कहानी- जॉय ऑफ गिविंग (Short Stor...

कहानी- जॉय ऑफ गिविंग (Short Story- Joy Of Giving)

“… उनकी ओर बढ़ा तुम्हारा एक मुस्कुराता कदम उन्हें ख़ुशी देगा. अभी तुम्हीं तो ख़ुशी देने की महिमा का बखान कर रही थी. अगर तुम ख़ुशी वाकई बांटना चाहती हो, तो उचित पात्र की तलाश करो. ख़ुशी बांटने के नए प्रयोगों पर विचार करो. हो सकता है कोई तुम्हारा अपना तुम्हारी ओर से आनेवाली ख़ुशी का शिद्दत से इंतज़ार कर रहा हो.”

“गिरीश, आज स्टोर में रखे बॉक्स खुलवाने में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए. सोच रही हूं पुराने कपड़ों को ठिकाने लगा ही दूं.” अख़बार पढ़ती हुई अनुभा की बात सुनकर गिरीश हंस पड़ा.
“ये अख़बार पढ़ते-पढ़ते अचानक कपड़ों का ध्यान तुम्हें कहां से आ गया है?” गिरीश की बात
सुनकर अनुभा ने खुलासा किया, “अख़बार वालों ने जॉय ऑफ वीक मनाने का फ़ैसला लिया है, इसमें देने के सुख के बारे में लिखा है.” अनुभा एक दार्शनिक की तरह बोली. “गिरीश सभी मानते हैं कि देने से दुआएं मिलती हैं और ये दुआएं कभी जाया नहीं जाती हैं. वक़्त आने पर ये दुआएं चेक का काम करती हैं और ज़रूरत पड़ने पर हमारे काम बना जाती हैं. ईश्‍वर के मुस्कुराते चेहरे पर अद्भुत आभा देने की ख़ुशी से ही तो छलकती है. उनके चारों ओर बिखरा प्रकाश देने की ख़ुशी से ही तो देदीप्यमान होता है.”
“अरेे बस भी करो अनु, ये भारी-भरकम शब्द सुनकर कहीं तुम्हें प्रवचन के ऑफर न आने लगे.” गिरीश की बात पर अनुभा हंसते हुए बोली, “अरे ये सब तो मैं अख़बार पढ़कर बोल रही हूं. उसी की पंक्तियां मैं दोहरा रही हूं. जो भी हो इस जॉय ऑफ गिविंग के ज़रिए चलाई मुहिम के तहत गरीबों को बहुत फ़ायदा पहुंचा है. ठंड के दिनों में लोगों द्वारा दिए गए कपड़ों से कितने लोगों को जीवनदान मिल गया है.” अनुभा अपनी बात कहती हुई स्टोर की ओर जाने लगी, तो गिरीश समझ गया कि आज इतवार का दिन जॉय ऑफ गिविंग के नाम जाने वाला है. वह स्टोर पहुंचा तो देखा अनुभा एक हाथ से बॉक्स का कवर संभाले कपड़े निकालने का असफल प्रयास कर रही थी. गिरीश ने बॉक्स का कवर पकड़ा तो वह तसल्ली से
भीतर से कपड़े निकालने लगी. पुराने जैकेट मुड़ी-तुड़ी शॉल और पुराने डिज़ाइन के स्वेटर वह ऊबे हुए से भाव के साथ बाहर लापरवाही से डालती गई. तभी गिरीश की नज़र बाहर निकल
आए हरे रंग के प्लास्टिक के बैग पर पड़ी. जिसे अनुभा फुर्ती से भीतर रखने का प्रयास कर रही थी.
अचानक गिरीश बोल पड़ा, “ये वही स्वेटर है न जो मम्मीजी अंश के पहले जन्मदिन पर लाई थीं.”
“लाई कहां थीं गिरीश, स्नेहा के हाथों से भिजवा दिया था.”
