कहानी- जब जागो तभी सवेरा (Short ...

कहानी- जब जागो तभी सवेरा (Short Story- Jab Jago Tabhi Savera)

“मां की ये भारी भरकम ज्ञान की बातें मेरी समझ से परे हैं. न मेरे पास ज़ाया करने के लिए इतना दिमाग़ है और न ही वक़्त.” मैंने सिर झटककर एक पल में ही उसकी समझाइश को सिरे से खारिज कर दिया था. जिस तरह मैं उसकी बातों से अप्रभावित रही, उसी तरह वह भी मेरी बातों से अप्रभावित बनी रह जोर-शोर से तैयारी करती रही. मैं जानती थी यह थोड़े दिनों का भूत है एक झटका लगते ही उतर जाएगा, पर झटका लगा था मुझे.

पूरे घर की व्यवस्था का एक अंतिम जायज़ा लेने के बाद मैं कपड़े बदलने अपने बेडरूम की ओर मुड़ी तो रोहन के कमरे से आती खुसर-पुसर ने मेरे कान खड़े कर दिए. माया के स्वागत में रसोई और घर की व्यवस्था में उलझी मैं घर में पति और बेटे की उपस्थिति को तो भूल ही गई थी.
“क्या चल रहा है यहां? तुम दोनों भी तैयार हो जाओ. माया वक़्त की बहुत पाबंद है. सात बजे कहा है तो सात बजते ही आ जाएगी. और रूकेगी भी जरा-सी देर ही.”
“हां, भई सबको सब मालूम है. तुम्हारी सहेली इतनी बड़ी कंपनी की एम डी जो हैं.”
पति सतीश की बात अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि उनका और साथ ही तुरंत रोहन का भी मोबाइल बज उठा था. मैंने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी. तैयार होते-होते अचानक कुछ ध्यान आया.
“ओह, अभी बाहर निकलकर पहला काम यही करती हूं.” मैं बेडरूम से बाहर निकली तो पति और बेटे को फिर खुसर-पुसर में व्यस्त देख खीज उठी. मुझे देखते ही दोनों सावधान की मुद्रा में आ गए.
“मां, यह मेरा सी.वी. और यह मेरे एक ख़ास दोस्त रमन का सी.वी. फोन कॉल्स तो और भी बहुत आ रहे हैं पर….”
“मैंने ही इसे समझाया कि कम से कम लोगों की सिफ़ारिशें लगवाओगे तभी ख़ुद का चांस बनेगा. तुम चाहो तो अपने साथ-साथ मेरे लिए भी कह सकती हो. अभी तो मेरे रिटायरमेंट में भी दो साल बाकी हैं.” सतीश ने अपनी बात रखी. मैं उनकी बातें, उनके इरादे सुनकर भौंचक्की-सी रह गई थी.
“यह सब हो क्या रहा है? माया यहां इसलिए नहीं आ रही है. वह आ रही है कॉलेज के दिनों की मेरी सबसे ख़ास सहेली होने के नाते.”
“हां… तो, मालूम है. पर उनकी ख़ास सहेली उनसे कुछ ख़ास आग्रह करेगी तो वे मना थोड़े ही करेंगी.”
“पर हम ऐसा आग्रह करें ही क्यों? हमें जो भी करना है, ज़िंदगी में जो भी बनना है अपने बलबूते पर बनेगें. किसी के कृपापात्र बनकर नहीं.” सवेरे से दिमाग़ में उमड़-घुमड़ रहा विचारों का ज्वार आख़िर शब्द रूप में ज़ुबां से बाहर फूट पड़ा था.

मेरे तेवर देख सतीश शायद थोड़ा उखड़ गए थे. इसलिए बिना कोई प्रतिवाद किए अपने कमरे में जाकर लेट गए. लेकिन रोहन ने अब भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था.
“हम अपनी योग्यता का ही प्रतिफल मांग रहे हैं मां. डिग्री तो हमारे पास है ही. पर आप भी जानती हैं बिना जान-पहचान, सिफारिश के आजकल अच्छी नौकरी मिलना कितना मुश्किल है?”

