कहानी- फिक्स्ड डिपॉजिट (Short Story- Fixed Deposit)

इस बार भी उस वार्ड के सन्नाटे को अनु ने ही तोड़ा, पर इस बार उसकी आवाज़ में फुसफुसाहट थी, “जीजी, ज़रा करीब आओ…” उसने मीरा को इशारे से अपने पास बुलाया.
मीरा उसके क़रीब गई, उसने कहा, “जीजी… मेरा मरद और देवर निक्कमे हैं, अगर आपको पैसा मांगे, तो मना कर देना. भूले से मेरे फिक्स्ड डिपॉजिट के बारे में मत बताना. वह मेरी छुटकी का है.”

रोज़ की ही तरह सुबह ठीक साढ़े नौ बजे दरवाज़े की घंटी बजी. अनु का घंटी बजाने का तरीक़ा 4 सालों से बिल्कुल भी नहीं बदला था. दरवाज़ा खोलने में जरा देर क्या हुई वह बाहर से ही ज़ोर से चिल्लाने लगी, “जीजी.. ओ जीजी… घर पर हो या नहीं, अरे कम-से-कम चाबी ही रख जाती, मैं काम कर लेती.” 5 मिनट बाद मीरा ने दरवाज़ा खोला और बोली, “क्या अनु, ऐसा लगा आज तो तुम दरवाज़ा ही तोड़ दोगी.” मीरा ने जरा खीझभरे स्वर में कहा.
दुगुने उत्साह और तेजी के साथ अनु अंदर आई और कहने लगी, “जीजी, आज टाइम नहीं है. छुटकी के पापा जल्दी काम पर जानेवाले हैं, तो घर जल्दी जाना है, पर जीजी तुम आज ढिली-सी क्यों हो? तबियत तो ठीक है?” मीरा ने डाइनिंग टेबल की कुर्सी खींची और बैठते हुए कहा, “अनु, रात से ज़रा हरारत-सी है. शरीर में ऐंठन है. कुछ खाने का मन नहीं कर रहा.” इतना सुनना था कि अनु अपने हाथ की झटकन छोड़, किसी मां सी फ़िक्रमंद हो मीरा के समीप आई. मीरा के माथे को छूते हुए उसने कहा, “जीजी तप रही हो, चलो कमरे में सो जाओ. मैं पट्टी कर देती हूं. कोई दवाई हो, तो बताओ, मैं निकाल दूं.”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, “अनु, तुम रहने दो मैं कर लूंगी. तुम्हें घर जल्दी जाना है, तुम अपना काम करके चली जाओ…”
अनु ने मीरा को जबर्दस्ती बिस्तर पर लिटाया और चादर उड़ाते हुए कहने लगी, “जीजी, आग लगे ऐसे काम को. तुम बिना बात किए सो जाओ.” फिर उसने मीरा को दवाई दी. पट्टियां करी. लगभग एक घंटे बाद मीरा का बुखार थोड़ा कम हुआ, तो अनु बोली, “जीजी, रसोई में खिचड़ी बनाकर रखी है, खा लेना. मेरा काम ख़त्म हो गया है, मैं जा रही हूं. फिर तबियत ख़राब लगे, तो मुझे फोन कर लेना.” इतना कहकर घुटने के ऊपर तक अपनी साड़ी को खोंसकर लंबे डग भरते हुए किसी वीरांगना की भांति वह वहां से निकल गई.
यह थी अनु… कहने-सुनने, देखने में नौकरानी, पर किसी जन्म में ममतामयी मां रही होगी. उसे हर किसी की फ़िक्र रहती थी. कद से लंबी थी. शरीर छरहरा था. रंग शायद कभी गेहुंआ रहा होगा, पर अब परिस्थितियों के घर्षण ने सारी चमक छीन ली थी. बाल काले-लंबे, पर रबड़ बैंड से हमेशा बंधे रहते थे. 10-12 घरों के काम करने के बावजूद अनु कभी थकी-हारी नहीं लगती थी. उसके चेहरे पर सजी छह इंच की मुस्कान स्वर्ण-आभूषणों की कमी को पूरी तरह से भर देती थी. उसके चेहरे का तेज अंधरे खान में हीरे की चमक का आभास कराता था. उसे देखकर हमेशा एहसास होता था कि इस ढ़ही हुई इमारत की नींव बहुत मज़बूत रही होगी. मीरा से अनु के संबंध कुछ अधिक प्रगाढ़ थे. मीरा भी किसी बड़ी बहन की भांति अनु का ख़्याल रखती थी.

