कहानी- इस्तेमाल (Short Stor...

कहानी- इस्तेमाल (Short Story- Istemaal)

Hindi Short Story

मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.

रोज़ की तरह वे सुबह जल्दी उठ गए. पुलिस विभाग की नौकरी ने जल्दी उठने की जो आदत डाल दी है, वह सेवानिवृत्ति के बाद भी कायम है. मधु मालती की छतनार बेल पर रातभर सोई समूहभर चिड़िया, चहकते हुए मानो प्रभाती गा रही थीं. वे चिड़ियों के चहकने पर तब ध्यान नहीं देते थे. पुलिस विभाग की नौकरी और दौरे की व्यस्तता में न ठीक से खा पाते थे, न नींदभर सो पाते थे. चिड़ियों के चहकने जैसे छोटे-छोटे उपक्रमों पर ध्यान देने का अवकाश उन्हें कभी नहीं मिला. इन दिनों उनका चहकना सुना करते थे. सोचते थे, किस कार्य प्रयोजन के लिए चिड़िया इतना चहकती हैं? अपने अस्तित्व के लिए, अधिकार के लिए, आवश्यकता के लिए, आज़ादी के लिए या यूं ही. वे अपने आप में मुस्कुरा दिए.

पक्षी जगत के बारे में इतना क्यों जानना-सोचना चाहते थे? जब से उनके कमरे के रोशनदान में चिड़िया के एक जोड़े ने घोंसला बनाया था, वे चिड़िया के प्रति काफ़ी संवेदनशील हो गए थे. चिड़िया उन्हें आकर्षित करती थी. उन्हें कोई कल्पना नहीं थी कि आंत के बड़े ऑपरेशन के कारण बिस्तर पर समय बिताएंगे और गौरैया समय बिताने का साधन बनेगी. कार्यकाल में सोचा करते थे सेवानिवृत्ति के बाद ख़ूब खाएंगे, ख़ूब सोएंगे और इत्मीनान से रहेंगे. अब जब बिस्तर पर शिथिल पड़े थे, लग रहा था बिना किसी कार्य और व्यस्तता के बिस्तर पर समय बिताना बहुत बड़ी सज़ा है. अस्पताल से घर आए, तब कुछ दिन परिचित-नातेदार देखने आते थे. अब नहीं आते. एक ही ग्रामीण बैंक में कार्यरत पुत्र अमृत और पुत्रवधू वृंदा ने उनकी सेवा के लिए काफ़ी छुट्टी ली, लेकिन अब नौकरी पर जाना ज़रूरी था. पोता जोश स्कूल और गृहकार्य में लगा रहता था. पत्नी गृहस्थी के बिखराव को समेटती रहती थी. अब वे थे, सेवानिवृत्ति थे, बीमारी, बिस्तर, परहेज़ी खाना, दवाइयां और खाली समय था. और सहसा उनका ध्यान घोंसले की ओर गया. पत्नी उनके कमरे की सफ़ाई करते हुए ग़ुस्सा हो रही थी, “चिड़िया रोशनदान में घोंसला बना रही है. कचरा फैला रही है, जबकि मरीज़ का कमरा साफ़ रहना चाहिए.”

उन्होंने निर्मित हो रहे घोंसले को देखा. इस बुद्धिमान चिड़िया ने उनकी अनुपस्थिति का अच्छा लाभ लिया. खाली कमरा देखकर कब्ज़ा जमाने लगी.