“हां, मुझे याद है, स्नेहा ने बताया था कि किस तरह अंश कि नानी ने सबसे छिप कर इस स्वेटर को बुना था.” कहते हुए गिरीश ने ध्यान से अनुभा के चेहरे को देखा, तो हमेशा की तरह मायके के ज़िक्र से वह
अन्मनयस्क दिखी. हमेशा की तरह उसकी चुप्पी गिरीश को नागवार गुज़री. “क्यों संभाल कर रखा है मां के बुने इस स्वेटर को?” गिरीश की बात से आहत अनुभा ने तल्ख स्वर में जवाब दिया, “बहुत कम निशानियां हैं मेरे पास मायके के स्नेह की, सो जो हैं उन्हें संभाल रहीं हूं.”
अनुभा रसोई की ओर चली आई, तो गिरीश भी उसके पीछे-पीछे चला आया और बोला, “अनु ख़ुशकिस्मत हो कि तुम्हारे मम्मी-पापा अभी हैं. उनकी निशानियों को संभालने की जगह उनकी ओर एक कदम बढ़ाकर उन रिश्तों को संभालो जिनके उलझने का दुख तुम्हें अक्सर टीस पहुंचाती है. जिनकी कमी तुम्हें अक्सर महसूस होती है. उनकी ओर बढ़ा तुम्हारा एक मुस्कुराता कदम उन्हें ख़ुशी देगा. अभी तुम्हीं तो ख़ुशी देने की महिमा का बखान कर रही थी. अगर तुम ख़ुशी वाकई बांटना चाहती हो, तो उचित पात्र की तलाश करो. ख़ुशी बांटने के नए प्रयोगों पर विचार करो. हो सकता है कोई तुम्हारा अपना तुम्हारी ओर से आनेवाली ख़ुशी का शिद्दत से इंतज़ार कर रहा हो.”

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“गिरीश प्लीज़ बात को मत बढ़ाओ.” गिरीश का इशारा किस तरफ़ था, ये अनुभा जानती थी. अपने मनोभावों को दबाती हुई वह बालकनी से छत पर आ बैठी. पर आज शायद इस बात को तूल मिलाना ही था. तभी अंश घर में आया और आते ही बोला, “मम्मी, कोई भी नहीं आया खेलने. सब छुट्टियों में कहीं न कहीं बाहर गए हैं. हम लोग कहीं नहीं जाएंगे क्या?” अपने आठ साल के बेटे को देख कर अनुभा मुस्कुरा पड़ी और बोली, “मई-जून की छुट्टियों में हम दादा-दादी के घर गए थे न?”
“वो तो समर वेकेशन थे न, विंटर वेकेशन में कहां जाएंगे?” तभी गिरीश उसे गोद में उठाते हुए बोले, “चलो हम तीन-चार दिन के लिए कहीं घूम कर आते हैं.” पापा की बात सुन कर अंश पुलक उठा. अनुभा उनके आनायास बने प्रोग्राम पर कुछ टिप्पणी करती, उससे पहले ही अंश बोला, “दादा-दादी के घर तो हम इस साल हो आए हैं
और नाना-नानी के घर हम जाते नहीं.” अपने मुंह से निकले शब्दों को सुधारने के प्रयास में अटकते हुए बोला, “मेरा मतलब था कि उनसे हमारी बोलचाल बंद है न?” अंश की बात पर दोनों चौंक पड़े थे. अनुभा को अवाक् देख कर अंश अपनी कही बात के परिणाम पर घबरा उठा और फुर्ती से भीतर भाग गया.
“उफ! आजकल के बच्चे, इनका कितना दिमाग़ चलता है.”
अनुभा की हैरानी पर गिरीश बोले, “अनुभा, हर साल अंश दादा-दादी के घर जाता है, जबकि वहां के बच्चे नाना-नानी के घर जाते हैं. दूसरों के मुंह से सुने उनके ननिहाल के खट्टे-मीठे क़िस्से उसके मन में कुछ प्रश्‍नों को जन्म देते होंगे.”
“पर दादा-दादी के घर अंश जाता ही है न, क्या इतना हमारे लिए काफ़ी नहीं है.”