“मुश्किल है, नामुमकिन तो नहीं. माया ख़ुद कितने संघर्ष और मेहनत के बाद इस मुक़ाम पर पहुंची है. मुझसे बेहतर कौन जान सकता है?” अपने ही कहे शब्दों को मन ही मन दोहराती मैं लॉबी की ओर बढ़ गई थी. मैं ख़ुद हैरत में थी कि क्या वाकई यह सब मेरे अपने मुंह से निकल रहा है या मुझमें मां की आत्मा घुस गई है? मां का ख़्याल आते ही मुझे ध्यान आया कपड़े बदलते वक़्त जो काम ध्यान आया था वह कहीं फिर से न भूल जाऊं. मैं पूरे मनोयोग से लॉबी में लगी मां की तस्वीर साफ़ करने लगी. माया इस तस्वीर के सम्मुख अवश्य शीश नवाएगी.
शीशे में जड़ी तस्वीर से झांकती मां की आंखें आश्‍चर्य से मानों मुझे ही निहार रही थीं. मां की तस्वीर हमेशा से ही मेरे लिए मात्र तस्वीर नहीं अपने मन का आईना रही है. अपने मन के विचार मैं उसमें आसानी से प्रतिबिम्बित होते देख सकती हूं. दोबारा श्रद्धा से मां की आंखों में झांका तो वे मुझे आशीर्वाद देती प्रतीत हुईं. मां की आंखें तो हमेशा ही ऐसी ममतामयी कशिश से भरी रहती थीं, मैं ही नहीं देख समझ पाई. पर माया ने इस कशिश को न केवल बख़ूबी समझा वरन इसका भरपूर लाभ भी अर्जित किया.
माया के माता-पिता उसके बचपन में ही एक दुर्घटना में चल बसे थे. मामा ने उसे हॉस्टल में डाल दिया था. स्कूल और फिर कॉलेज तक आते-आते वह मेरी अंतरंग सहेली बन गई थी. पढ़ाई में हम दोनों ही अच्छी थीं. बल्कि मैं उससे बीस ही थी. कॉलेज ख़त्म होते-होते हम दोनों को नौकरी भी मिल गई थी. मां-पिता के प्यार से मरहूम माया को मेरे घर का वातावरण बेहद भाता था. और अनाथ जानकर मां भी उस पर ख़ूब प्यार लुटाती थी. आज सोचती हूं तो लगता है इंसान को किसी चीज़ की अहमियत तब समझ आती है जब वह उसके पास नहीं रहती. तभी तो माया को मां और उनकी बातों की अहमियत इतनी जल्दी समझ आ गई थी और मैं अब उनके चले जाने के बाद समझ पाई हूं.
हमें नौकरी करते कुछ ही अरसा हुआ था पर जैसा कि आजकल ट्रेंड बनता जा रहा है युवा हर वक़्त नौकरी बदलने की फिराक में रहने लगे हैं. हम भी अपवाद नहीं थे. कई जॉब पोर्टल पर हमने अपनी सी.वी. डाल रखी थी. एक बहुप्रतिष्ठित कंपनी से हम दोनों को कॉल आया. दोस्तों से बातचीत की तो पता लगा और भी बहुतों को कॉल आया था. पर उन्हें भर्ती बहुत सीमित संख्या में करनी थी. ज़ाहिर था, कॉम्पिटीशन तगड़ा था. माया सहित हम अधिकांश सहेलियों ने यह कहकर पहले ही हथियार डाल दिए कि 9-10 घंटे की हाड़तोड़ नौकरी के बाद अब उस नौकरी के 8-9 राउंड की तैयारी करना हमारे बस की बात नहीं थी.