पत्नी ने चिड़िया को भगाने की तमाम कोशिश की, लेकिन ज़िद्दी चिड़िया ने घोंसला बनाकर ही दम लिया. वे कमरे में आती-जाती नर और मादा गौरैया की गतिविधि पर ध्यान देने लगे. चिड़िया की गतिविधि देखना उन्हें अच्छा लगने लगा. चिड़िया के व्यवहार पर सोचने लगे. यह मामूली-सा पक्षी घोंसला बनाने के लिए स्थान किस तरह चुनता होगा? इतना साहस कहां से लाता होगा कि पत्नी के दख़ल देने पर इधर-उधर उड़कर बार-बार रोशनदान पर आ जाता है और घोंसला बनाने लगता है. किस तरह मनुष्य के साथ रहने की आदत डाल लेता है कि घर का एक कोना अपना बना लेता है. इच्छा होती बर्ड वॉचर होते, तो चिड़ियों के संसार को थोड़ा-बहुत समझ पाते. वैसे इतना समझ गए थे कि पक्षी बड़ों और बच्चों में फ़र्क़ करना जानते हैं. चिड़िया जोश के समीप आकर जिस तरह चावल के कण उठा लेती, उनके समीप नहीं आती. इसे जोश की समीपता में वैसा जोखिम नहीं लगता, जिस तरह बड़ों की आहट होने पर लगता था. उन्हें आजकल चिड़िया की चर्चा करना बहुत अच्छा लगने लगा था. जोश को जब से उन्होंने घोंसला दिखाया था, वह चिड़िया और घोंसले को देखने के लिए कई मर्तबा उनके कमरे में आता था. उनके कमरे में पढ़ता था, नाश्ता करता था, खाना खाता था. अक्सर चावल, पोहा या रोटी का टुकड़ा फर्श पर फैला देता था. पहले चिड़िया झिझकती थी, अब जोश के बहुत समीप आकर चावल चोंच में उठा ले जाती थी और सुरक्षित जगह पर बैठकर खाती थी. जोश कटोरी में पानी भरकर कटोरी को स्टूल पर रख देता, पर चिड़िया पानी नहीं पीती. जोश हैरान होता, “दादू, चिड़िया को प्यास नहीं लगती?”

वे हंसते, “जोश, मुझे लगता है कि चिड़िया की नज़र कटोरी पर नहीं पड़ी है. यह भी हो सकता है कि उसे मालूम न हो कि पानी उसके लिए रखा है.”

“हो सकता है बगीचे की हौज के पास जिस छोटे गड्ढे में पानी भरा रहता है, वहां पी लेती हो.” उन्होंने जोश की बात का अनुमोदन किया, “ठीक कहते हो.”

हौज के नल से बूंद-बूंद पानी रिसकर एक छोटे गड्ढे में भर जाता था. कभी-कभी वे बिस्तर पर बैठकर खिड़की से बाहर का नज़ारा देखते. गड्ढे में भरे पानी में कुछ चिड़िया पंख फड़फड़ाकर अपनी देह को गीलाकर पानी में खेलतींं. देर तक उनका सामूहिक स्नान चलता. वे बिल्कुल नहीं पहचान पाते घोसला बनानेवाली दो चिड़िया कौन-सी हैं. इतना ज़रूर जान गए थे कि काले गाढ़े चित्तिदार पंखवाली नर चिड़िया होती है, भूरे चित्तिदार पंखवाली मादा चिड़िया. सोचते, चिड़िया की तरह मनुष्य भी एक जैसे रंग-रूप, कद-काठी के होते, तो सबको भेदभाव मुक्त समान अवसर, स्थिति और महत्व मिलता. समानता के बावजूद लोग अपने परिवार के सदस्यों को पहचान लेते, जैसे ये पक्षी अपने जोड़े को पहचान लेते हैं. उन्होंने जोश को दृश्य दिखाया, “जोश, चिड़िया मज़े से नहा रही हैं. तुम नहाने में सुस्ती दिखाते हो, रोते हो.”

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“दादू, मैं भी चिड़िया की तरह रोज़ नहाऊंगा. रोऊंगा नहीं.”

वे अचरज में थे. चिड़िया से प्रेरित होकर जोश सचमुच रोज़ नहाने लगा.

चिड़िया दिनभर कमरे में आती-जाती. कभी सीलिंग फैन पर बैठती, कभी रोशनदान पर, कभी दरवाज़े पर, कभी चावल खाने के लिए फ़र्श पर. चिड़िया को क्षति न पहुंचे, इसलिए वे गर्मी सह लेते, लेकिन पंखा नहीं चलाते. पत्नी उनकी तरह चिड़िया को लेकर सतर्क नहीं थी. उनके कमरे में आते ही पंखा चला देती. वे सतर्क हो जाते, “बंद करो. चिड़िया पंखे से कटकर मर जाएगी.”

“चिड़िया की बड़ी फ़िक्र है. हमसे गर्मी नहीं सही जाती.”

