कहानी- मां का कमरा (Short Story- Maa Ka Kamra)

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आजकल मां को अपने पुराने घर की बहुत याद आती है. वह घर पुराना था, असुविधाजनक था, परंतु वह उनका अपना घर था. आंगन में रोपी वह मोगरे की बेल, अपने आप उग आया वह नीम का पेड़ उनका अपना था. यहां तो बालकनी में उनके स्वयं के लगाए पौधे भी उनके अपने नहीं. जब वे स्वयं ही यहां मेहमान हैं तो यहां की कोई वस्तु उनकी कैसे हो सकती है?

“चलो मां कार में तुम्हारा सामान रख दिया है.” जितनी देर मुझे मां को कार तक ले जाने में लगी, वह तीन बार पूछ चुकीं, “पर मैं तुम्हारे घर क्यों जा रही हूं?”
कार में बैठते ही मां ने हैरान होते हुए कहा, “इतना सारा सामान? बुधवार को तो मुझे वापस आना ही है. चंद्रप्रभा के घर सत्यनारायण की कथा है और मुझे सुबह ही जाकर प्रसाद बनाने में उसकी मदद करनी है.”
मां का मन शांत करने के लिए मैंने कहा, “सामान रखने में क्या हर्ज़ है मां. कार में ही तो जाना है. वहां किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ गई तो?” कार में बैठी मां परेशान-सी रहीं. उन्हें यह आभास हो गया था कि कोई बात उनसे छुपाई जा रही है.
उनका ध्यान बंटाने के लिए मैंने चन्द्रा मौसी का ज़िक्र छेड़ दिया. हमारे घर से चार मकान छोड़कर रहती हैं वह. दोनों में बहनों-सा स्नेह है, तभी तो हम उन्हें चन्द्रा मौसी कहकर बुलाते हैं. “वैसे ही करवा रही हैं सत्यनारायण की कथा या कुछ विशेष अवसर है?” मैंने मां से पूछा.
“उन्हें इस घर में आए पच्चीस वर्ष हो गए, इसीलिए करवा रही हैं. हमसे दो वर्ष पहले आए थे वे लोग. हमारा मकान बनते व़क्त बहुत सहारा रहा उनका.
चन्द्रा मौसी का ज़िक्र छिड़ते ही वह पुरानी यादों में खो गईं. “गांव की ज़मीन बेचकर यह प्लॉट तो ख़रीद लिया था हमने, पर मकान बनवाने के पैसे कहां से आते? एक जन कमानेवाला. पांच जन का अपना परिवार पाला, साथ में दोनों छोटी बुआओं का विवाह भी किया. तुम्हारे दादा-दादी को भी हर महीने पैसे भेजने होते थे. तबादलेवाली नौकरी थी और उन्हें अपने घर रहना ही अच्छा लगता था. रिश्तेदारी भी पूरी निभाई. किसी तरह थोड़ा धन जमा किया और यह मकान बनवाना शुरू किया. जीवन बीमावालों से कर्ज़ लिया था, फिर भी अंत तक आते-आते गहने बेचने पड़े, नहीं तो मकान बीच में ही रुक जाता. एक दिन घर में आटा नहीं था रोटी बनाने को. इसी चन्द्रा से मांगने गई, तो उसने मुझे ज़बर्दस्ती एक के बदले दोे व़क्त का आटा दे दिया. साथ में दाल भी. यह बात तुम्हारे पिता को भी मैंने नहीं बताई. दुख होता उन्हें यह सोचकर कि वह परिवार की ज़रूरत पूरी करने में असफल रहे, जबकि मैं जानती हूं कितने मेहनती थे वह.
कड़ी मेहनत की हम सबने इस मकान को बनवाने में. नई कॉलोनी थी और अभी नल की पाइप नहीं बिछी थी. हैंडपंप से पानी निकालना होता था. मज़दूर दिन के बीस रुपए मांगता, तो वह बचाने के लिए हम ख़ुदबारी-बारी हैंडपंप चलाते थे. तुम्हें तो याद भी होगा. भोलू-बबलू भी खेल-खेल में काफ़ी पानी निकाल देते.”
पिछली बातें याद करने पर मां उनमें पूरी तरह खो जाती हैं और एक के बाद एक याद करने लगती हैं. “आज ईश्‍वर का दिया सब कुछ है, पर तुम्हारे पापा तो अभावों में ही चले गए. मकान के कर्ज़े उतरे तो बच्चों की ऊंची पढ़ाइयां, शादी-ब्याह. अपने लिए तो जी ही नहीं पाए वह. दिन फिरने लगे, तो बीमारी ने आ घेरा और लेकर ही गई. अभी तो सुख भोगने का समय आया था. तसल्ली है कि तुम्हारा विवाह कर गए. बहुओं को आशीष दे गए. मैंने तो सब देख लिया. अब तो बस एक ही इच्छा बाकी है, इसी घर में अपने बिस्तर पर प्राण निकले.”
नहीं बता पाई तुरंत कि उनकी यह इच्छा अब पूरी नहीं होनेवाली. मकान तो बिक चुका है. बिल्डर ने ख़रीदा है. इसे पूरा तोड़कर फ्लैट बनाकर बेचने हैं उसे. सो चुपचाप बैठक में ही सौदा हो गया और मां को ख़बर भी नहीं लगी. मां को अपने घर लाने के दो कारण थे. एक तो यह कि पीछे से भाई मकान शिफ्ट कर लें. ‘मां के सामने घर खाली करने में जाने उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी’ यह सोचकर डरते थे. दूसरी बात यह कि मां को अपने घर लाकर मुझे उन्हें धीरे-धीरे राज़ी करवाना था, ताकि उन्हें झटका न लगे और यह ज़िम्मेदारी मैंने स्वयं उठाई थी.

