कहानी- हृदय परिवर्तन (Short Stor...

कहानी- हृदय परिवर्तन (Short Story- Hriday Parivartan)

“हर मां चाहती है कि उसकी संतान हमेशा ख़ुशहाल रहें. अंकित की उम्र तीस हो गई है. इस उम्र में तो हमारे बच्चे स्कूल जाने लगे थे. और अभी तक अंकित की शादी भी नहीं… इसी बात की चिंता खाए जा रही है मुझे. आख़िर, एक मां जो हूं मैं.” विमला ने गहरी सांस लेते हुए अपनी बात ख़त्म की.
“तुम्हारे लाडले को कोई लड़की पसंद आए, तब तो बात आगे बढ़े. न जाने किस हुस्न परी के ख़्वाब में है वह?..”

“अच्छा मां, मैं चलता हूं ऑफिस को लेट हो रहा है. शाम को थोड़ा लेट आऊंगा. आप और पापा टाइम से डिनर कर लेना.” अंकित ने ऑफिस का बैग हाथ में पकड़ते हुए कहा.
“ठीक है बेटा, घर आते समय कुछ सामान भी लेते आना. सामान के लिस्ट की पर्ची तुम्हारे बैग में रख दी है.”
“ओके मां, बाय! लव यू…”
“अब आप भी चाय-नाश्ता कर लीजिए.” विमला ने चाय-नाश्ता टेबल पर रखते हुए कहा.
“चुनाव का समय आ गया और सभी टीवी चैनल बस जाति-धर्म के आधार पर वोटों की संख्या बताने में लगे पड़े है. जबकि हमें जाति और धर्म से ऊपर उठकर योग्य उम्मीदवार का चयन करना चाहिए देश के विकास के लिए.” चाय के चुस्की के साथ टीवी चैनल बदलते हुए राजेश बड़बड़ा रहे थे.
“आप भी सुबह-सुबह कौन-सी बात लेकर शुरू हो गए. ऐसा लगता है पूरे देश की फ़िक्र आपको ही है और सबसे बड़े नेता आप ही हो!”
“नेता नहीं, एक ज़िम्मेदार नागरिक ज़रूर हूं. अच्छा, छोड़ों इन बातों को, तुम्हे नाश्ता नहीं करना क्या? जो ऐसे बैठी हो.”
“नहीं, आज मेरा मन नहीं है नाश्ता करने का.”
“क्या हुआ मन को, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?”
“हां, तबीयत तो ठीक है, बस थोड़ी-सी चिंता खाए जा रही है.”
“किस बात की चिंता, विमला!” चाय का प्याला रखते हुए राजेश ने कहा.
“कुछ नहीं, बस थोड़ा अंकित को लेकर…”
“क्यों, अब क्या किया तुम्हारे लाडले ने?” राजेश ने भौंहें तानते हुए पूछा.
“कुछ नहीं किया उसने. आप बस कमियां ढूंढ़ों उसमें.”
“कुछ नहीं किया, तो फिर किस बात की चिंता खाए जा रही है तुम्हे?”

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“हर मां चाहती है कि उसकी संतान हमेशा ख़ुशहाल रहें. अंकित की उम्र तीस हो गई है. इस उम्र में तो हमारे बच्चे स्कूल जाने लगे थे. और अभी तक अंकित की शादी भी नहीं… इसी बात की चिंता खाए जा रही है मुझे. आख़िर, एक मां जो हूं मैं.” विमला ने गहरी सांस लेते हुए अपनी बात ख़त्म की.
“तुम्हारे लाडले को कोई लड़की पसंद आए, तब तो बात आगे बढ़े. न जाने किस हुस्न परी के ख़्वाब में है वह? पिछले हफ़्ते ही गाजीपुरवाले मामा ने किसी लड़की की फोटो व बायोडाटा भेजा था. पर उसने तो साफ़ मना कर दिया. न जाने क्या समझता है ख़ुद को.” राजेश ने ऊंची आवाज़ में अपनी बात को ख़त्म किया.
“जानती हूं, एक पत्नी के नाते आपको भी और एक मां के नाते अंकित को भी. आपको भी पता है कि वह रिया को पसंद करता है.”
“कौन रिया?” राजेश ने टीवी की आवाज़ कम करते हुए पूछा.
“अरे वही रिया, जो अपने तीसरी गली में रहती है. अंकित के साथ पढ़ती थी. रिया भी अंकित को पसंद करती है. दोनों प्यार करते हैं एक-दूसरे से.” विमला ने कहा.
“कहीं तुम, गुप्ताजी के बेटी रिया की बात तो नहीं कर रहीं हो.”
“हां, मैं गुप्ता भाईसाहब की छोटी बेटी रिया की बात कर रहीं हूं, जिसने पिछले साल ही अपनी एमफिल की पढ़ाई ख़त्म की और सुंदरता के साथ-साथ समझदारी भी है उसमें. एक लाइन में कहें, तो रूपवान के साथ-साथ गुणवान भी है रिया.” विमला ने कहा.
“विमला, तुम्हे पता है, क्या कह रही हो तुम? वह हमारी बिरादरी में नहीं आती है. क्या कहेंगे समाज में चार लोग हमें. इसकी ज़रा भी समझ है तुम में?” राजेश ने कहा.
“क्या कहेंगे का क्या मतलब? थोड़ी देर पहले आप एक ज़िम्मेदार नागरिक के नाते कह रहे थे कि देश के विकास के लिए जाति-धर्म से ऊपर उठकर योग्य उम्मीदवार का चयन करना चाहिए. ठीक उसी तरह हमें लोगों की परवाह छोड़ एक ज़िम्मेदार माता-पिता होने के नाते अंकित की ख़ुशी के लिए उसकी पसंद रिया का चयन अपनी बहू के रूप में कर लेना चाहिए. जो शिक्षित होने के साथ-साथ रूपवान और गुणवान भी है.” विमला अपनी बात ख़त्म करते हुए चाय का कप लेकर किचन की ओर चल पड़ी.


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थोड़ी देर बाद राजेश भी किचन में पहुंचते हैं और विमला के कंधे पर हाथ रखते हुए कहते हैं, “तुम्हारी बातों ने तो आज मेरे हृदय को परिवर्तित कर दिया. जब ईश्वर ने हम सभी को एक ही रंग का खून दिया, तो फिर हम ईश्वर के बनाएं अनमोल इंसान को अलग-अलग जाति-धर्मों का रंग क्यों दें? कल ही मैं जाति-धर्म की परवाह किए बिना अंकित और रिया के रिश्ते की बात गुप्ताजी से करूंगा.”

– अंकुर सिंह

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Photo Courtesy: Freepik

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