कहानी- गांठ (Short Story- Ganth)

कहानी- गांठ (Short Story- Ganth)

“कोई भी उलझन ऐसी नहीं होती बेटा कि उसे सुलझाया न जा सके. हर समस्या का समाधान होता है. अगर समय रहते ही उलझन को सुलझा लिया जाए, तो गांठें बनने ही नहीं पातीं. अगर ऐसे ही गांठें काटती रही, तो एक दिन बाल ही नहीं बचेंगे. धैर्य से हर गांठ सुलझ जाती है.” सुभाष ने कंघा हाथ में लिया और धीरे-धीरे सुरभि के बाल सुलझाने लगे.

सुभाष ने जैसे ही चाय का कप टेबल पर रखा सामने से सुरभी ने गुनगुनाते हुए घर में प्रवेश किया.
“आओ बेटा चाय पी लो.” सुरभि की मां रंजना ने उसे आवाज़ दी.
“नहीं मां, मैं अपनी सहेली पारुल के साथ चाय पीकर आई हूं.” सुरभि ने कहा और सीधे अपने कमरे में चली गई.
“तुम्हें इसका व्यवहार कुछ अलग-सा नहीं लग रहा?” सुभाष ने रंजना से पूछा.
“हां, जब से ससुराल से आई है, तब से कुछ बदली-बदली सी तो है. कुछ लापरवाह और मनमाना-सा व्यवहार कर रही है.” रंजना ने जवाब दिया.
“हां, मैं भी देख रहा हूं सुरभि में आए इस बदलाव को. सबका ध्यान रखनेवाली और क़ायदे से काम करनेवाली हमारी बिटिया अचानक स्वच्छंद सी हो गई है, जैसे अपने अलावा किसी दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है उसे. चार-पांच दिनों से देख रहा हूं, सौरभ से भी बात करते हुए नहीं दिखती, वरना पहले जब भी आती थी, तो दिनभर में सौरभ के चार-पांच फोन आ जाते थे. आजकल में थोड़ा इसके मन की टोह लेनी पड़ेगी.” सुभाष चिंतित स्वर में बोले.
सुरभि सुभाष और रंजना की इकलौती बेटी थी. शहर में ही उसका ब्याह हुआ था. पति सौरभ के अलावा घर में सास भी थी. डेढ़ बरस हो गया उसके ब्याह को. सुरभि सबका मन रखकर चलनेवाली थी. सबका ध्यान रखती. साल-छह महीने सब ठीक रहा. पिछले कुछ महीनों से सुरभि उखड़ी हुई सी लगती. पर जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं, यही सोचकर सुभाष और रंजना ने कभी व्यर्थ में उसे कुरेदना ठीक नहीं समझा. गृहस्थ जीवन में थोड़ी-बहुत खटपट तो चलती रहती है. लेकिन इस बार सुरभि का व्यवहार देखकर दोनों चिंतित हो गए. सुरभि पूरी तरह बदल गई. न किसी काम को हाथ लगाती, न किसी की खोज-ख़बर लेती. बस मनमौजी की तरह घूमती रहती. उसका कमरा भी अस्त-व्यस्त पड़ा रहता है. पहले तो उसका कमरा एकदम साफ़-सुथरा और करीने से था. मजाल है कि एक तिनका भी यहां से वहां हो जाए. कपड़े, क़िताबें, बिस्तर सब तरतीब से सजा रहता. और अब गीला तौलिया पलंग पर पड़ा रहता है, क़िताबें, कपड़े सब बिखरे हुए हैं. चादर तक तह करके नहीं रखती. यह सब उसके मन की किसी अव्यक्त परेशानी को व्यक्त कर रहा था. कुछ तो ऐसा हो रहा था, जो उसके मन के विरुद्ध था और वही उसके उलटे व्यवहार द्वारा बाहर आ रहा था.
सुभाष देर तक सोच में डूबे सुरभि के व्यवहार का अवलोकन करते रहे. सबका ध्यान रखने वाली, करीने से काम करनेवाली सफ़ाई पसंद उनकी बिटिया. सुरभि को कभी कुछ विशेष सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी. हर काम को करीने से करने का उसमें ईश्‍वरप्रदत्त गुण था. किसी भी काम को वह एकदम परफेक्ट ढंग से करती थी. काम में ज़रा भी इधर-उधर या लापरवाही उससे बर्दाश्त नहीं होती थी. कई बार तो वह अपनी मां के काम में भी कमियां ढूंढ़ लेती थी. तब रंजना हंसकर कहती, “हां गुरू गुड़ रह गया और चेला शक्कर हो गया.”
अब उसी सुरभि का काम के प्रति ऐसा लापरवाह रवैया? ज़रूर कोई बात है.
दूसरे दिन शाम को सुभाष सुरभि को अपने साथ सैर पर ले गए. थोड़ी देर टहलने के बाद वो दोनों एक पार्क में जाकर बेंच पर बैठ गए. आसपास बहुत से लोग टहल रहे थे. पेड़ों पर पक्षी अपने-अपने घरों में वापस आकर एक आनंदपूर्ण कलरव कर रहे थे. उन पक्षियों का आनंद देखकर सुभाष के कलेजे में एक टीस उठी. विवाह के बाद बेटियां अपनी गृहस्थी में ही अच्छी लगती हैं. यूं तो पिता का घर भी बेटियों का ही होता है, और सुरभि तो यूं भी उनकी इकलौती बेटी है. उनके घर के द्वार हमेशा उसके लिए खुले हैं, लेकिन बेटियों के जीवन का सुख, सच्चा संतोष और आनंद उनके अपने घरों में ही होता है. अपने घोंसलों से भटकने पर वे चिड़ियों की तरह हैरान-परेशान और घबराई हुई हो जाती हैं.