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मेरे छोटे दोनों भाई जुड़वां थे- भोलू और बबलू. बाकायदा नाम थे उनके- सार्थक और ओजस, परंतु मां और मेरे लिए वे जीवनभर भोलू और बबलू ही बने रहे. भोलू बड़ा होकर फौज में चला गया और उससे दस मिनट छोटा बबलू बैंक अधिकारी बन गया. भोलू तो अक्सर ही अलग-अलग जगह पर भेजा जाता. मां को इस तरह का जीवन पसंद नहीं था. बहुत कहने पर वह एक-दो बार भोलू के घर गई थीं. पापा की नौकरी में बहुत जगह घूमी थीं. अब न वह उत्साह बचा था, न हिम्मत. सभी रिश्तेदार भी इसी शहर में अथवा आसपास थे. अतः उनका यही आग्रह रहता कि भोलू ही छुट्टियों में परिवार के साथ आकर सब को मिल जाए.
अभी तक तो जहां भी भोलू का तबादला होता, उसे फर्नीचर के साथ सुसज्जित घर मिलता था. पर एक दिन तो उसे कहीं अपना ठिकाना बनाना ही था. सो उसने पूना में अपने लिए फ्लैट बुक करा लिया. पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो उसने सुझाव रखा कि यह पुराना मकान बेचकर दोनों भाई अपना अलग-अलग फ्लैट ख़रीद लें. हो सकता है कि उसके मन के भीतर कहीं यह बात रही हो कि बबलू के परिवार के वहां रहने से कहीं पूरा मकान उन्हीं का ही न हो जाए. ख़ैर, उसके मन की बात तो वही जाने, पर देखा जाए तो मकान बेचने में कोई हर्ज़ भी नहीं था. मकान बहुत पुराने ढंग का बना हुआ था. रसोईघर बाहर आंगन में और आंगन के दूसरे कोने में स्नानघर और शौचालय.
आजकल इतने सुविधाजनक घर बन रहे थे. बाथरूम, रसोई सब कमरों से जुड़े हुए. एसी चलाकर पूरा घर ठंडा कर लो और कहीं जाना हो, तो एक ही किवाड़ बंद करने से पूरा घर बंद हो जाता है. पहले की दीवारें मोटी-मोटी बनी हुई थीं, अब बीम डालकर पार्टिशन बना देते हैं, ताकि कमरे बड़े हो जाएं.
पर मां का दिल भी कोई नहीं दुखाना चाहता था. अतः यही तय हुआ कि मैं उन्हें घर ले जाकर थोड़ा-थोड़ा करके बताऊं. मैं नए बन रहे सुविधाओं से परिपूर्ण मकानों की चर्चा छेड़ देती. अपनी दो सहेलियों के घर बहाने से ले जाकर उनके नए फ्लैट भी दिखाए. उनकी ख़ूबियां गिनवाईर्ं. आख़िरकार इस बात के लिए राज़ी करवा लिया कि पुराना मकान बेचकर दोनों भाई अपना-अपना फ्लैट ले लें.
मैंने तुरंत यह बताने की ज़रूरत नहीं समझी कि मकान बिक चुका है और दोनों ने अपने लिए नए फ्लैट भी चुन लिए हैं. सदैव की भांति मां ने अपने बच्चों की ख़ुशी को अपनी इच्छा के ऊपर रखा था. पुराने दिन याद करती हूं, तो ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता कभी वह क्षण जब मां ने अपनी इच्छा को परिवार से ऊपर स्थान दिया हो. और परिवार से मेरा मतलब स़िर्फ हम भाई-बहनों से नहीं है. बुआ आई हैं, तो अपने लिए ली हुई साड़ी भी उठाकर दे दी.‘बेटी खाली हाथ थोड़े ही जाएगी.’ आप सोचोगे उनके पास आलमारी भर कपड़े होंगे, जबकि बाहर पहनने के लिए कोई ढंग की साड़ी न होने पर पिछले माह यही साड़ी ज़बर्दस्ती दिलवाई थी. सेवइयां बनाने की नई मशीन पड़ोसवाली आंटी को पसंद आई तो ‘पहले आप बना लो मैं तो बाद में बना लूंगी’ कहकर पकड़ा देतीं, पर मकान बेचना और बात थी. उसकी हामी भरने के लिए मां ने जी कितना कड़ा किया होगा यह मैं समझ सकती थी, पर इसके अलावा चारा ही क्या था?
भैया-भाभी नए घर में सामान लगा चुके और फोन किया कि मां को ले आऊं. मैंने मां को अपने नए घर में जाने के लिए उत्साहित किया. वह जाने को तैयार बैठी थीं. वह आज भी बेटी के घर में रहने में असहज महसूस करती थीं और पहली बार वह मेरे घर इतने दिन रुकी थीं अथवा कहूं कि किसी न किसी बहाने मैंने उन्हें रोके रखा था.