“अनुभा मेरे ख़्याल से एक बच्चे के लिए दोनों पक्ष महत्वपूर्ण होते हैं.” गिरीश के तर्क को काटती हुई अनुभा के पूर्वाग्रह सामने आ गए. “हमारी
अपनी मर्ज़ी से की गई शादी को अगर तुम्हारे मां-बाबूजी स्वीकार कर सकते हैं. तो मेरे मम्मी-पापा क्यों नहीं? उन्होंने ख़ुद अपनी ओर बढ़ने वाले हमारे कदमों को रोका है, तो मुझे भी अब
तुम्हारे और अंश के अलावा किसी और की समीपता की आकांक्षा नहीं है.”
“तुम्हारे जन्मदाता के चेहरे पर ख़ुशी की एक झलक देखने की भी मंशा नहीं है?” गिरीश के प्रश्‍न से आहत अनुभा झटके से उठ कर भीतर गई, तो वहां सहमे अंश को टीवी के शोर में डूबे देखा. अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर वह आंख मूंद कर कुर्सी से सिर टिकाए बैठ गई.
कितनी बार अपने अतीत के रीकैप से ख़ुद को उस अपमान से घिरा पाया है, जो कभी उसके पापा ने किया था. गिरीश को मन से चाह कर जीवनसाथी बनाना चाहा था. सिर्फ़ यही तो कसूर था. पापा ने अपने दोस्त को वचन दिया था कि उनके बेटे से वो अनुभा का ब्याह करेंगे. अनुभा यह बात जानती भी थी और शायद इसके लिए पापा को स्वीकृति भी दे दी थी. पर तब कहां जानती थी कि गिरीश उसके जीवन में प्रवेश कर के उसकी ज़िंदगी बन जाएगा. अनुभा के लिए गिरीश एक अच्छा जीवनसाथी है, इस बात को मानते हुए भी पापा अपने दोस्त को दिए वचन पर अड़े रहे. ऐसे में मम्मी की मूक सहमति से अनुभा ने गिरीश के साथ कोर्ट मैरेज कर ली थी. जहां गिरीश के परिवार वालों ने एक रिसेप्शन के द्वारा सामाजिक मुहर लगा दी थी. वहीं अनुभा के पापा ने अपने अबोलेपन से अपनी असहमति जग-जाहिर कर दी थी.
छोटी बहन स्नेहा की शादी में मम्मी की ज़िद पर गिरीश और अनुभा को बुलाया गया. अकेले में अपनी बेटी की सुखी गृहस्थी से आश्‍वस्त मां बेटी के हाथों को सहलाती, पर पापा की मौजूदगी में अपने हाथ को छुड़ा लेती, तो अनुभा का दिल रो बैठता. स्नेहा की बिदाई के वक़्त कहे पापा के वो शब्द आज भी उसके कानों में गूंजते हैं, “छोटी कम से कम तूने मेरी इज़्ज़त का मान रखा, इस बात की मुझे बहुत ख़ुशी है. अब ऐसे ही अपने ससुराल वालों का भी मान रखना.” बेटी की बिदाई के वक़्त पिता द्वारा कहे सामान्य से इन शब्दों में… कम से कम… ये कहना क्या ज़रूरी था. उस वक़्त आस-पास खड़े लोगों की ओर देखने की हिम्मत कहां जुटा पाई थी. इसे भी इत्तफ़ाक ही मानती अगर पापा की उपेक्षा उसे तीन साल बाद हुई भाई की शादी में देखने को न मिलती. भूलता नहीं है मेहमानों से भरा आंगन, जिसमें पापा काम करने वालों को कुछ निर्देश दे रहे थे, तभी अनुभा ने गिरीश और अंश के साथ प्रवेश किया उस वक़्त नन्हा अंश पापा की उंगलियों को पकड़ कर बड़ी मासूमियत से बोला, “नाना… नाना…” उस वक़्त पापा किस तरह से अनदेखा करके अपनी उंगली को छुड़ाते हुए, उन अपरिचितों के साथ अपनी बात जारी रखते हुए व्यस्तता दिखाते बाहर चले गए. लोगों की नज़रों का उपहास अनुभा के भीतर उतर गया. उस वक़्त मम्मी ने वो दृश्य देख कर भावी स्थिति को भांप लिया था.
