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कहानी- आइरिस के फूल (Short Story- Iris Ke Phool)

कुछ देर बाद जब मैं चलने लगा, तो उसने हमेशा की तरह मुझे एक फूल दिया. मैंने पूछा, “हमेशा यही फूल देती हो… बड़े अजीब से हैं, वैसे ये किसके फूल हैं?”
वह मुस्कुराते हुए बोली थी, “आइरिस के.”
“अच्छा बताओ हमेशा यही फूल क्यों देती हो?”
“हर फूल के अपने अर्थ होेते हैं… वे कुछ कहते हैं…”
“अच्छा! मुझे भी तो बताओ क्या कहते हैं आइरिस के फूल.”
वह कुछ जवाब देती इससे पहले फिर से पुकार हुई थी, “मीनू… ओ मीनू…”
“बाद में.” कहते हुए वह अंदर भाग गई.

समय के साथ-साथ इंसान की प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं.. पता नहीं क्यों और कैसे? पर बदलते हैं. क्या केवल इसलिए कि कुछ और नहीं इंसान हैं हम?
रात के 11 बज चुके हैं, मीनू अपने नन्हें-नन्हें सिपाहियों के साथ गहरी नींद में है, लेकिन मैं जाग रहा हूं. आत्ममंथन में लगा हूं. यादें…कितनी ही यादें. एक छोटा-सा कस्बा, मैं, मीनू, उसका छोटा-सा गार्डन…
एक छोटे कस्बे के सरकारी स्कूल से हायर सेकेंडरी पास करने के बाद जब मैंने समीपस्थ शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष में दाख़िला लिया था, तब तो मीनू ही मेरे मानस पटल पर छाई थी.
मीनू, मुुझसे दो वर्ष छोटी, शालीन, सभ्य और सुसंस्कृत परिवार की इकलौती संतान. ये वो दिन थे जब उसकी एक झलक पाने के लिए मैं बेचैन रहता था. बावजूद इसके कि हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे.
अंग्रेज़ी मीडियम की पढ़ाई थी, मैं संकोची स्वभाव का था. क्लास की सबसे पीछेवाली सीट मेरी हुआ करती थी. लेक्चर समझ में न आता, ठीक से नोट्स भी नहीं बना पाता था. पढ़ाई मुश्किल लगने लगी थी. शहर में मन न लगता, तो अक्सर भाग कर अपने कस्बे पहुंच जाता.
घर में कुछ देर रुकने के बाद अनयास ही मेरे कदम उसके घर की तरफ़ चल पड़ते. हर बार दस्तक देने के पहले ही दरवाज़ा खुल जाता. एक ख़ूबसूरत और लुभावने चेहरेवाली मुस्कुरा कर मेरा स्वागत कर रही होती. एक ऐसा ही पल था जब मैंने उससे पूछ लिया था, “तुम्हें मेरे आने का पूर्वाभास होता है क्या या फिर कोई जादू जानती हो?”
तब वह खिलखिलाकर हंस पड़ी थी, “आपको पता होना चाहिए कि मेरे कमरे में एक छोटी-सी खिड़की भी है.”
“अच्छा!” मैं कुछ शरारती लहजे में बोला था, “तो तुम्हें मेरे आने का इंतज़ार रहता है.”
वह शोख हंसी एक मासूम मुस्कुराहट में बदल गई थी. उसके गुलाबी होंठ कुछ कांपे थे. झुकी हुई नज़रों से उसने संजीदगी किन्तु दृढ़ता से कहा था, “शायद.”
अनिश्‍चयवाची इस शब्द में न जाने कितने निश्‍चय छुपे थे. मैं उसके लजराते कपोलों को हौले से छू पाता कि पुकार हुई थी, “मीनू… कौन है?”
जवाब देने से पहले ही उसकी मां प्रकट हुई थी, “अरे अभिसार तुम! अंदर आओ न…”
घर के पीछे मीनू का छोटा-सा गार्डन था. मैं वहीं बैठ गया. हमेशा की तरह उसने मुझसे ढेर सारे सवाल किए थे.
“पढ़ाई कैसी चल रही है? शहर में मन लगता है कि नहीं? खाना पका के बनने लगा?
मैं उकता जाता था. दिल तो चाहता कि वह पूछे “मेरी याद आती है?” और मैं कहूं, “बहुत आती है.”