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एक पॉश कॉलोनी में नई बनी बिल्डिंग की पहली मंज़िल पर बढ़िया बना फ्लैट है बबलू का. लिफ्ट भी लगी है. मैं तो एक बार पहले भी चक्कर मार गई हूं. पर अब फर्नीचर सेट हो जाने से और पर्दे लग जाने से उसकी शक्ल ही बदल गई है और वह घर लगने लगा है. मां का सामान सामने की तरफ़ बने खुले हवादार कमरे में रखा गया है. आगे एक छोटी-सी बालकनी भी है. बाथरूम साथ जुड़ा है, सो ठंडी-गर्मी में आधी रात बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. डबल बेड है और दो बड़ी अलमारियां. एक में भाभी ने बेड कवर, तौलिया इत्यादि सामान रखा हुआ है, दूसरी में मैंने मां के कपड़े लगा दिए हैं. एक ड्रेसिंग टेबल भी है. “मां होटल का कमरा मिल गया है तुम्हें, तो मज़े से रहो.” मैंने मां को छेड़ते हुए कहा. “ड्रॉइंगरूम से जुड़ा होने के कारण आने-जानेवालों की रौनक़ भी रहेगी.”
शाम को बबलू के एक सहयोगी उसके साथ ही घर आए हैं. उनका भी फ्लैट ख़रीदने का इरादा है, जिसके लिए वह सर्वे कर रहे हैं. शशि भाभी घूम-घूम कर उन्हें अपना नया घर दिखा रही हैं. हम भी उनकी प्रसन्नता से प्रसन्न हैं. “एक कमरा शशि-बबलू का, बेटे-बेटी का अलग-अलग कमरा और यह एक गेस्ट रूम भी है.” भाभी ने मां के कमरे की ओर बढ़ते हए कहा.
गेस्टरूम? मुझे कुछ अटपटा-सा लगा. मेरे दिमाग़ में तो वह मां का कमरा ही है.
ख़ैर, मां अपने कमरे से ख़ुश हैं. कमरे की बालकनी से नीचे काफ़ी हरियाली दिखाई देती है और बालकनी में भी बहुत से गमले रख लिए हैं उन्होंने.
दो-ढाई महीने बीतते कि मां का टेलिफोन आया. वह पूना जा रही हैं भोलू के पास उससे मिलने. मां को इस उम्र में सफ़र करना मुश्किल लगता है, परंतु भोलू ने सब इंतज़ाम कर दिया है. सामान बंधने से लेकर स्टेशन ले जाने का काम भोलू का अर्दली मुस्तैदी से कर रहा है और मां का हाथ पकड़कर बड़े ध्यान से उन्हें ले गया है. मां ने भी मन को समझा लिया है कि एक बार भोलू का नया घर भी देख ही आऊं. छह महीने बाद लौटीं, तो बहुत ख़ुश थीं. साफ़-सुथरा शहर, बढ़िया मौसम. यहां आकर तो ठंड के मारे बुरा हाल था. उस पर सूर्य नारायण हफ़्तों बिस्तर में दुबके रहते. कपड़ों की अटैची खोली, तो पाया शॉल और स्वेटर तो वहीं रह गए हैं. यूं तो पता था पूना में ऐसी ठंडी नहीं पड़ती, परंतु सोचा ज़रूरत पड़ गई तो? एक स्वेटर और शॉल रखने में क्या हर्ज़ है. वहां मां ने दोनों सबसे ऊपरवाली शेल्फ में रख दिए और छूट गए. गर्म कपड़े तो और भी हैं ‘पर शॉल मुलायम-सी थी. वह स्वेटर भी सब कपड़ों के साथ चल जाता था.’ मां अक्सर दोहरातीं. आ भी जाएंगे, परंतु ज़रूरत तो अभी है न!
भोलू-बबलू ने यह तय किया था कि मां अपने दोनों बेटों के पास छह-छह महीने रहेंगी. मां के जाने के बाद मुझे बताया था बबलू ने. तब तो मुझे भी लगा कि चलो अच्छा है घूमने-फिरने से मां का मन बहला रहेगा. और भोलू का अर्दली ऐसा ध्यान रखता है कि घर का सदस्य भी न रख पाए. पापा की नौकरी में भी वह अनेक जगह रही हैं, कई शहर बदले हैं. पर मां को अब सफ़र करना मुश्किल लगने लगा था. शायद एक उम्र होती है, जिसमें घूमना-फिरना अच्छा लगता है, क्योंकि तब मन में उत्साह होता है, नई जगह देखने की ललक होती है एवं नई चुनौतियों का मुक़ाबला करने का भी एक आनंद होता है.