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दूसरे दिन ठीक साढ़े नौ बजे अपने ख़ास अंदाज में अनु ने मीरा के दरवाज़े की घंटी बजाई. मीरा ने दरवाज़ा खोला और अनु ने अपने चिर-परिचित मुस्कान के साथ प्रवेश किया और मीरा के माथे को छूते हुए कहा, “जीजी, आज तो बिल्कुल घोड़े की तरह टनाटन लग रही हो. लगता है तबियत ठीक हो गई तुम्हारी.” उसे चाय का कप पकड़ाते हुए मीरा बोली, “क्या अनु तू भी… कम-से-कम मिसाल तो अच्छी दिया कर. घोड़े जैसी क्या होता है?”
अनु चाय की चुस्की के साथ खीसे निपोरते हुए बोली, “सारी जीजी.” मीरा ने आगे कहा, “कल शाम तुम्हारे भैया डॉक्टर के पास ले गए थे, एक इंजेक्शन में ही फुर्ती आ गई.”
अनु बोली , “देखो जीजी, पढ़ा-लिखा होना कितना ज़रूरी है, हम ठहरे निरे अनपढ़, हमारे पति को तो समझ ही ना आवे कि कब डॉक्टर की ज़रूरत है और कब नहीं… जीजी हम तो ऐसे ही मर जाएं अगर कभी बीमार पड़े…” और इतना कहकर ख़ूब खिलखिलाकर हंस दी.
काम का या परिस्थिति का तनाव कभी अनु के चेहरे पर नहीं दिखाई देता था. हमेशा हंसती-खेलती किसी हिरनी की भांति कुलांचे भर्ती रहती. मीरा के जीवन में वैसे तो कोई कमी नहीं थी, पर उम्र के जिस दौर से वह गुज़र रही थी, उसने मीरा को अकेला कर दिया था. आज की सो कॉल्ड क्रीम सोसाइटी में केवल गृहिणी होना किसी अभिशाप से कम नहीं. मीरा का बेटा 14 साल का हो गया था, जो ज़्यादातर स्कूल, दोस्त और खेल के मैदानों में रहता था. पति में कोई बुराई नहीं थी, पर वह पैसा कमाने की कभी ख़त्म ना होनेवाली दौड़ में शामिल था.
इन सबके बीच 40 साल की उम्र में मीरा को अकेलेपन की सौगात मिली थी. पर दिन के उन दो घंटों में जब अनु आती थी, वह अपने अकेलेपन को पूरी तरह भूल जाती थी. अनु और मीरा के रिश्ते में कोई वादे, अपेक्षाएं या कोई लकीरे नहीं थी, पर फिर भी रिश्ता प्रगाढ़ था. सुलझा हुआ था. इस रिश्ते का आदि-अंत दोनों में से किसी को भी नहीं पता था. परिस्थितियों का बहाव और समय की मौजे रिश्ते को नई दिशा दे रही थी.
मीरा उस दिन अपनी आलमारी साफ कर रही थी. उसने कुछ अच्छी साड़ियां अनु के लिए निकाल ली, तभी अनु ने घंटी बजाई. मीरा ने दरवाज़ा खोला, पर आज अनु नामक तूफ़ान बहुत शांत था. भूकंप की तरह धरती को कंपा देनेवाले उसके पैरों मैं आज जान कम थी. आते ही रसोई में उकड़ी बैठते हुए उसने कहा, “जीजी, चाय बनाओगी क्या? आज पैर सौ-सौ मन भारी हो गए हैं. चक्कर से आ रहे हैं. थकान लग रही है.”
पहली बार अनु थकी-हारी लग रही थी. मीरा ने अनु को चाय नहीं, दूध दिया और कुछ फल भी. खाकर अनु वहीं कुछ देर सो गई. अनु के उठने पर मीरा ने उससे कहा, “मुझे लगा आज तो तुम ख़ुश हो जाओगी. देखो, मैंने तुम्हारे लिए क्या निकाला है…” साड़ियों का बड़ा-सा गट्ठर उसे देते हुए मीरा मुस्कुराती. अनु साड़ियां देखकर बहुत ख़ुश हुई.