वह पूछे, “तुम्हें मुझसे प्यार है?”
“हां है.”
“कितना?”
तब मैं दोनों बांहें फैलाकर कहूं, “इतना…”
सोचा चलो मैं ही शुरुआत करता हूूं, लेकिन मेरे कुछ कहने से पहले आंटीजी मेरे लिए चाय लेकर हाज़िर थीं.
कुछ देर बाद जब मैं चलने लगा, तो उसने हमेशा की तरह मुझे एक फूल दिया. मैंने पूछा, “हमेशा यही फूल देती हो… बड़े अजीब से हैं, वैसे ये किसके फूल हैं?”
वह मुस्कुराते हुए बोली थी, “आइरिस के.”


“अच्छा बताओ हमेशा यही फूल क्यों देती हो?”
“हर फूल के अपने अर्थ होेते हैं… वे कुछ कहते हैं…”
“अच्छा! मुझे भी तो बताओ क्या कहते हैं आइरिस के फूल.”
वह कुछ जवाब देती इससे पहले फिर से पुकार हुई थी, “मीनू… ओ मीनू…”
“बाद में.” कहते हुए वह अंदर भाग गई.
बात अधूरी रह गई. फिर मौ़के तो कई मिले, लेकिन मुझे ही याद न रहा कि कभी उससे पूछता, “कहो तो मीनू क्या कहते हैं आइरिस के फूल?”
लगाातर दो मासिक परीक्षा में मैं फेल हो गया. दो ही रास्ते थे, वापस लौट जाऊं या फिर अपनी अंग्रेज़ी सुधार लूं. दुविधा की इस स्थित में लवी ने साथ दिया था. क्लास की सबसे तेज-तर्रार और आधुनिक लड़की. हमेशा जींस और टी-शर्ट पहननेवाली. उसने मुझे प्रेरित किया. कई सुझाव दिए.
“हमेशा आगे की सीट में बैठो. इंग्लिश में बोलो. उसे यूज़ में लाओ. लेक्चर समझ में न आए, तो क्रॉस क्यूश्‍चन करो और हां शर्माना छोड़ो, हमसे दोस्ती कर लो.”
हमसे तात्पर्य भले ही उसकी दृष्टिकोण में
क्लासमेंट रहा हो, लेकिन मैंने तो ‘लवी’ ही समझा था. मैंने उससे दोस्ती कर ली. उसे अपना आदर्श मान लिया. टूटे-फूटे लफ़्ज़ों में किए गए क्रॉस क्यूश्‍चन से क्लास में जोरदार ठहाका गूंजता. मैं कुछ पल के लिए झेंप भी जाता, लेकिन जब उसकी तरफ़ देखता, तो वह मुझे वेलडन का इशारा कर रही होती और उसके होंठ इस तरह से हिलते जैसे कह रही हो- “गो आन…”
इन दो लफ़्ज़ों ने मेरे जीवन में क्रांति ला दी. मैं जी जान से जुट गया. वार्षिक परीक्षा में मेरा नाम अंडर टॉप टेन था. यहां तक की अब मैं मीनू से भी अंग्रेज़ी में ही बातें करने की कोशिश करता. तब वह हंसते हुए कहती, “आप तो अंग्रेज़ी बाबू बन गए हैं.”
उसने ग़लत नहीं कहा था. मैं शहरी चाल-चलन में ढल रहा था. शहरी सभ्यता और संस्कृति मेरे नस-नस में समाती जा रही थी. और धीरे-धीरे मेरी प्राथमिकताएं भी बदलती गईं. ऐसा भी नहीं कि मैं अनजान था. कभी-कभी मैं सोचता भी था कि अब मीनू के बारे में इतना क्यों नहीं सोचता हूूं जितना की लवी के बारे में. अब उससे मिलने की तीव्र इच्छा क्यों नहीं जन्म लेती जितना की लवी से.
दिल पूछता- मीनू से क्या कहेगा?
उसे समझा दूंगा कि तुम मेरी दोस्त हो और कुछ नहीं. वैसे भी न तो उसने कभी एक-दूसरे से अपने प्यार का इज़हार किया था. कोई वादा नहीं स़िर्फ कुछ ख़ामोश लम्हे थे, जो हमारी मुहब्बत के गवाह थे. लेकिन वे ठहरे ख़ामोश लम्हे, भला उनकी बिसात क्या? वे क्या गवाही देंगे?