अनुभा के मुड़ते कदमों को बड़े बड़प्पन के साथ गिरीश ने रोका, तो रुक्मणी को अपने दामाद पर मान हो आया था. भीतर जाकर भीगे शब्दों में बोली, “अपने पिता की नादानियों को माफ़ कर दे मेरी बच्ची, पूरा घर मेहमानों से भरा है. ऐसे में और तमाशा बने, ये ठीक नहीं है.” पर भाई की शादी तक रुकना उसके लिए एक कठिन परीक्षा थी. घर भर के आए मेहमानों की नज़रों से उड़े कुछ उपहास मिश्रित अनकहे प्रश्‍नों के धुएं से उसकी आंखें रह-रह कर गीली हो जाती थी. भाई की शादी के पांच साल बाद, आज तक मायके का रुख नहीं किया. इधर गिरीश पूना आ गए, तो अनुभा अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गई. हां, पापा द्वारा किए उस अपमान को उसने दिल में फलने-फूलने का पूरा मौक़ा दिया. मम्मी के एकतरफ़ा फोन आते रहे, पर अनुभा ने कभी फोन नहीं किया. ऐसे में संवाद टूटता चला गया. भाई की शादी के दो साल बाद जब अनुभा अपनी छोटी ननद की शादी में आई, तो शगुन का सामान लेकर आए अपने पिता को अपनी ससुराल में आया देखकर वह हैरान रह गई. उससे भी ज़्यादा हैरानी ससुर और पिता को सहज रूप से बातचीत करते देखकर हुई. पर अनुभा अपने पापा से सहज नहीं हो पाई थी.
अंश जब उनकी गोद में बैठता, तो वह उसे किसी न किसी बहाने से अपने साथ ले जाती. शादी वाले दिन अंश को कुर्सी पर सोते देख दीनानाथ जी ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया उसी वक़्त अनुभा उसे गोद में उठाते हुए निर्विकार भाव से कमरे में ले जाने लगी, तो गिरीश के सब्र का बांध टूट गया.

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“अनुभा, ये ठीक नहीं है हम पापा के इस रूप को देखने का इंतज़ार कर रहे थे. आशा की इस किरण को अपने अहं की कालिमा से मत ढको.” चलते समय गिरीश ने दीनानाथ जी के पैर छुए, तो वे बिना कुछ बोले उसके सिर पर हाथ फेर कर चले गए. गिरीश को अंदाज़ा था कि इस क़िस्से के बाद अनुभा के मन में ग्लानि उत्पन्न होगी, पर ऐसा नहीं हुआ. पापा के प्रति पाली नाराज़गी उसके मन से दूर नहीं हुई. आज इतने दिनों बाद भी अनुभा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया. इस बात से व्यथित गिरीश घर में छाए अनचाहे सन्नाटे को भंग करने के उपाय सोच ही रहा था कि फोन की घंटी ने नीरवता भंग की, “मम्मी, स्नेहा मौसी का फोन है.” अंश की आवाज़ सुन कर अनुभा दौड़ कर आई.