मीरा ने आगे कहा, “अनु और यह लो तुम्हारा पगार.” अनु ने अपने पगार में से हज़ार रुपए निकालकर मीरा को दिए और कहा, “जीजी, यह छुटकी के पैसे रख लो.”
मीरा ने पैसे के लिए और कहा, “अनु, चार साल हो गए तुम्हें पैसा जमा करते हुए. इतना पैसा मेरे पास रखना ठीक नहीं. मैंने तुम से कितनी बार कहा है, चलो मेरे साथ हम किसी बैंक में छुटकी के नाम से फिक्स्ड डिपॉजिट अकाउंट खोल लेते हैं.” उसकी बात को बीच में काटते हुए अनु ने कहा, “जीजी, सुनो मेरा फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक तो तुम ही हो. मेरे मरद को अगर पता चल गया, तो सारा पैसा निकलवा लेगा. वैसे मन का अच्छा है जीजी वो, पर मरद जात को कहां घर-परिवार समझता है. मेरी छुटकी को मुझे उस झोपड़े से बाहर निकालना है जीजी. वह पढ़ने-लिखने में अच्छी है. आप लोगों जैसे कुछ-कुछ अंग्रेज़ी भी बोल लेती है.” यह बताते समय उसके चेहरे की चमक ही अलग थी. अगले दिन फिर से जीवन उसी चाल से चलने लगा.

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अनु और मीरा जब भी चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे मारते, तो झोपड़े और महल का फ़र्क मिट जाता, तब सिर्फ दो ऊर्जाएं होती थीं, जो एक-दूसरे को प्रज्वलित करती थीं. कई बार उन दोनों की चर्चाएं सांसारिक होते हुए भी अलौकिक होती थी. मीरा की दी हुई पेंसिलें और कॉपियां छुटकी का भविष्य लिख रहे थे, तो वहीं अनु का अपनापन और स्वामी भक्ति मीरा के जीवन में आर्द्रता बनाए रख रही थीं. पर आजकल अनु की तबियत कुछ मचली-सी रहने लगी थी, बावजूद उसकी छह इंच की मुस्कान कायम थी. 

उस दिन अनु आई, तो अकेली नहीं थी छुटकी भी साथ थी. मीरा ने छुटकी के गालों को सहलाते हुए कहा, “छुटकी, स्कूल नहीं गई. सब ठीक तो है? चल तुझे चॉकलेटवाला दूध बना दूं.”
अनु ने जवाब दिया, “क्या बताऊं, भगवान तो जैसे परीक्षा ही ले रहा है. मेरी तबियत में हर हफ़्ते 300-400 ख़र्च हो रहे हैं. सास की दिमाग की नस फट गई पिछले महीने, तो वह बिस्तर पर है. और अब छुटकी को तीन-चार दिनों से बुखार है. डॉक्टर के पास जाओ तो लूट लेता है. दवाई भी दी और ख़ून जांचने के लिए पैसे भी ले लिए.”
मीरा ने कहा,”अनु, ऐसा नहीं है. अच्छा किया, जो ब्लड टेस्ट करवा लिया और पैसे तो तू मुझसे ले जा.” अनु ने कहा, “नहीं जीजी, तुम पहले ही बहुत कुछ कर चुकी हो.”
मीरा ने फ़िक्रमंद होकर कहा, “तो फिर तूने जो ढाई लाख जोड़ रखे हैं, उसमें से ले जा…” मीरा का इतना कहना था कि अनु तपाक से बोली, “जीजी भूल से ऐसा मत कहो. वह मेरी छुटकी का तिनका-तिनका जमा किया हुआ भविष्य है. उसे अस्पताल में ना बहाऊंगी.” यही एक विचार अनु के जगमगाते व्यक्तित्व को बुझा देता था. मीरा ने अनु के बेचैनी से मलते हुए हाथों पर अपनी आश्वासन देनेवाली हथेलियों को रख दिया और कहा, “अनु मैं समझती हूं, छुटकी तुम्हारी छोटी-सी आंखों में पलता हुआ बड़ा-सा सपना है और मुझ पर विश्‍वास रखो. मैं सपने की ख़ूबसूरती को हमेशा बरक़रार रखूंगी।” यह वादा मीरा ने अनु को नहीं किया, बल्कि वर्तमान में भविष्य से किया था. अनु ने आश्वस्त आंखों से मीरा की ओर देखा और अपने उसी मखौलभरे अंदाज में बोली, “जीजी डॉक्टरों की समझ में ना आती है मेरी बीमारी. कोई छोटा-मोटा भूत-पिशाच होगा. अभी किसी ओझा को सौ-पचास दूंगी तो उतार देगा.” इतना कहकर अपने ही दुख और पीड़ा का मज़ाक बनाकर वहां से चली गई.