वह एक छुट्टी का दिन था. माया घर आई हुई थी. फोन पर हम सहेलियों के बीच फिर इस जॉब, उसके प्रोफाइल आदि की चर्चा छिड़ गई थी. मां काफ़ी दिनों से हमारी बातें, फोन पर चर्चाएं सुन रही थीं. उन्होंने बेहद उत्सुकता से माया से इस बारे में जानकारी लेनी आरंभ कर दी. मैं अक्सर अपनी अरुचि ज़ाहिर कर मां के ऐसे उत्सुक सवालों पर लगाम लगा देती थी. पर माया का धैर्य असीम था. वह मां के प्रत्येक उत्सुकता भरे सवाल का संयम से जवाब दे रही थी. मैं ऊबकर अपने कमरे में आ गई और टेब पर गेम खेलने में व्यस्त हो गई. माया और मां के बीच क्या वार्तालाप हुआ मैं नहीं जानती. न मेरी जानने में रुचि थी. लेकिन उस दिन के बाद माया को अक्सर मोटी-मोटी क़िताबों और इंटरनेट पर उलझा देख मैंने एक दिन उससे पूछ ही लिया था कि वह किसकी तैयारी में लगी है?
माया ने बड़ी ही संजीदगी से बताया था कि उसे हर हाल में वह जॉब हासिल करनी है. और वह उसी के लिए प्रयत्नरत है. यही नहीं उसने मुझसे भी इसमें जुट जाने का आग्रह किया. “लेकिन तुझे यह भूत लगा कैसे? जहां तक मुझे ध्यान है हम सहेलियों ने इसमें दिमाग़ और टाइम ख़राब न कर दूसरे जॉब्स पर फोकस करने का निर्णय लिया था.”
“हां, पर उस दिन की आंटी की समझाइश के बाद मेरी सोच बदल गई है.” माया गंभीर थी पर मैं अब भी मज़ाक के मूड में थी. “अच्छा, ऐसा क्या मंत्र फूंक दिया मां ने तेरे कान में?”
“आंटी ने समझाया कि कोई भी लक्ष्य हमसे बड़ा नहीं होता. इसलिए उसे पाने के लिए हमें अपना सौ प्रतिशत लगा देना चाहिए. फिर भले ही लक्ष्य हासिल हो या न हो हमें यह अफ़सोस तो नहीं रहेगा कि हमने प्रयास नहीं किया.”
“हुंह! बल्कि ज़्यादा अफ़सोस होगा कि इतना प्रयास भी किया और रिजल्ट रहा शून्य. जब रिजल्ट पता ही है, तो व्यर्थ क्यों पसीना बहाया जाए?”
“क्योंकि हमारे हाथ में पसीना बहाना यानी श्रम करना ही है. रिजल्ट हमारे हाथ में नहीं है. अपना सौ प्रतिशत देकर फिर रिजल्ट डेस्टिनी पर छोड़ना संतोष देता है पर बिना कुछ किए सब कुछ डेस्टिनी पर छोड़ना स़िर्फ पछतावा देता है.”
“मां की ये भारी भरकम ज्ञान की बातें मेरी समझ से परे हैं. न मेरे पास ज़ाया करने के लिए इतना दिमाग़ है और न ही वक़्त.” मैंने सिर झटककर एक पल में ही उसकी समझाइश को सिरे से खारिज कर दिया था. जिस तरह मैं उसकी बातों से अप्रभावित रही, उसी तरह वह भी मेरी बातों से अप्रभावित बनी रह जोर-शोर से तैयारी करती रही. मैं जानती थी यह थोड़े दिनों का भूत है एक झटका लगते ही उतर जाएगा, पर झटका लगा था मुझे. माया ने साक्षात्कारकर्ताओं को प्रभावित करते हुए सारे राउंड्स बड़ी ही आसानी से पार कर लिए थे. जबकि हममें से कोई भी तीसरे राउंड से आगे नहीं जा पाया. माया प्रसाद लेकर मां का आशीर्वाद लेने आई थी. मेरी असफलता ने उसकी और मां की ख़ुशी को आधा कर दिया था. माया मुझे दो और कंपनी के इंटरव्यू की तैयारी संबंधी टिप्स देने लगी. मुझे यह सहन नहीं हुआ और मैंने उसे झिड़क दिया था. “मुझे ऐसे छोटे-मोटे इंटरव्यू की तैयारी नहीं करनी पड़ती. ऐसे इंटरव्यू तो मैं कभी भी, कहीं भी दे सकती हूं.”