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मैं आज़ाद था और मानसिक तौर पर मीनू से झूठ और लवी से सच कहने के लिए अपने आपको तैयार कर रहा था.
कह ही देता यदि एक दिन लवी ने मुझसे दार्शनिक अंदाज़ में न पूछा होता, “अभि.” वह मुझे इसी नाम से पुकारती थी.
“राधा-कृष्ण, लैला-मजनू, सोनी-महिवाल… इनके प्यार आज तक लोगों की ज़ुबां पर है, इनकी मिसाल दी जाती है, बता सकते हो क्यों?”
मैंने सर्वश्रेष्ठ उत्तर देने की कोशिश की थी.
“वह इसलिए कि वे सभी अपनी मुहब्बत पाने के लिए मर मिटे हैं न?”
वह कुछ सोचते हुए बोली थी, “चलो औरों के लिए तो मान लिया, लेकिन राधा-कृष्ण के लिए? वे तो नहीं मर मिटे?”
उस सवालिया निगाह का मेरे पास कोई जवाब नहीं था.
वही बोली थी, “इसलिए कि उन्होंने एक-दूसरे से शादी नहीं की थी. शादी की चक्की में प्यार पिस के रह जाता है… इसलिए जिससे प्यार करो उससे शादी कभी न करो…”
अब… अब कैसे कहता, “लवी, आई लव यू?”
फाइनल ईयर का रिजल्ट आने के बाद वह अदृश्य हो गई. बाद में पता चला कि उसने एम.बी.ए. करने के लिए दूसरे बड़े शहर के एक
नामी गिरामी कॉलेज में दाख़िला ले लिया है. चाहत थी उसका पीछा करूं उसकी विचारधारा को बदल दूं, लेकिन पिताजी की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं थी. उन्होंने आशा बांध ली थी कि अब मैं सर्विस कर लूंगा.
पहले ही प्रयास में एक राष्ट्रीय स्तर की कंपनी में जॉब मिल गई. कुछ दिनों बाद ही हमारे घरवालों ने हमारे विवाह की ठान ली. आश्‍चर्य हुआ था. ज़रूर मीनू ने अपनी मां से अपने दिल की बात कही होगी, पर बाद में पता चला कि कुछ ऐसा भी तो नहीं हुआ था.
मैं शहर में रहता और वह कस्बे में मेरेे माता-पिता के साथ. कभी-कभी कई दिनों तक जाना न हो पाता, लेकिन उसने कभी मुझसे कोई शिकायत नहीं की. उसने आदर्श गृहिणी के फर्ज़ बख़ूूबी निभाए. मुझे दो प्यारे-प्यारे से बच्चे दिए. अभिषेक और अदिति. जब अभिषेक चार साल का हो गया, तो मुझे उसकी पढ़ाई की चिंता हुई थी. मैं नहीं चाहता कि जो परेशानी मैंने उठाई है वह भी उठाए. मैं उसे शहर की अच्छी से अच्छी स्कूल में पढ़ाना चाहता था. लिहाज़ा शहर में ख़ुद का मकान बनवाया और तब मीनू ने उसमें एक छोटे ये गार्डन की फ़रमाइश की थी.
इस बीच मेरे दो प्रमोशन हो चुके थेे. मैं एक अच्छी रैंक में था. अधिकांशतः मित्र और ऑफिस सहकर्मी ‘यू नो’ में वह सहज महसूस नहीं करती या यूं कहूं कि उसे लेकर मैं ख़ुद को कर्म्फटेबल महसूस नहीं कर पाता था, तो यह ग़लत नहीं होगा. अक्सर सोचता… लवी होती तो?
तुलना तो मैंने पहले भी की थी. अपने तस्व्वुर की उस परछाई की मीनू से तुलना. कई बातोंे की तुलना, और हर बार उस परछाई को मीनू से बीस ही माना था. यह बात और है कि मैं मीनू को 19 अंक भी नहीं दे पाया था?