अगले दिन मीरा को पता था कि अनु के साथ छुटकी फिर आनेवाली थी, इसलिए उसने अपने बेटे रवि की कुछ कहानियों की किताबें निकाली. अनु आई और उसके साथ में छुटकी भी थी. अनु ने कहा, “आज भी कुछ अच्छा-सा नहीं लग रहा. दिल बैठा जा रहा है. छुटकी अब कुछ ठीक है. जीजी आज तो बस आपका काम करके चली जाऊंगी.”
मीरा बोली, “अरे अनु रहने दे, आज तू घर जा मैं काम कर लूंगी.” अनु ने तपाक से जवाब दिया, “जीजी, आप जानो हो, बाकियों को तो लगे हैं कि मैं बहाना बनाती हूं.. घूमने जाती हूं.. वह आपके ऊपर रहती है ना बस नाम की धनवान है स्वभाव से चुड़ैल है चुड़ैल… कहती है अगर एक दिन भी नहीं आई, तो पैसे काट लूंगी.” मीरा खिलखिलाकर हंस रही थी और हंसते हुए अनु से बोली, “तो जा अपनी चुड़ैल के घर काम कर आ और छुटकी को मेरे ही पास रहने दे.” अपनी कही बात पर मीरा झेंप गई और कुछ सकुचाते हुए बोली, “हे भगवान! मुझे भी ख़ुद की तरह बना देगी.” अनु हंसते हुए बोली, “चुड़ैल को चुड़ैल नहीं, तो क्या साधु-संत बोलूं. अच्छा जीजी आती हूं.” मीरा छुटकी को सिंड्रेला की कहानी पढ़कर सुनाने लगी. छुटकी उन रंग-बिरंगे चित्रों में जैसे ख़ुद को खोज रही थी. उसकी आंखों की चमक और होठों की मुस्कान बता रही थी कि एक दिन वह ख़ुद सिंड्रेला बन जाना चाहती है. जैसे ही कहानी ख़त्म हुई, छुटकी के प्रश्नों का पिटारा खुल गया, “आंटी क्या फटे-पुराने कपड़े पहनने से सिंड्रेला को राजकुमार मिला?” मीरा ने कहा, “नहीं! ऐसा नहीं है. सिंड्रेला की ईमानदारी व प्रेम के कारण वह रानी बनी.” छुटकी को शायद इतने भारी-भरकम शब्द समझ में ना आए थे, इसलिए उसने तपाक से दूसरा प्रश्न किया, “आंटी क्या सिंड्रेला के जैसे मुझसे मिलने भी परी मां आएगी?” तभी दरवाज़ा धड़ाम की आवाज़ के साथ खुला और अनु दनदनाते हुए अंदर आई और बोली, “हां… हां परी मां आएगी, पर अभी तो अपनी इसी मां से काम चला ले, चल घर चल…” इतना कहकर अनु उसका हाथ खींचने लगी. जाते-जाते बोली, “जीजी, पेट में ना महावारी की तरह मरोड़ रहे हैं. घर जाकर थोड़ा आराम करती हूं.”

दिन गुजरते गए और धीरे-धीरे अनु नामक रेलगाड़ी पटरी पर सुचारू रूप से दौड़ने लगी. उसका मुंह किसी बेलगाम घोड़े की तरह था, जो बिना किसी सोच-विचार किए बस चलता रहता था, फिर चाहे उसके पति की शराब की आदत हो या उसकी मां के गांव में पकी फसलों की… वह निर्विघ्न सब कुछ बताती रहती. वह कहीं रुकती थी, तो वह जगह थी छुटकी का भविष्य. अनु छुटकी को पतरे की छत की जगह खुला व विस्तृत आसमान देना चाहती थी. उसे शराब की लत, पानी की कमी, खाने की कमी, फटे कपड़े आदि सब से दूर रखना चाहती थी.