मां को मेरा यह बड़बोलापन या अति आत्मविश्‍वास अखर गया था. “बेटी, जिस तरह किसी भी प्रतिस्पर्धा या लक्ष्य को अपने से बड़ा नहीं आंकना चाहिए उसी तरह किसी भी प्रतिस्पर्धा या लक्ष्य को बहुत छोटा भी नहीं आंकना चाहिए. मैं तो हमेशा
यही सलाह दूंगी कि प्रतिस्पर्धा छोटी हो या बड़ी हमारी तैयारी शत प्रतिशत होनी चाहिए.”
मेरा उखड़ा हुआ मूड पूरी तरह बिगड़ चुका था. माया मुझे दोस्त कम शत्रु ज़्यादा प्रतीत होने लगी थी. मुझे लगने लगा था वह मुझसे न केवल मेरा आत्मविश्‍वास वरन मेरी मां भी छीन रही है. मेरी मनःस्थिति से वाकिफ़ मां मुझे अकेले में समझाने का प्रयास करतीं, “माया तेरी दुश्मन नहीं सच्ची दोस्त है. मेरी तरह वह भी तेरा भला ही चाहती है. तेरी उसके प्रति बेरूखी देखकर मेरा दिल दुखता है. फिर भी मैं तुझे और उसे यही सीख दूंगी कि दोस्ती को हर हाल में निबाहने का प्रयास करना चाहिए. मुसीबत में सच्चे दोस्त रिश्तेदारों से भी बढ़कर साबित होते हैं.”
कहते हैं न विनाशकाले विपरीत बुद्धि, मेरी अक्ल पर भी उस समय पत्थर पड़ गए थे. मां की हर सलाह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने में मैं अपनी शान समझने लगी थी. थक-हारकर मां ने मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया था. उनके जीर्ण-शीर्ण होते शरीर और उससे भी ज़्यादा टूटन की ओर अग्रसर दिल में अब मुझसे लड़ने की ताक़त शेष नहीं रही थी. पर उनके दिखाए रास्ते पर चलती माया प्रगति के एक के बाद एक सोपान चढ़ती जा रही थी. और आज वह जिस मुक़ाम पर पहुंच चुकी है उसे देखकर मां जीवित होती, तो उनका सीना गर्व से फूल उठता.
मां को याद कर मेरी आंखें नम हो उठी थीं. मेरी बेरूखी के बावजूद भी माया ने घर आना, मां से मिलना-जुलना नहीं छोड़ा था. क्योंकि मां की समझाइशों को यदि सच्चे मन से किसी ने अपने जीवन में उतारा था तो वह माया थी. सफलता के शीर्षतम मुक़ाम पर पहुंच जाने के बावजूद भी घमंड उसे छू तक नहीं पाया था.
उसकी सहृदयता और विनम्र स्वभाव ने मेरी अकड़ और अहंकार को चूर-चूर कर दिया था. कंपनी ऑफिस में उसकी विजिट को जानते हुए मैं पूरे समय उसके सामने आने से कतराती रही. पर उसकी सूक्ष्म नज़रों ने न केवल मुझे पहचान लिया, वरन मेरे अंदर के डांवाडोल होते आत्मविश्‍वास को भी भांप लिया. ऑफिस के पूरे स्टाफ के सम्मुख अपनी दोस्ती को उजागर करते हुए एक ही पल में उसने मेरे कद को कई गुना बढ़ा दिया था. लेकिन तब से मैं मन ही मन ख़ुद को उसके समक्ष बहुत बौना महसूस कर रही थी. लोग मुझे बधाइयां दे रहे थे. पति और बेटे के पास सिफ़ारिशों के फोन कॉल्स की कतार लग गई थी.
मैं चाहूं तो माया से उनकी सिफ़ारिश कर उनकी नज़रों में और ऊंची उठ सकती हूं. पर तब… तब मैं अपनी नज़रों में और भी ज़्यादा गिर जाऊंगी. आज मैं ख़ुद को मां की जगह पर खड़ा महसूस कर रही थी. पहली बार मुझे एहसास हो रहा था कि मां कितनी सही थीं और मैं कितनी ग़लत. मेरी पश्‍चाताप भरी आंखें मां की आंखों पर टिक गई थीं. अचानक मुझे लगा मां की तस्वीर मुस्कुराने लगी है. और कह रही है, “ग़लतियों से सीखने वाला ही तो इंसान होता है और इंसान जब जाग जाए, तब ही उसकी ज़िंदगी में सवेरा होता है.”
माया की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया तो मैं तेज़ी से दरवाज़े की ओर भागी. बांहें उसे सीने में भर लेने को अकुला रही थीं. मैं समझ गई मेरी ज़िंदगी में सवेरा हो चुका है.

– संगीता माथुर

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