“हैलो, दीदी कैसी हो?” स्नेहा ने पूछा तो अनुभा बोली, “सोच रही हूं कि एक हफ़्ते के लिए तेरे पास मुंबई आ जाऊं अंश की छुट्टियां चल रही है न?” अनुभा की बात सुन कर स्नेहा चहक उठी, “सच दीदी मज़ा आ जाएगा लेकिन…” कुछ संकोच के बाद वह बोली, “दीदी, मम्मी और पापा आए हैं.” अपनी बात से उत्पन्न चुप्पी को तोड़ते हुए स्नेहा बोली, “दीदी, पापा-मम्मी आपसे मिलना चाहते थे, वो आपके पास पूना आना भी चाहते थे पर…” उसकी बात को काटते हुए अनुभा बोली, “पर क्या स्नेहा? मुझ तक पहुंचाना इतना मुश्किल है क्या?” अनायास अनुभा के मुंह से निकला, “मुश्किल तो था दीदी, तुमने ख़ुद तक पहुंचने में उनका कहां साथ दिया. आपने पापा की उस ग़लती को दिल में पाल कर रखा. पर सोचो पापा को भी तो तुम्हारी और जीजू की शादी का निर्णय उस वक़्त ग़लत लगा. पर समय के साथ वो समझ गए थे कि जिस बात को वो तूल दे रहे हैं, वो बेवजह है. पर दीदी तुम तो इतना समय बीत जाने के बाद भी नहीं समझी कि बीते हालात में पापा की नाराज़गी को इतना तूल देना ग़लत है. तुम्हें दुख हुआ था, तो पापा भी देवेश अंकल को दिए वचन को पूरा न कर पाने की स्थिति में दुखी थे न! उन्होंने तो तुम्हें माफ़ करके तुम्हारे चेहरे पर ख़ुशी देखनी चाही. लेकिन तुम हमेशा उनके चेहरे से ख़ुशी छीनती रही.” आवेग में बोलती स्नेहा अनुभा की सिसकियां सुन कर चुप हुई.
“सॉरी दीदी क्या करूं, मम्मी-पापा को यूं उदास नहीं देख पाती हूं.”
“स्नेहा तू फोन रख मैं बाद में बात करूंगी.” अनुभा को रोते देख गिरीश घबरा गए. स्नेहा को फोन लगाकर सारी बात जानी, तो वे सीधे अंश के कमरे में चले गए. कुछ देर बाद अंश के साथ वापस
आए, देखा अनुभा सोफे से सिर टिकाए आंखें मूंदे लेटी थी. तभी अंश की आवाज़ आई, “मौसी, ज़रा नानू से बात कराना.” अंश की बात से चौंकी अनुभा कुछ कहती, उससे पहले ही अंश बोल
पड़ा, “नानू, आप स्नेहा मौसी के घर आए पर अंश के घर क्यों नहीं आए?” गिरीश ने हाथ बढ़ा कर स्पीकर ऑन कर दिया. फोन के तार ने ख़ुशियों के कई तार जोड़ दिए थे. दीनानाथ जी अंश से बोल रहे थे, “तुम्हारी नानी तुम्हारे लिये स्वेटर बुन रही हैं, लेकिन वो पूरा नहीं हो पा रहा है, क्योंकि आप कितने बड़े हो गए हो, इसका अंदाज़ा नहीं है न उन्हें.” अनुभा ने फोन का रिसीवर अपने हाथ में ले लिया, “पापा, मम्मी तो स्वेटर उधेड़ कर बुन रही है, मैंने तो रिश्ते उधेड़ दिए हैं, उन्हें बुनने में मेरा साथ नहीं देंगे आप?” दीनानाथ जी ने फोन नीचे रखा, पर वो कटा नहीं था. उनकी उल्लास भरी आवाज़ आ रही थी.
“स्नेहा कल सुबह की गाड़ी से जाएंगे. रुक्मणी देख लेना अनुभा के घर पहली बार जा रहे हैं, शगुन की तैयारी में कोई कमी न रह जाए.” दोनों तरफ़ छलका उल्लास मन की आंखों से देखा और महसूस किया जा सकता था. जॉय ऑफ गिविंग की सार्थकता को अनुभा ने आज जाना था. सच कहा था गिरीश ने कि ‘मन दर्पण की तरह होता
है उस ओर आने वाली ख़ुशियों का प्रकाश भेजने वाले को भी नूर से भर देता है.’ अनुभा द्वारा मम्मी-पापा की ओर भेजी ख़ुशी प्रतिबिंबित होकर उसके मन को भी ख़ुशियों के उजाले से भर गए. दोनों तरफ़ आह्लादित दिलों की उमंगों से ख़ुशियां छलक रही थीं.
– मीनू त्रिपाठी

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