेम, आलू, सूरन, कटहल. उसका बस चले तो घास-फूस का भी बना डाले. अच्छा, तुम्हारा खाना भेजती हूं.”
खाना खाकर वाणी सो गई. सांझ ढले श्यामा ने जगाया, “वाणी, तुम्हारा कमरा तैयार कर रही हूं. बिछाने के लिए चादर दो.”
वाणी ने बैग खोला. तीन चादरों में श्यामा को गौरी की बनाई चादर अच्छी लगी.
आसमानी रंग की चादर में पैच वर्क कर गाढ़े नीले रंग के कपड़े के सुंदर फूल टांके गए थे.
“इसे बिछा देती हूं. एकनाथ का फेवरेट कलर है. बुटीक से ख़रीदी?”
“गौरी भाभी ने बनाई.”
“बहुत सुंदर है.”
वाणी सुहाग कक्ष में ले जाई गई. सुहाग सेज पर बड़ी शान से आसमानी चादर बिछी थी. एकनाथ नहीं समझ पा रहा था बात किस तरह शुरू करे. चादर मानो बात करने की प्रेरणा बन गई, “ब़ड़ी सुंदर चादर है. श्यामा दीदी बता रही थीं गौरी ने बनाई है.”
वाणी चकित. एकनाथ भी गौरी को जानते हैं? ये लोग उन्हें इतना कैसे जानते हैं? भाभी ने नहीं बताया इन लोगों से परिचित हैं. बता देतीं, तो बातों को समझने में आसानी हो जाती, पर उनके पास इतना विवेक नहीं है. वाणी भूल रही थी गौरी को कुछ बताने-पूछने का मौक़ा नहीं दिया जाता. वह चुप रहकर सबकी सुनती रहती हैं. वाणी ने धीमे स्वर में कहा, “हां, भाभी ने बनाई है.”
“गौरी कहां अंतर्ध्यान थी? एक-दो बार ही दिखी है. तुम्हें देखने आया था, तब भी बैठक में नहीं आई.”
“कम पढ़ी-लिखी हैं. लोगों से मिलने में झिझकती हैं.”
“अच्छे नंबर लाती थी. बेचारी को स्कूल के बाद पढ़ने का मौक़ा नहीं मिला.”
संकोच हुआ, लेकिन वाणी जिज्ञासा को नहीं दबा पाई, “आप उन्हें इतना कैसे जानते हैं?”
“गौरी ने नहीं बताया? उसकी मां और मेरी ताईजी चचेरी बहनें हैं. ताईजी अब नहीं रहीं. उनके भाई नहीं थे. गौरी के मामा उन्हें बहन की तरह आदर देते थे. ताईजी के संतान नहीं हुई. वे कभी-कभी मुझे अपने साथ पाटन (गौरी का ननिहाल) ले जाती थीं. छुट्टियों में गौरी भी आती थी. हम लोग पूरी दोपहर खेलते थे. फिर पढ़ाई, नौकरी तमाम व्यस्तताएं होती गईं. सालों बाद मैं उससे मामा की बेटी की शादी में मिला. ताईजी तो नहीं रहीं. मामा ने माताजी को आग्रह करके बुलाया. मैं माताजी को लेकर पाटन गया था. गौरी से ख़ूब बातें हुईं. तुम्हारी ख़ूब सराहना की. बोली, ‘हीरा जैसी लड़की चाहिए, तो मेरे दर पर आओ. दहेज न मांगना, वरना मैं दरवाज़े से कह दूंगी आगे जाओ बाबा.’ वह इतनी ख़ुशमिज़ाज है कि माहौल बना देती है”

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वाणी चकित. ख़ुशमिज़ाज? उन्हें तो मरी बछिया की तरह मुंह लटकाए ही देखा है.
“भाभी तो बहुत कम बात करती हैं.”
“अरे, बहुत बात करती है. उसने तुम्हारा ऐसा रूप और गुण बताया कि तुम्हारे बाबू का कॉल आते ही मैं तुम्हें देखने दौड़ पड़ा. देखा, तो देखता रह गया. तुम्हारा बनाया खाना खाया, तो वाह! पत्नी चुनने के सभी के अपने मापदंड होते हैं. मुझे तड़क-भड़कवाली लड़कियां असहज करती हैं. जज ज़रूर बन गया हूं, पर भीतर से सीधा-सरल देहाती हूं. माताजी बरबसपुर में रहती हैं. मेरी पोस्टिंग बलदेवगढ़ में है. चाहता था कि घर-परिवार की फ़िक्र करनेवाली, दोनों माहौल में सामंजस्य बनानेवाली पत्नी मिले. मिल गई.”
वाणी के सामने मानो बहुत बड़ा रहस्य खुल रहा था.
“आप गौरी भाभी की प्रेरणा से मुझे देखने आए, इसका ज़िक्र भाभी और संजीव भैया ने बिल्कुल नहीं किया.”
“उसने मुझे भी मना किया था तुमसे ऐसा कोई ज़िक्र न करूं, लेकिन इस चादर ने राज़ को राज़ न रहने दिया. इस पर नज़र पड़ी और मैं शुरू हो गया. गौरी एकदम सहज लड़की है.”
वाणी का झुका सिर, अधिक झुक गया. इस तरह सिमट गई जैसे अपने में छिप जाना चाहती है. एकनाथ से क्या कहे? जिस गौरी को आप सहज लड़की मान रहे हैं, उनसे मेरे घर में कोई भी प्रसन्न नहीं है. उनके गुण नहीं देखे जाते, अवगुण ढ़ूंढ़े जाते हैं. यहां आकर आपकी बातें सुनकर जाना यह भी एक दुनिया है, जो पॉज़ीटिव और सिंपल है. जहां किसी को तुच्छ नहीं समझा जाता, बल्कि उन ख़ूबियों का उल्लेख किया जाता है, जो व्यक्ति में होती हैं. चाह लें, तो हम लोग भी अपना माहौल ऐसा पॉज़ीटिव और सिंपल बना सकते हैं. हर कोई बना सकता है, पर हम पता नहीं क्या पा लेने के फेर में न ख़ुद ख़ुश रहते हैं, न दूसरों को रहने देते हैं. गौरी भाभी जैसे लोग नेपथ्य में रहकर अपना कर्त्तव्य करते हैं और हम जैसे लोग वाहवाही लूटने का ढोंग करते हैं.
वाणी ग्लानि से भर गई. एकनाथ का ध्यान उसकी अवस्था पर गया. इतना बोल रहा है, निरंतर बोल रहा है. कभी गौरी, कभी चादर की बात कर रहा है, लेकिन यह नहीं पूछ रहा है कि वाणी कैसा महसूस कर रही है? कितनी घबराई हुई लग रही है. अरे बाबा, दुल्हन बहुत नई है. अपने अलावा कुछ सुनना नहीं चाहती होगी. वह वाणी के समीप खिसक आया, “क्या सोच रही हो? प्राणनाथ यह क्या ले बैठे? इस चादर ने सब गड़बड़ कर दिया… ख़ैर… मास पारायण का एक अध्याय समाप्त, दूसरा अध्याय शुरू…”
एकनाथ ने जिस तरह क्षमाप्रार्थी की मुद्रा बनाकर वाणी को देखा, वाणी के चेहरे को सुर्ख़ होना ही था.

       सुषमा मुनीन्द्र

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