
पूर्ति खरे
"बेटा, जिस ज़मीन ने पूरी ज़िंदगी हमें सहारा दिया, उसे मैं कैसे बेच दूं? आज तुम जिस ऊंचाई पर बैठे हो, उसकी नींव भी तो इसी मिट्टी ने रखी है..."
ये जून माह के आख़िरी दिन थे. आमतौर पर इस समय तक बारिश की पहली फुहारें धरती का माथा चूम चुकी होती थीं, लेकिन इस बार बादल जैसे केवल छेड़ने आते थे घिरते, ठहरते और बिना बरसे लौट जाते. उमस से भरी गर्मी अपने चरम पर थी. खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई थी और हर दरार मानो पानी नहीं, उम्मीद की एक बूंद मांग रही थी.
केदारनाथ जी रोज़ की तरह खेत की मेड़ पर खड़े आसमान को निहारते. बादलों को देखते ही उनकी आंखें भीग उठतीं. उन्हें लगता, जैसे धरती ही नहीं, उनका मन भी बारिश की प्रतीक्षा में सूख गया है. उसी समय बेटे दिनकर का फोन आया, "पापा! बेच दीजिए ये खेत-खलिहान और मेरे साथ अमेरिका आ जाइए, क्या रखा है उस बंजर ज़मीन में?"
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केदारनाथ जी ने गहरी सांस ली, "बेटा, जिस ज़मीन ने पूरी ज़िंदगी हमें सहारा दिया, उसे मैं कैसे बेच दूं? आज तुम जिस ऊंचाई पर बैठे हो, उसकी नींव भी तो इसी मिट्टी ने रखी है. कल तक जब यही खेत सोना उगलते थे, तब ये अच्छे थे. आज दो साल सूखा पड़ गया तो इन्हें छोड़ दूं? अपने ही बुढ़ापे में कोई माता-पिता को छोड़ देता है क्या?"
फोन के उस पार कुछ पल सन्नाटा रहा. फिर दिनकर ने वही पुरानी बात दोहरा दी, "पापा, भावनाओं से पेट नहीं भरता.'' फोन कट गया.
केदारनाथ जी मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनकी निगाह फिर उसी सूखी धरती पर टिक गई. फटी हुई मिट्टी जैसे मौन होकर पूछ रही थी- केदारनाथ! क्या तुम भी मेरा साथ छोड़ दोगे?..
अगली सुबह वे हमेशा की तरह खेत पर पहुंचे. अचानक तेज़ हवा चली. दूर-दूर तक फैले बादल एक-दूसरे से मिलने लगे. कुछ ही क्षणों बाद पहली बूंद आकर उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर ठहरी. उन्होंने हथेली फैला दी. फिर दूसरी... तीसरी... और देखते ही देखते आसमान झमाझम बरस पड़ा.
केदारनाथ जी भीगते हुए घुटनों के बल बैठ गए. उन्होंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाकर अपने माथे से लगा ली. बरसों पुराना रिश्ता फिर से धड़क उठा था. सोंधी ख़ुशबू ने जैसे उनके भीतर तक नई जान फूंक दी. उनकी आंखों से बहते आंसू अब बारिश में घुल चुके थे.
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हज़ारों किलोमीटर दूर अमेरिका में बैठे दिनकर ने उसी शाम समाचारों में अपने जिले की बारिश और खिलखिलाते किसानों के चेहरे देखे. न जाने क्यों उसके भीतर कुछ पिघल गया. उसने तुरंत पिता का नंबर मिलाया.
"पापा..."
"हां बेटा."
"खेत मत बेचिए. इस बार मैं छुट्टी लेकर घर आ रहा हूं. अब हम मिलकर खेती करेंगे- नई तकनीक अपनाएंगे, पानी बचाएंगे और इस ज़मीन को फिर से हरा-भरा बनाएंगे. शायद मैं बहुत दूर चला गया था, इसलिए अपनी जड़ों की क़ीमत भूल बैठा था.''
केदारनाथ जी कुछ क्षण चुप रहे. फिर भीगे स्वर में बोले, "बेटा, ज़मीन केवल अन्न नहीं उगाती, इंसान की पहचान भी उगाती है. जिसके पांव अपनी मिट्टी में टिके रहते हैं, वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न चला जाए, एक दिन लौटकर यहीं आता है."
कुछ महीनों बाद वही खेत धान की कोमल हरियाली से लहलहा रहे थे. मेड़ों पर पिता और पुत्र साथ-साथ चलते दिखाई देते. एक के हाथ में अनुभव था, दूसरे के हाथ में नई तकनीक और दोनों के बीच वह मिट्टी थी, जिसने पीढ़ियों को जोड़े रखा था.
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हवा जब लहराती फसलों को सहलाकर गुज़रती, तो लगता मानो धरती स्वयं मुस्कुराकर कह रही हो-
सूखा केवल खेतों को बंजर करता है, रिश्तों को नहीं. जिन रिश्तों की जड़ें मिट्टी में होती हैं, वे पहली बारिश के साथ फिर से हरे हो ही जाते हैं!..

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