मैं अपनी खीज उस पर उतारने लगा था, “क्या मीनू कुछ तो इम्प्रूव करो… वही रही गवई की गवई…”

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वह समझने लगी थी कि मैं उससे क्या कहना चाहता हूं, “गवई नहीं गवांर कहिए न, लेकिन देखिएगा इन दोनों को इतना पढ़ाऊंगी कि ये आपसे भी तेज और फर्राटेदार अंग्रज़ी बोलेंगे.” उसके स्वर में पीड़ा थी, आंखें डबडबा आई थीं. मैंने देखा उसके पीछे खड़े उसके दोनों नन्हें सिपाही मुझे बराबर घूरे जा रहे थे. पता नहीं क्या था उन नज़रों में, मैं उनसे नज़रें नहीं मिला पाया था.
कुछ दिनों बाद ही पता चला कि जिस कंपनी में मैं कार्यरत हूं उसी कंपनी में लवी भी है और जल्द ही प्रमोट हो कर मेरे शहर आनेवाली है. मेरा मन उससे मिलने के लिए उससे बातें करने के लिए और उसे एक बार देखने के लिए फिर से बेताब हो उठा. यह दिन भी आया जब वह मेरे सामने थी.
आठ वर्ष बाद उससे मुलाक़ात हुई थी. वही स्टाइल वही पहनावा. मुझे देखते वह चौंक पड़ी थी, “अभि तुम, व्हाट अ सरप्राइज़ यार.”
“जी मैडम…” वह मेरी बॉस बनकर आई थी, इसलिए यही संबोधिन उचित था.
“मैं मैडम!” उसने ‘मैं’ शब्द को देर तक खींचा था.
“माई गॉड… आई लवी… यू आर माई फ्रैंड… प्लीज़ कॉल मी ओनली लवी.”
मैं तो यही चाहता था. बिन मांगे मुराद पूरी हुई थी. कभी-कभी उसके साथ टूर पर भी जाना होता. ये टूर मेरे लिए अनमोल और हसीन लम्हें लेकर आते.
एक ऐसा ही टूर था, जब हमने खुलकर बातें कीं. शुरुआत उसने ही की, “अरे, हां अभि… तुमने शादी की?”
मैं दबी ज़ुुबान में कहा था, “हां.”
“अरे वाह… कशादी कर ली और मुझे बुलाया तक नहीं…” चहकते स्वर में उलाहना के भाव थे.
“तुम्हारा पता कहां था… रिजल्ट के बाद ऐसे गोल हुई थी कि…”
“हां… वो तो है… बट दिस इज़ बैड न्यूज़ फॉर मी…” उसने कुछ क्षुब्द स्वर में कहा था.
“बैड न्यूज़ मतलब..?” मैंने पूछा था.
“अरे बुद्धू…” वह हंसते हुए बोली थी, “न की होती, तो मैं ट्राई करती न…”
सच कहूं दिल धक से रह गया था. नहीं समझ पाया कि वह मज़ाक में कह रही है या कुछ संजीदा भी है.
उसने पूछा, “अपनी बीवी से मिलवाओगे न?”
मैं भी हंसते हुए कहा, “क्यों नहीं, अपने दोनों बच्चों से भी मिलवाऊंगा…”
“ओह! क्या मेरी लेने का इरादा है… इतने सरप्राइज़ एक साथ.”
छुट्टी के दिन वह पहुंची थी. मैं घर पर नहीं था. लौट कर आया, तो उसे मीनू के साथ इस तरह देखा जैसे वे दोनों एक-दूसरे को कई दिनों से क्या कई वर्षों से जानती हैं. बच्चों के लिए ढेर सारे गिफ्ट्स.
मैं आश्‍चर्यचकित था. मज़ाकिया लहज़े में पहल मीनू ने की थी. मेरी तरफ इशारा करते हुए उसने लवी से कहा, “ये मेरे पति हैं मिस्टर अभिसार…”
लवी ने भी भरपूर सहयोग दिया था, “ओह! नाइस टू मीट यू… आप चाय लेंगे?”
मीनू ने अपना प्याला मेरे तरफ़ बढ़ा दिया था.
“और तुम..?” मैंने उसकी तरफ़ सवालिया निगाह दौड़ाई थी. वह कुछ बोलती इससे पहले ही लवी ने कहा था, “हम शेयर कर लेंगे.”