यह भी पढ़ें: राशि के अनुसार कैसे करें होम डेकोर? (How to design your home according to your zodiac sign)

सुरभि के चेहरे पर भी उसके अंतर्मन की अपने घोंसले से दूर होने की बेचैनी और पीड़ा, छटपटाहट साफ़ दिखाई दे रही थी. चाहे वह कितना भी लापरवाही और बेपरवाही दिखाने की चेष्टा करे, पर सुभाष की पारखी नज़रों ने भांप ही लिया. थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करके सुभाष के सामने खुलने लगी.
कोई एक घंटा तक सुरभि बोलती रही. शाम का धुंधलका अब गहराने लगा था. बात ख़त्म करके सुरभि चुप हुई, तो वे दोनों घर लौट आए.
रात को खाना खाने के बाद सुभाष और रंजना छत पर जाकर टहलने लगे. दोनों के बीच सुरभि को लेकर बात होने लगी. रंजना ने बताया कि जब सुभाष और सुरभि घूमने गए थे, तब सौरभ का फोन आया था. विनती कर रहा था कि हम सुरभि को समझाएं, घर की छोटी-छोटी बातों को तूल देकर अपने जीवन में व्यर्थ तनाव न भरने दें.
तब सुभाष ने बताया कि सुरभि किस बात से परेशान है. दरअसल परेशानी सुरभि और उसकी सास के बीच में है. सुरभि को अपने आप पर बहुत ज़्यादा भरोसा है कि वह हर काम को बहुत ज़्यादा अच्छे ढंग से करती है और हर काम में परफेक्ट है. सुरभि का अपने आप पर यह भरोसा ग़लत भी नहीं है. पर उसके काम के तरीक़े में हस्तक्षेप करके उसकी सास ने सुरभि के मन में लगातार खीज पैदा करके अब उसके भरोसे को अहंकार में बदल दिया है. उसकी सास अब तक हर काम अपने तरीक़े से करती आई थी, वो चाहती हैं कि सुरभि घर-गृहस्थी का काम उनके तरीक़े से करें. घर में सब उसी ढ़ंग से चलता रहे, जैसा अब तक चलता आया है. लेकिन सुरभि अपनी गृहस्थी अपने तरीक़े से चलाना चाहती है.
ग़लती किसी की भी नहीं है, पर फिर भी आपसी सामंजस्य और धैर्य की कमी रिश्तों में खिंचाव पैदा करती जा रही है. मामूली-सी बात पर अपने अहं के कारण दोनों अपने घर और रिश्तों के बीच ख़ुद ही दरार उत्पन्न कर रहे हैं. ये दरार अगर बहुत ज़्यादा बढ़ गई, तो इसे भरना मुश्किल हो जाएगा. इसके पहले कुछ तो उपाय करना होगा.
दूसरे दिन नाश्ता करने के बाद सुभाष कुछ बात करने के इरादे से सुरभि के कमरे में गए, तो देखा सुरभी अपने लंबे, घने बालों को सुलझाते हुए बुरी तरह झल्ला रही है.
“क्या हुआ बेटा क्यों इतना चिड़चिड़ा रही हो?” सुभाष ने प्यार से पूछा.
उसके लंबे बालों में जगह-जगह गांठें पड़ी हुई थीं. बाल बुरी तरह उलझ गए थे. ऐसा लग रहा था उसने बहुत दिनों से बालों की ठीक तरह से देखभाल नहीं की है.
“देखिए न पापा बाल इतने उलझ गए हैं कि सुलझ ही नहीं रहे. अब ये गांठें काटनी ही पड़ेंगी और कोई चारा नहीं है.” सुरभि उठी और दराज से कैंची निकालकर बालों की गांठें काटने लगी. सुभाष समझ रहे थे कि वह अपनी अंतर व बेचैनी की भड़ास अपने बालों पर निकाल रही है.
“कोई भी उलझन ऐसी नहीं होती बेटा कि उसे सुलझाया न जा सके. हर समस्या का समाधान होता है. अगर समय रहते ही उलझन को सुलझा लिया जाए, तो गांठें बनने ही नहीं पातीं. अगर ऐसे ही गांठें काटती रही, तो एक दिन बाल ही नहीं बचेंगे. धैर्य से हर गांठ सुलझ जाती है.” सुभाष ने कंघा हाथ में लिया और धीरे-धीरे सुरभि के बाल सुलझाने लगे.
“बेटा उलझन चाहे रिश्तों में हो या बालों में उन्हें समय से और धैर्य से सुलझाना चाहिए नहीं तो गांठें बन जाती हैं. यदि सुलझाने की बजाय बाल काटने की प्रवृत्ति रखी, तो बालों की तरह ही रिश्ते भी एक दिन ख़त्म हो जाएंगे. काटना किसी गांठ से छुटकारा पाने का तरीक़ा नहीं है. नुक़सान अपना ही होता है.” सुभाष ने कहा तो सुरभि चौंक गई.
“मैं जानता हूं मेरी बेटी हर क्षेत्र में हर काम में परफेक्शनिस्ट है, लेकिन एक बार सौरभ की मां के बारे में भी तो सोचो. वो तीस सालों से अपने घर को अपने तरीक़े से चलाती आ रही हैं. अब एकदम से तुम उनके सारे तरीक़ों को नकार कर हर काम अपने तरीक़े से करना चाहोगी, तो उन्हें कैसा लगेगा? रिश्ते आपसी सामंजस्य और सम्मान से मज़बूत होते हैं और ज़िंदगीभर ख़ुशहाल रहते हैं.” सुभाष ने समझाया.


