मैं देर तक उस काग़ज़ को हाथ में लिए बैठा रहा. इतने सालों में कितनी बार मन हुआ था उससे बात करने का. मगर हर बार यही सोचा, कभी मिलेंगे तो बात कर लेंगे. अब सोचता हूं, काश उस दिन मैं ही उसके पास चला गया होता.
बारहवीं में नैंसी ग्रोवर मेरी सहपाठी थी. दोस्ती बहुत गहरी थी, मगर उम्र बचपने की ही थी. इसलिए शायद छोटी-छोटी बातें भी बहुत बड़ी लगती थीं. एक दिन किसी बात पर हम दोनों में मनमुटाव हुआ. उसने बात करना छोड़ दिया और मैंने भी अपनी तरफ़ से चुप्पी साध ली.
दोनों को लगता रहा पहले दूसरा बात करेगा.
फिर बारहवीं ख़त्म हो गई.
स्कूल छूट गया. शहर वही रहा, मगर रास्ते अलग हो गए. ज़िंदगी अपनी अपनी व्यस्तताओं में हमें दूर ले गई.
कभी-कभी नैंसी याद आती. सोचता, कहीं मिल गई तो सबसे पहले उसी पुरानी बात पर हंसूंगा. कहूंगा, “यार, हम भी कितने बच्चे थे.”
मगर वह मुलाक़ात कभी नहीं हुई.
बीस साल बाद एक पुराने परिचित से अचानक नैंसी का नाम सुनाई दिया.
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मैंने सहजता से पूछा, “कहां है आजकल?”
वह कुछ पल चुप रहा.
फिर बोला, “तुम्हें नहीं पता? नैंसी तो कई साल पहले गुज़र गई.”
मेरे भीतर जैसे किसी ने अचानक शोर बंद कर दिया.
उस रात पुरानी आलमारी खोली. बारहवीं की किताबों और कॉपियों के बीच एक पुराना काग़ज़ मिला. उस पर नैंसी की लिखावट थी. शायद किसी दिन मेरी कॉपी से कुछ लिखते हुए उसने यूं ही नीचे लिख दिया था-
“बात नहीं करूंगी… लेकिन दोस्ती नहीं टूटेगी.”
मैं देर तक उस काग़ज़ को हाथ में लिए बैठा रहा.
इतने सालों में कितनी बार मन हुआ था उससे बात करने का. मगर हर बार यही सोचा, कभी मिलेंगे तो बात कर लेंगे.
अब सोचता हूं, काश उस दिन मैं ही उसके पास चला गया होता.
काश मैंने अपनी ज़िद छोड़ दी होती.
काश…
बीस साल पहले की उस दोपहर में लौटकर बस इतना कह पाता, “नैंसी, चलो छोड़ो… दोस्ती में इतना भी क्या रूठना.”
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लेकिन कुछ बातें कहने के लिए उम्र भर का समय भी कम पड़ जाता है.
और कुछ लोग… ज़िंदगी से चले जाने के बाद भी हमें उसी जगह खड़ा छोड़ जाते हैं, जहां उनसे आख़िरी बार बात करनी चाहिए थी.

तेजस मिश्रा

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