देखते ही देखते दिसंबर का महीना शुरू हो गया. अनु हमेशा की तरह ठीक साढ़े नौ बजे आई, “जीजी, ओ जीजी, सुन रही हो…” बर्तन मांजते-मांजते वह बोली. मीरा ने जवाब दिया, “हां.. सुन रही हूं, बोल… तेरा ना सुनकर मैं कहां जाऊंगी और क्या तू मुझे बिना सुनाए कहीं जाने देगी.”
“जीजी, जा तो रही हो तुम.. अब 15 दिन तुमसे बात ना होगी. मन बैठा जा रहा है.”
मीरा बोली, “तू तो ड्रामेबाज है… अब क्या हमेशा के लिए जा रही हूं, भाई की शादी है. 15 रोज़ में लौट आऊंगी. तब तक तेरे मुंह और मेरे कानों को थोड़ा आराम मिल जाएगा…” और दोनों खिलखिलाकर हंस दी.
देखते ही देखते 15 दिन बीत गए. मीरा शादी से वापस लौट आई. 15 दिनों में ना महीना बदला था, ना ही मौसम, पर ऐसा कुछ था, जो अब बहुत बदल चुका था. घर बहुत गंदा हो गया था, पर मीरा निश्चिंत थी, क्योंकि उसे पता था कल अनु आएगी और सब पहले की तरह चमक उठेगा. रात को खाना खाने के बाद मीरा ने अनु को कल काम पर बुलाने के लिए फोन किया. फोन उसके पति ने उठाया. अनु के बारे में पूछने पर उसने बोला, “मैडमजी, अनु तो अस्पताल में है. बीमार है, अभी सात रोज़ पहले उसे भर्ती करवाया.” मीरा बेचैन हो उठी. अस्पताल का नाम-पता लेकर उसने फोन रख दिया. पूरी रात वह ख़ुद को समझाती रही कि अनु ठीक होगी. पौ फटते ही वह सीधे अस्पताल की ओर दौड़ी.
सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में एक मैले-कुचले बिस्तर पर अनु किसी नर कंकाल की तरह दिख रही थी. उसकी चिर युवा हंसी उस बिस्तर की बिछी हुई चादर की किसी भी तह में नहीं दिखी. मीरा उसके पास जाने से डर रही थी. अनु की चमड़ी काली व सिकुड़ गई थी. उसकी बेबाक बोलनेवाली जीभ सुखी और कमज़ोर हो गई थी.
मीरा ने अनु को इतना शांत और चुप कभी नहीं देखा था. मीरा चाहती थी कि अनु को झकझोर कर जगाए और फिर से एक बार बहुत सारी बातें करें. उसकी खिलखिलाती हुई हंसी की गूंज सुने पलंग के पास रखे लकड़ी के स्टूल पर बैठते हुए मीरा ने अपना हाथ अनु के कंधे पर रखते हुए धीरे से कहा, “अनु, ए.. अनु, कैसी है?” बड़ी पीड़ा के साथ अनु ने अपनी आंखों को धीरे से खोला और उस पीड़ा में भी चहक उठी, “जीजी, तुम कब आई? देखो तो मेरे भूत को ओझा भी ना भगा पाया, बड़ा दर्द हो रहा है जीजी…” उसकी क्षीण आवाज के दर्द को महसूस कर मीरा की आंखें गीली हो गई.
वह बोली, “क्या हो रहा है रे अनु! डॉक्टर क्या कह रहा है?” बड़े अज्ञान के साथ उसने बताना शुरू किया, “जीजी, डॉक्टर कह रहा है कैंसर हो गया है बच्चेदानी का. भगवान जाने कौन-सी बीमारी है?.. मैं तो यहां पड़े-पड़े जम गई हूं… एक बार डॉक्टर यहां से छोड़े, तो अपना काम का शुरू करूं…”
“कैंसर…” मीरा के मुंह से इतना ही निकला. मीरा के पैरों तले जमीन निकल गई. उसने सोचा ‘इतने प्राणघातक रोग को इतने हल्के में अनु ही ले सकती है.’ अनु को अपनी ग़रीबी के सामने कोई रोग.. कोई समस्या बड़ी नहीं लगती थी. अनु की अवस्था ने मीरा के मुंह और सोच पर ताला लगा दिया था.