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छह महीने देखते-देखते बीत जाते. और मां को बबलू के पास लौटते ही लगता कि वह तो यहां मेहमान हैं और छह महीने बाद तो फिर उन्हें जाना है. नए घर में मां की मैत्री आसपास के बहुत कम लोगों से ही हो पाई है. पुराने घर की बात और थी. सभी जानते थे उन्हें वहां. बाद में बहुएं बनकर आई थीं, वे भी मां के साथ हिल-मिल गई थीं. कोई स्वेटर बनाते-बनाते कंधा अथवा गला घटाने का हिसाब पूछने आ जाती, तो कई मां से उनके जैसी कढ़ी सीखने. यहां मां को यह घर ही अपना नहीं लगता, तो आसपास के लोगों से अपनत्व कैसे महसूस हो? वह पुराना घर उनका अपना घर था. हालांकि उन्होंने कभी भी वहां बेटे अथवा उसके परिवार को मेहमान नहीं माना था, परंतु इस घर में वह स्पष्टतः मेहमान ही हैं. घर तो उनके बेटे-बहू का है.
आजकल मां को अपने पुराने घर की बहुत याद आती है. वह घर पुराना था, असुविधाजनक था, परंतु वह उनका अपना घर था. आंगन में रोपी वह मोगरे की बेल, अपने आप उग आया वह नीम का पेड़ उनका अपना था. यहां तो बालकनी में उनके स्वयं के लगाए पौधे भी उनके अपने नहीं. जब वे स्वयं ही यहां मेहमान हैं, तो यहां की कोई वस्तु उनकी कैसे हो सकती है?

 

         उषा वधवा

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