“दूसरे कमरे में जाकर पंखा चला लो. मुझे लगता है चिड़िया अंडे दे चुकी है. देखो न, कितना चौकस होकर इधर-उधर देखती है. जैसे डरती है कि कोई घोंसले को नुक़सान पहुंचा सकता है.”

“तुम चिड़िया की फ़िक्र करो. मैं गर्मी में नहीं बैठूंगी.”

पत्नी चली जाती. वे पत्नी के जाने का बुरा नहीं मानते थे. उन्हें चिड़िया की सुरक्षा अधिक ज़रूरी लगने लगी थी. वे दोपहर का खाना खाकर झपकी ले रहे थे कि चिड़िया के तेज़ स्वर और फड़फड़ाने से झपकी टूट गई. देखा नर और मादा चिड़िया में लड़ाई हो रही थी. कभी दोनों एक-दूसरे पर चोंच से आघात करतीं, कभी पीछा करते हुए इधर-उधर उड़तीं. इसी उपक्रम में मादा चिड़िया उनके बिस्तर पर आ गिरी. उन्होंने चिड़िया की प्रत्येक गतिविधि की तरह इस लड़ाई का भी एक कारण ढूंढ़ लिया. जिस तरह हर मां अपने बच्चे को लेकर बेहद सतर्क रहते हुए पिता पर कम सतर्क होने का आरोप लगाती है, शायद उसी तरह मादा चिड़िया का नर चिड़िया से विवाद हुआ होगा और लड़ पड़ी होगी. चिड़िया कुछ क्षण स्तब्ध बैठी रही. जैसे महसूस कर रही हो कि सुरक्षित है या नहीं. उन्होंने सुरक्षित होने का बोध कराने के लिए चिड़िया को पुचकारा. पुचकार का दुष्प्रभाव पड़ा. चिड़िया भयभीत होकर पूरी ताक़त लगाकर उड़ी और रोशनदान पर बैठ गई. दृश्य देख रही नर चिड़िया बिजली के तारवाली पट्टी के कोने, जहां रात को सिकुड़कर सोती थी, में जाकर बैठ गई.

वे बारी-बारी से दोनों को देखने लगे. चिड़िया के इस जोड़े को मालूम न होगा उनकी दिनचर्या में वह किस कदर शुमार हो गए थे.

बीमारी के उबाऊ दिन कुछ आसान हो गए थे. चिड़िया से अनाम संबंध बन गया था. पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते थे, गौरैया की संख्या कम होती जा रही है. पेड़ काटकर, मच्छरों की रोकथाम के लिए घर के दरवाज़ों, खिड़कियों, रोशनदानों में मज़बूत जाली लगवाकर इनके घर के भीतर आने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं. जब वे छोटे थे गांव में टिटहरी, पोड़की, महोखा, हुदहुद, पता नहीं कितने क़िस्म की चिड़िया आसपास रहती थीं.

जोश लुप्त होती जा रहीं इन चिड़ियों का नाम नहीं जानता या क़िताब में छपे चित्रों की सहायता से जानता था, जबकि चिड़िया की गतिविधि देखते हुए उन्हें लगने लगा है कि पशु-पक्षी न रहेंगे, तो कुछ भी सुंदर और सुरम्य न रहेगा. चिड़ियों का चहकना कितना आनंद देता है. बिल्कुल संगीत की तरह. वे आंखें मूंदकर तब तक शांत पड़े रहते थे, जब तक कि चिड़िया चहकना रोककर दानों की तलाश में इधर-उधर उड़ नहीं जाती.

“उठोगे नहीं क्या? सात बज रहा है.” पत्नी कमरे में आई, तो उन्हें लगा चिड़िया और उनके बीच का कोई सूत्र छूट रहा है. बोले, “जाग रहा हूं. चिड़ियों का चहकना सुन रहा था.”

“आजकल आप चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते. चलो ब्रश कर लो.”

“जोश जाग गया?”

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“नहीं. आज इतवार है. अमृत, वृंदा, जोश सब तानकर सो रहे हैं. अरे हां, अमृत के बॉस शाम को आपको देखने आ रहे हैं. मैं कमरा ठीक कर दूं. जोश का स्कूल बैग, क़िताबें, खिलौने सब यूं ही पड़े रहते हैं. चादर कितनी गंदी हो गई है.”