इस बार भी उस वार्ड के सन्नाटे को अनु ने ही तोड़ा, पर इस बार उसकी आवाज में फुसफुसाहट थी, “जीजी ज़रा करीब आओ…” उसने मीरा को इशारे से अपने पास बुलाया.
मीरा उसके क़रीब गई, उसने कहा, “जीजी… मेरा मरद और देवर निक्कमे हैं, अगर आपको पैसा मांगे, तो मना कर देना. भूले से मेरे फिक्स्ड डिपॉजिट के बारे में मत बताना. वह मेरी छुटकी का है.” मीरा ने उससे कहा, “अनु, अगर तेरे इलाज में वह पैसा लग जाए, तो क्या बुरा है. पैसा फिर से जमा किया जा सकता है अनु, पर…” बीच में ही बात काटते हुए अनु बोली, “जीजी, भूले से ऐसा मत कहना. वह सिर्फ पैसे नहीं है वह मेरा आप पर भरोसा है. मेरी छुटकी का सबसे छुपाकर रखा हुआ सुनहरा भविष्य है. मेरी एक-एक सांस है वह रुपया. मैं मर भी जाऊं तो दुख नहीं, पर मेरी छुटकी तो जी लेगी.” मीरा ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखकर उसे आश्वस्त किया.
मीरा ने अनु से कहा, “चल अब आराम कर, मैं कल फिर आऊंगी.” बाहर निकलते ही मीरा ने डॉक्टर को ढूंढा और उससे अनु के बारे में पूछा, डॉक्टर का जवाब बड़ा निराशाजनक था. डॉक्टर ने कहा, “देखिए लास्ट स्टेज है. ना ऑपरेशन काम आएगा और ना ही कुछ और.. इस पर इनकी माली हालत तो आपको पता ही है, ज़्यादा-से-ज़्यादा एक महीना खींच ले तो बहुत है.” इतना कहकर डॉक्टर वहां से चला गया. मीरा वहीं बेंच पर बैठ गई, पैरों से जान निकल गई थी. वह सोच रही थी, ‘अनु अब सिर्फ एक महीना. हंसती-खेलती, चिढ़ाती-मनाती अनु, चली जाएगी.’ कहने को अनु सिर्फ नौकरानी थी, पर मीरा और उसका रिश्ता अलौकिक था. मीरा और अनु दोनों अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे का संबल थी. मीरा के लिए अनु प्रकाश की वह छोटी-सी लौ थी, जिसे देखते हुए पूरी रात ठिठुरते ठंड में पानी में खड़ा रहा जा सके… और अनु के लिए मीरा वह विशाल नदी थी, जिसकी गहराई व बहाव में उसकी ग़रीबी, चिंता.. सब कुछ समा जाता था.

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अगले दिन से मीरा रोज़ अस्पताल जाती. अनु के साथ घंटों गप्पे मारती. उसके लिए थरमस में चाय और नाश्ता ले जाती. 10 से 15 दिन देखते ही देखते निकल गए. अनु पहले से बेहतर थी, मीरा को ऐसा लगा मानो यमराज ने मृत्यू की फ़ेहरिस्त से अनु का नाम निकाल दिया हो. एक झूठा विश्‍वास-सा मन में जागा कि शायद अनु ठीक हो जाएगी. और उसी रात लगभग दो बजे अस्पताल से ख़बर आई कि अनु गुज़र गई. मीरा के घरवालों के लिए यह आम ख़बर थी, पर मीरा के लिए जीवन का एक अध्याय समाप्त हो चुका था. जिस तरह से अनु बिना किसी रोक-टोक के घर में दनदनाती हुई आती थी, ठीक उसी तरह वह आज जा चुकी थी.
