लघुकथा- इसलिए कि वह बेटा हेै… (S...

लघुकथा- इसलिए कि वह बेटा हेै… (Short Story- Isliye Ki Woh Beta Hai…)

एक तरफ़ अनु आटा गूंथ रही थी, तो दूसरी तरफ़ उसकी आंखों से झर-झर आंसू टपक रहे थे. मुझे उसका दुख देखा नहीं जा रहा था. वह बीच-बीच में मुझे कातर नज़रों से देखती रहती. शायद हमेशा कि तरह आज भी मैं उसे बचा लूं और कहूं छोड़ो मैं ही आटा गूंथ देता हूं…

‘‘बहुत हो गया. अब आप बोलेगें नहीं.’’ पत्नी के सब्र का बांध टूट गया.
‘‘अनु को आज आटा गूंथना ही होगा.‘‘ वह आगे कही. मुझे लगा आज पंगा लिया, तो महाभारत हो जाएगा. इसके पहले कई अवसरों पर मैंने पत्नी से अपनी बेटी अनु को बचा लिया था. अनु का ग्रेजुएशन पूरा होने तक जब भी मेरी पत्नी अनु पर घरेलू काम करने का दबाव बनाती, तो मैं किसी न किसी बहाने टाल जाता. अनु को चाय तक बनाने नहीं आता था. पत्नी उलाहना देती, तो मैं यह कहकर उसे समझा लेता कि समय आएगा तो सब सीख जाएगी.
“कब समय आएगा?” पत्नी उखडी.
‘‘अब भी नहीं सिखेगी तो कब सीखेगी. आप ने उसे शह देकर बिगाड दिया है. कल को शादी होगी. कैसेे ससुराल में घर-गृहस्थी संभालेगी? कहेंगे क्या सिखा-पढ़ाकर मां ने भेजा है?”
‘‘कहेंगे कि बेटी ने भी उतनी ही मेहनत की हेै पढ़ाई में जितना बेटा. फिर उस पर दोहरा दबाव क्यों?’’ मैंने कहा.


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‘‘लड़की है तो उसे खाना बनाना सीखना ही होगा?’’ पत्नी बोली.
‘‘लड़के को क्यों नहीं और अगर वह भी उतना ही कमाए , जितना उसका पति तब भी?’’ मेरे सवाल पर उससे कुछ कहते न बना.
‘‘मैं कुछ नहीं जानती. आप मेरे बीच में न पड़े. लड़की कलक्टर भी बन जाए, तो भी घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी उसी पर ही होती है. लड़की के लिए यही शोभा देता है?‘‘ पत्नी बोली.
वह पढ़ने में तेज थी. लिहाज़ा मैंने बेटा-बेटी के प्रति व्यवहार में कोई फर्क़ नहीं किया. वह पढ़ती, तो शेष घरेलू काम मैं कर देता, जैसे- सब्ज़ी काटना आदि. इस तरह से अनु काम से बच जाती. ऐसे बचते हुए अब वह ग्रेजुएशन तक पहुंच गई. लॉकडाउन चल रहा था. ऑनलाइन पढ़ाई चल रही थी. इस दरमियान पत्नी ने मन बना लिया था कि अनु को कुछ न कुछ घर-गृहस्थी का काम सिखाएगी, ताकि ससुराल में तकलीफ़ न हो. ससुरालवाले भी दोहरे मापदंड वाले होते हैं. एक तरफ़ कहेंगे अच्छे नंबरों से पास लड़की से शादी करेंगे, दूसरी तरफ़ उसे रोटी भी पकाना आना चाहिए.
एक तरफ़ अनु आटा गूंथ रही थी, तो दूसरी तरफ़ उसकी आंखों से झर-झर आंसू टपक रहे थे. मुझे उसका दुख देखा नहीं जा रहा था. वह बीच-बीच में मुझे कातर नज़रों से देखती रहती. शायद हमेशा कि तरह आज भी मैं उसे बचा लूं और कहूं छोड़ो मैं ही आटा गूंथ देता हूं…
पत्नी अपने वचन पर अडिग थी, वहीं बेटी के आंसू दिल में नश्तर की तरह चुभ रहे थे. मेरा कलेजा फटा जा रहा था. अनु को लगा कि आज बच पाना मुश्किल हेै, तो फट पड़ी, ‘‘सार्थक से नहीं कहोगी कि वह भी आटा गुंथना सीखे, इसलिए कि वह बेटा है?’’ पत्नी के पास इसका कोई जवाब नहीं था.


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कभी उसने भी ऐसे ही सवाल अपनी मां से किए थे. न तब उसे जवाब मिला, न ही आज वह दे पाने में समर्थ थ. इसका मतलब यह नहीं था कि पत्नी के दिल में अपनी बेटी के लिए प्रेम नहीं था, पर क्या करे… वह पुरुषोचित्त समाज के आगे विवश थी.

– श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

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