मैंने सोचा था- काश तुम दोनों मुझे भी…
दोपहर हो रही थी. दोनों ने मिलकर लंच बनाया. आश्‍चर्य हुआ था कि लवी जैसे मॉर्डन लड़की को किचन के सारे काम आते हैं.
लंच के बाद उसने कहा, “तुम दोंनो की हैप्पी मैरिज लाइफ देखकर मुझे भी लगता है कि मैं भी शादी कर लूं.”
“अच्छा, पहले क्यों नहीं की?” मैंने पूछा.
“हूं… सच कह रहे हो… लेकिन क्या करूं, जो देखा… महसूस किया…” वह ख़ामोश हो गई थी. स्वर का भीगापन कह रहा था कि कुछ दर्दनाक घटना है इसके साथ.
मीनू ने हमदर्दी से पूछा था, “क्या बात है? मुझसे भी नहीं कहेंगी?”
“नहीं कुछ ख़ास नहीं मीनू…” वह बोली थी.
“बस एक छोटी-सी कहानी है मेरे मम्मी-पापा की… मैं दस वर्ष की थी, तब उन दोंनों का तलाक़ हो गया था…”
“ओह…” मैंने दुख प्रकट करते हुए कहा था.
कुछ देर बाद उसने कहा था, “जानते हो अभि, कितने आश्‍चर्य की बात की कभी दोंनों ने लव मैरिज की थी… समाज से लड़कर… अपने पैरेंट्स से बगावत कर…”
“क्या? ऐसा भी होता है…” मीनू चौंक पड़ी थी.
“हां मीनू, सच कह रही हूं. मेरी मां एक कस्बाई लड़की थी. उसी माहौल में पली-बढ़ी. मॉर्डन तौर-तरी़के से काफ़ी दूर. पापा एक रईस बाप के लड़के थे. उसी कस्बे में एक फैक्ट्री बनवा रहे थे. दोनों की मुलाक़ात हुई, प्यार हुआ, शादी हुई… मैं हुई…
और फिर धीरे-धीरे पापा को एहसास होने लगा कि मेरी मां उनकी सोसायटी के अनुरुप नहीं है. लड़ाई-झगड़ा होने लगा. कुछ दिनों बाद तलाक़ हो गया. लड़की का ससुराल छूटा, तो मायका अपने आप छूट जाता है. मां कहां जातीं… उसने इसे अपना भाग्य समझ वैराग्य धारण कर लिया. उन्होंने मेरी भी मांग नहीं की. साल भर बाद ही पापा ने दूसरी शादी कर ली. मुझे पढ़ने के लिए हॉस्टल भेज दिया गया. यह सब मैंने देखा… महसूस किया… और मेरी धारणा बन गई… यह प्यार-व्यार कुछ नहीं होता… और होता भी है. तो कम से कम इस लायक नहीं कि उसे शादी की कसौटी में…”
कहानी लवी के मम्मी-पापा की है, लेकिन
महसूस हुआ जैसे कोई मुझे आईना दिखा रहा है, “देखो अभिसार ये तुम हो… हां तुम…”
वह कह रही थी, “लेकिन सच कहूं जब से तुम दोनों को देखा है और यह जाना है कि शादी से पहले ही तुम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते आ रहे हो… तो मेरी धारणा बदल गई…”
मैं चौंक पड़ा था. जिस सच को हम दोनों ने कभी एक-दूसरे से नहीं कहा, वही सच किस विश्‍वास के साथ मीनू ने लवी से कह दिया था?
एक-दूसरे से मिलते रहने का वादा लेकर लवी और मीनू एक-दूसरे से जुदा हुईं. उपस्थित रहने के बावजूद लगा जैसे मैं कहीं नहीं हूं.
मैं उसके साथ उसकी कार तक आया था. कार स्टार्ट करने से पहले उसने कहा, “थैक्यू अभि, तुम मेरे पापा की तरह नहीं हो…”
वह आगे कुछ नहीं कह पाई थी. उस दिन समझ में आया था कि वर्षों पहले उसने पलायन के लिए तैयार एक लड़के की मदद क्यों की होगी.