मीरा पूरी रात जाग रही थी. सुबह ठीक साढ़े नौ बजे घंटी बजी. मीरा सहम गई उसके मुंह से निकला, “अनु..?” उसे एक पल के लिए लगा कि शायद रात को कोई बुरा सपना देखा था. उसने चहककर दरवाज़ा खोला, पर यह क्या? वह बुरा सपना उसके सामने यथार्थ के रूप में खड़ा था. दरवाज़े पर अनु का पति और देवरानी लक्ष्मी थे. मीरा को सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले? तभी अनु के पति ने बोलना प्रारंभ किया, “मैडम, अनु का अंतिम संस्कार दोपहर को करना है. थोड़ा पैसे का मदद हो जाता, तो अच्छा था.” मीरा ने उन्हें रुकने के लिए कहा और अंदर से पांच हज़ार रुपए ले आई. उसने पैसे अनु के पति की ओर बढ़ाएं, तो उसने कहा, “नहीं… नहीं मैडम यह पैसा नहीं,‌ पूरे गांव को खाना खिलाना है. अनु की लाश को गांव लेकर जाना है. मुझे यह लक्षमी बता रही थी कि उसे अनु ने मरते समय बताया कि उसने छुटकी के लिए कुछ पैसा आपके पास रख छोड़ा है. आप मुझे वही दे दो.”
मीरा तपाक से बोली, “वह अनु ने छुटकी के लिए रखा है तुम्हारे लिए नहीं.”
अनु के पति ने कहा, “वह तो पगलिया थी मैडम. हमारे बच्चे हमारे जैसे ही बनेंगे.. काहे का डॉक्टर और इंजीनियर… अगर यह पैसा ना मिला, तो अनु को आग ना मिल पाएगी.. फिर किस काम का यह रुपया?”
इस पर लक्ष्मी ने कहा, “देखो मैडम, हमारी बच्ची के भविष्य की चिंता आप ना करो, ग़रीबी उसके भाग्य में है. आप जल्दी पैसा ढीला करो, तो अनु भौजाई को अग्नि नसीब हो… न ही तो पुलिस से मामला सुलझा लेते हैं.” मीरा समझ गई थी कि इस बहस का अंत एक ही था. अनु के पैसे पर मीरा का हक नहीं था, फिर चाहे यह अनु की आख़िरी इच्छा ही क्यों ना हो? आज अनु के सपनों की तिजोरी में सेंध लग चुकी थी. उस सुराख से छुटकी का भविष्य रेत की भांति फिसल रहा था. अनु का फिक्स्ड डिपॉजिट टूट गया था. मीरा ने आलमारी से पैसे निकालकर लक्ष्मी के हाथ में धर दिए.
उस रात मीरा सो नहीं पाई. रह-रहकर उसे सिंड्रेला की कहानी याद आ रही थी. अनु के साथ ली हुई चाय की हर चुस्की का स्वाद उसके मुंह में ताज़ा हो रहा था. वह सोच रही थी कि क्या ग़रीबी इंसान की जान को सस्ता और उस के सपनों को कबाड़ बना देती है? उसे इस बात ने जीवनभर का पश्चाताप दिया था कि वह अनु का फिक्स्ड डिपॉजिट संभाल नहीं पाई.

अनु की छुटकी का भविष्य संवारने की तीव्र इच्छा उसे कचोट रही थी. काफ़ी देर सोचने के बाद मीरा कुछ ऐसे आश्वस्त हुई जैसे वह किसी निर्णय पर पहुंच गई हो. वह आतुरता से सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी. सूरज की पहली किरण के साथ वह अनु के झोपड़े में गई. जहां अनु की कमी का एहसास छुटकी को छोड़कर किसी को भी नहीं था. उसने अनु के पति से छुटकी को तैयार करने को कहा. वह किसी योद्धा की तरह आत्मविश्वासी लग रही थी. उसने छुटकी का हाथ पकड़ा और उसे सीधे अपने बेटे के स्कूल ले गई. मीरा ने छुटकी का दाखिला अपने बेटे के कॉन्वेंट स्कूल में कराया और फिर उसे नया यूनिफॉर्म और किताबें दिलाई. छुटकी का बाल मन गदगद हो उठा. वापस बस्ती पहुंचकर मीरा ने अनु के पति से कहा, “छुटकी के भविष्य की ज़िम्मेदारी आज से मेरी है. मैं उसे अच्छी शिक्षा दिलवाऊंगी, तुम्हें उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. आज से छुटकी पर मेरा अधिकार है. उसे पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना मेरी ज़िम्मेदारी.” इतना कहकर वह गाड़ी में बैठी अब उसे समझ आ रहा था कि अनु का असली फिक्स्ड डिपॉजिट पैसे नहीं बल्कि छुटकी थी.

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