यह भी पढ़ें: Alert! इन तरीक़ों से हो सकते हैं आपके बैंक अकाउंट से पैसे गायब (Cyber Crime: These 10 Ways Money Is Being Stolen From Your Bank Account)

“लेकिन पापा उन्हें भी तो मेरी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए ना.” सुरभि बोली.
“अगर सम्मान पाना है, तो पहले सम्मान देना सीखो. माना तुम्हें लगता है कि तुम्हारे काम करने का तरीक़ा ज़्यादा सही है, लेकिन एक बार अगर उनका मन रखने के लिए उनके बताए अनुसार काम कर लोगी, तो छोटी नहीं हो जाओगी. हो सकता है तुम्हें लगे कि सचमुच उनका तरीक़ा ज़्यादा अच्छा है. और अगर सच में तुम ज़्यादा अच्छा काम करती हो, तब भी इस बात का एहसास उन्हें उनकी भावनाओं को ठेस न लगे इस बात का ध्यान रखते हुए धैर्य से करवाओ. एक दिन तो उन्हें समझ आ ही जाएगा. लेकिन इस तरह यदि जल्दबाज़ी में अपने अहं को सर्वोपरि रखकर धीरज खोती रहोगी, तो जीवन में सबकुछ खो जाएगा.” सुभाष ने सुरभि के सारे बाल सुलझा लिए थे और उसे पता भी नहीं चला.
“यह देखो बेटा धैर्य से सुलझाने पर सारी गांठ भी सुलझ गई और दर्द भी नहीं हुआ.” कहते हुए सुभाष ने सुरभि के बाल गूंथ कर चोटी बना दी और अपने कमरे में चले गए.
शाम को सौरभ और उसकी मां, सुभाष और रंजना के घर आए. सुभाष थोड़ा शंकित हो गए. तभी सुरभि ड्रॉइंगरूम मेें आई. उसने आते ही अपनी सास के पैर छुए, तो उन्होंने उसका माथा चूमकर उसे गले से लगा लिया.
सौरभ भी ख़ुश दिखाई दे रहा था. सुभाष थोड़ा निश्‍चिंत हुए. तब बातों ही बातों में पता चला कि सुरभि ने ही दोपहर को फोन करके उन्हें खाना खाने बुलाया था. खाना खाने के बाद सुरभि उन लोगों के साथ घर वापस जा रही थी.
“मां, मैं पापा को अपने हाथ से बेसन गट्टे की सब्ज़ी बनाकर खिलाना चाहती हूं, लेकिन मुझसे आपके हाथों जैसा स्वाद नहीं आता, चलिए न मुझे बता दीजिए कैसे बनाऊं?” सुरभि अपनी सास से बोली.
“अरे बेटा तुम भी अच्छी ही बनाती हो. चलो दोनों मिलकर बनाते हैं.” सास प्रसन्न होकर बोली और ख़ुश होकर सुरभि के साथ रसोईघर में चली गई.
रंजना ने सुभाष की ओर देखा और दोनों मुस्कुरा दिए. दोनों सौरभ से बातें करने लगे. रात का खाना सब लोगों ने साथ बैठकर आनंद से हंसते-खेलते खाया.
रात जब सुरभि घर जाने लगी, तो धीरे से सुभाष के सीने पर सिर रखकर बोली, “थैंक्स पापा, आपने जो जीवनमंत्र मुझे दिया है, उसे मैं हमेशा याद रखूंगी. अब मैं कभी भी अपने रिश्तों में गांठ नहीं पड़ने दूंगी.”
सुभाष ने उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं, अब उनकी बेटी समय रहते ही उलझने-सुलझाने का महत्व समझ गई थी.

डॉ. विनीता राहुरीकर

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

Photo Courtesy: Freepik


डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट

×