मीनू गहरी नींद में है. कितनी निश्‍चिंत. अनायास ही मेरी नज़र अभिषेक और अदिति पर गई. काफी देर तक उन्हें अपलक देखता रहा. कितने मासूम. कभी लवीभी ऐसी ही रही होगी. अपने माता-पिता के साथ निश्‍चिंत… फिर एक दिन…
वैयक्तिव से अधिक विवाह का सामाजिक एवं पारिवारिक महत्व होता है. भावनात्मक अवस्थाओं का प्रभाव पीढ़ियों तक रहता है. टूटने का दर्द लवी जानती है और वह नहीं चाहती कि वह दर्द कोई और उठाए. तभी तो उसने मुझे थैंक्स कहा था. तो क्या वह इंसानी फ़ितरत है? जो हमारे पास है उसकी हम कद्र नहीं करते. जो नहीं है उस पाने के लिए ज़िंदगीभर उसके पीछे भागते हैं. कौन जाने वह प्राप्य हमें और कितने दिनों तक लुभाए रख सकें? फिर ऐसी फ़ितरत क्यों?
उफ़्फ़… कैसा बर्ताव है यह? कभी जिसने प्यार करने के दावे किए, जिसे मनमंदिर में बसाया, हमराही बनाया, उसे ही ज़िंदगी के किसी मोड़ पर यह एहसास दिलाना तुम हमारे काबिल नहीं, हमसे भूल हुई, अब हमें माफ़ करो… और उसे तन्हा छोड़ आगे बढ़ जाना…
उदाहरण स्वयं का लेता हूं. विरक्ति के न सही, किन्तु उपेक्षा के अंकुर तो फूटने ही लगे थे और क्या पता किस दिन यह विरक्ति का विशाल वृक्ष बन जाता. उत्तेजना और भावनाओं के क्षणिक प्रवाह में बह कर किसी के साथ जिस्मानी संबंध स्थापित कर लेना एक भूल है, शायद इसलिए क्षम्य भी है. लेकिन अपने साथी को आहिस्ता-आहिस्ता अपने दिलोदिमाग़ से, अपनी ज़िंदगी से खारिज करते चले जाना?यह तो सज्ञान में किया गया ज़ुर्म है.
ओह मीनू… तुम्हें ज़रुरत क्या है इन नन्हें सिपाहियों की. तुम आगे बढ़ो, मैं तुम्हारे साथ हूं. यदि लवी एक क्लासमेट की मदद कर सकती है, तो क्या मैं अपने हमकदम और हमराही की मदद नहीं कर सकता.
आत्ममंथन ने मुझे थका-सा दिया. मन बहलाने के लिए एक मैग्जीन उठा ली. फूलों का मौसम पूरी मैग्जीन में इन्हीं की बातें. एक टाइटल में मेरी नज़र रुक-सी गई, “हर फूल कुछ कहता है.” उत्सुकता से मैं पढ़ने लगा था.
गुलाब- प्यार, जुनून और परिपूर्णता का प्रतीक
सूरजमुखी- आराधना का प्रतीक
मुझे याद आया था, हां… कुछ ऐसा ही तो मीनू भी कहा करती थी…
तो क्या कहते हैं आइरिस के फूल? मैं खोजने लगा था. आइरिस के फूल- मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं.. तुम्हारी मित्रता बहुत मायने रखती है.. और… मुझे तुम पर विश्‍वास है…
ओह मीनू! शुभकामनाएं, मित्रता, विश्‍वास… ओह… मैं क्या करने जा रहा था? कभी-कभी समय का एक छोटा-सा टुकड़ा हमें एहसास करा देता है कि हम कितने ग़लत हैं, वरना कौन जाने इसके लिए एक उम्र भी कम पड़ जाए.
एक विश्‍वास ही तो है, जो कच्चे धागे की डोर को मज़बूती से बांधे रखता है. टूटे तो? लेकिन टूटना कब और किसके लिए हितकर हुआ है?
पहली बार सुबह मीनू के उठने से पहले मैं उठा था. पहली बार मैंने भी उसे आइरिस के फूल दिए. एक नहीं.. दो नहीं.. कई फूल उसके दामन में डाल दिए.
उसने प्रफुल्लित मन से किन्तु आश्‍चर्य जताते हुए पूछा था, "ये सब मेरे लिए?.."
मैं इतना ही कह पाया था, “शायद…”
एक बार फिर… इस अनिश्‍चयवाची शब्द में न जाने कितने निश्‍चय छुपे हैं.

- शैलेंद्र सिंह परिहार

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Photo Courtesy: Freepik

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