लघुकथा- ख़तरों का सामना (Short S...

लघुकथा- ख़तरों का सामना (Short Story- Khatron Ka Samna)

घर के भीतरवाला पौधा देखते ही उसने ख़ुश होकर कहा, “देखो दादू, यह कितना हरा-भरा खड़ा है. मैंने कहा था न कि भीतर लगाना बेहतर है. यहां सब ख़तरों से बचा रहेगा.”

एक बालक छुट्टियां बिताने अपने दादा के पास गया. दादाजी सरल स्वभाव के थे, परन्तु उनका व्यावहारिक ज्ञान उम्दा था और बालक को उनका साथ अच्छा लगता था.
एक दिन दादाजी एक ही क़िस्म के दो पौधे लाए. उन्होंने पोते से पूछा कि वह कहां लगाना चाहता है?
पोते ने पौधे को घर के भीतर लगा दिया और बोला, “यहां वह सब ख़तरों से बचा हुआ सुरक्षित रहेगा.”
दादाजी मुस्कुरा दिए, पर बोले कुछ नहीं.
उसी क़िस्म के दूसरे पौधे को उन्होंने घर के बाहर रोप दिया.
बालक को अपने लगाए पौधे को देखने की उत्सुकता बनी हुई थी, अत: अवसर मिलते ही वह कुछ वर्ष पश्चात फिर से अपने दादू के पास गांव गया.


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घर के भीतरवाला पौधा देखते ही उसने ख़ुश होकर कहा, “देखो दादू, यह कितना हरा-भरा खड़ा है. मैंने कहा था न कि भीतर लगाना बेहतर है. यहां सब ख़तरों से बचा रहेगा.”
तब दादू उसे बाहर ले गए और अपना रोपा पौधा दिखाया, जो अब बड़ा-सा वृक्ष बन चुका था.
“ख़तरों से जूझकर ही सफलता मिलती है- व्यक्ति हो या वृक्ष.” उन्होंने कहा.
अतः ख़तरों से डरे नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करें.
वह आपको और मज़बूत बनाते है.

उषा वधवा

Short Story


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