वे उठ गए, “चादर बदल दो. कमरा साफ़ रहे, तो मन ख़ुश रहता है.”

वे नहीं जानते थे कि पत्नी कमरा साफ़ नहीं कर रही है, बल्कि उनका दिल तोड़ दे रही है. फ्रेश होकर लौटे, तो देखा कि कमरे का परिदृश्य ही बदला हुआ था. पहली बार जाना कि परिदृश्य बदलने के लिए कुछ क्षण ही बहुत होते हैं. पत्नी ने बांसवाले लंबे झाड़ू से कमरे के जाले साफ़ करते हुए घोंसले को भी धराशायी कर दिया था. सुडौल घोंसला करुण तरी़के से फर्श पर छितराया पड़ा था. पास ही गुलाबी पारदर्शी त्वचावाले दो बच्चे निस्पंद पड़े थे. दो छोटे मांस पिंड. दुनिया में पूरी तरह आने से पहले विदाई. दोनों चिड़िया पूरी ताक़त से चीखकर सामर्थ्यभर विरोध कर रही थीं. वे जितना चीखना चाहते थे, स्तब्धता में नहीं चीख सके, “क्या किया? छोटे-से घोंसले से तुम्हें इतनी परेशानी थी?”

चिड़िया के बच्चों की दशा देख पत्नी को स्वाभाविक रूप से दुख हो रहा था, लेकिन अपनी चेष्टा को वाजिब ठहराते हुए बोली, “परेशानी थी. चिड़िया गंदगी फैलाती थी. कमरे में जहां-तहां

घास-फूस पड़े देख अमृत के साहब क्या सोचते? और फिर मैं नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे.”

“चिड़िया ने मेहनत से घोंसला बनाया था. बच्चों के लिए दिनभर चिंतित रहती थी. तुमने सब ख़त्म कर दिया. देख रही हो, दोनों चिड़िया कितनी व्याकुल हैं?”

“कहा तो, नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे. तुम आजकल चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते हो. वृंदा कह रही थी कि तुम्हारे कारण जोश पढ़ाई छोड़कर चिड़िया के पीछे बौराया रहता है.”

वे कहना चाहते थे- ‘चिड़िया थोड़े-से तिनके ही तो फैलाती थी. यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि इसकी प्रजाति को ख़त्म कर दिया जाए. चिड़िया का यह जोड़ा न होता, तो लंबी बीमारी के ये लंबे दिन बिताना मेरे लिए कठिन होता.’ नहीं कह सके. कह देते तो पत्नी कहती कि अपने दिमाग़ का इलाज कराओ. चिड़िया तुम्हारे दिमाग़ में घुस गई है. वे शिथिल होकर बिस्तर पर बैठ गए. यहां अभी-अभी दो बच्चों की मौत हुई थी. वे पूरी तरह विचलित थे, ठीक चिड़िया की तरह. चिड़िया क्रंदन कर रही थी. वे सोच रहे थे- ‘पशु-पक्षी पर्यावरण को संतुलित रखने में योगदान देते हैं. हम मनुष्य समझकर भी नहीं समझना चाहते. कहीं मांसाहार के लिए इन्हें मारा जा रहा है, कहीं अभयारण्य बनाकर इनकी सीमा निश्‍चित की जा रही है, चिड़ियाघरों में इन्हें पिंजरों में कैद किया जा रहा है. सर्कस और फिल्मों में करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हुए दैहिक-मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. जंगल काटकर इनके जीवनयापन में व्यवधान डाला जा रहा है. मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में ़कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.’ वे ग्लानि से भरे थे.

जाने-अनजाने चिड़िया उनका मनोरंजन करती थी. वे इसके बच्चों की हिफ़ाज़त नहीं कर सके. पता नहीं क्यों, लेकिन उन्हें लग रहा था कि अपने खाली, लंबे, बीमार दिनों की बोरियत और सन्नाटे को कम करने के लिए उन्होंने चिड़िया का इस्तेमाल किया था.

Sushma Munindra

       सुषमा मुनीन्द्र

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