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कहानी- मात (Short Story- Maat)

दिव्या ने देखा घूंघट उलटते ही मम्मी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. नज़र भर अर्पिता को देखकर वे झट भीड़ की ओट में हो गईं. लोगों की प्रतिक्रियाएं सुनते-सुनते वे धीरे से कमरे के बाहर निकल गईं. सम्भवतः यह घर की पहली शादी थी, जिसमें किसी का ध्यान उन पर नहीं गया था.

मम्मी की नारंगी साड़ी देखकर दिव्या का मूड उखड़ गया. उसका फूला मुंह देखकर मम्मी ने पूछा, "अब तुम्हें क्या हो गया?"

"आपको दूसरी कोई साड़ी नहीं मिली क्या?"

"उनमें प्रेस नहीं है और अभी रसोई में इतना काम है कि मेरे पास प्रेस का समय भी नहीं बचा, लेकिन इस साड़ी में ख़राबी क्या है?"

"बहुत गहरा रंग है, अजीब लगेगा."

"यह तुम्हारा भ्रम है, मुझ पर यह रंग फबता है." मम्मी ने आंचल ठीक किया, अंतिम बार आईने में स्वयं को देखकर वे रसोई में चली गई, दिव्या वार्डरोब खोलकर खुद के लिए एक ड्रेस के चुनाव में असमंजस में खड़ी रही. अंततः निराश होकर वहीं बैठ गई, मम्मी ने ठीक ही कहा था, उस साड़ी में वे अपूर्व सुंदरी लग रहीं थी.

पता नहीं उसे क्या होता जा रहा था, जैसे-जैसे वह बड़ी हो रही थी उसे मम्मी के सजने-संवरने से चिढ़ होने लगी थी, कुछ वर्ष पहले तक ऐसा नहीं था, उसे याद है, जब वह नन्हीं सी थी कहीं भी जाने आने पर लोग हमेशा मम्मी के पहरावे और चेहरे की प्रशंसा पर एकाध जुमला बोल ही देते थे, उसे बहुत गर्व होता, लगता कि उसकी अपनी मम्मी जो उसके लिए सहन, सुलभव स्नेहपूर्ण हैं वे दूसरों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.

मम्मी बहुत लम्बी, गोरी, पतली और तीखे नाक-नक्श की स्वामिनी थीं, वे अत्यंत सलीकेमंद थी. साड़ी, सलवार-कमीज सभी पहराये में उनके व्यक्तित्व की एक छाप थी, वे सिंथेटिक या पतले, झलकते कपड़े कम पहनती थी, उनकी आलमारियां टसर, ढाकाई, कटकी, मणिपुरी, जामदानी तांत आदि साड़ियों से भरी रहती. घर पर पहनने वाले कपड़े भी अन्य गृहिणियों की तरह रंग उड़े, तुड़े-मुडे नहीं होते थे, घर पर भी उन्हें कोई भी देखकर उनकी सुरुचिपूर्णता की तारीफ़ करता. दिव्या अक्सर अपनी सहेलियों को घर पर ले आती थी, जिनका मम्मी स्वादिष्ट व्यंजन से सत्कार करतीं. उनकी कर्णप्रिय, स्नेहपूर्ण वाणी उसकी सहेलियों को बहुत अच्छी लगती, दिव्या उनकी खुशी देखकर स्वयं भी ख़ूब प्रसन्न होती. उसने मम्मी को अपना आदर्श बना लिया, उन्हीं की तरह चलने-फिरने व बोलने का अभ्यास करने लगी.

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धीरे धीरे बाल्यावस्या की सीमा पार करके वह किशोरावस्था में पदार्पण करने लगी, उसकी रूचियों, शौक़ तथा विचारों में परिवर्तन होने लगा, उसे कभी-कभी अफ़सोस होता कि मम्मी उसके लिए हमेशा हल्के रंग के परिधान क्यों ख़रीदती हैं, जबकि वह स्वयं उन्हीं की तरह गहरे रंग के परिधान पहनना चाहती थी, जल्दी ही उसे समझ में आ गया कि वह अपेक्षाकृत सा़वले रंग की है.

अपने ननिहाल मसूरी जाने पर वह एक और कटु सत्य से अवगत हुई, वहां सबकी ज़ुबान पर एक ही बात थी, "तानिया! तेरी लड़की तो एकदम जमाई बाबू पर गई है, तेरा रंच मात्र भी प्रभाव नहीं है उस पर."

मम्मी मुस्कुराकर रह गई, उन्होंने कुछ नहीं कहा, उसे एहसास हो गया कि वह पापा की तरह दिखती है और लाख कोशिश करके भी मम्मी जैसी नहीं बन सकती.

पापा के ऑफिस के किसी उच्च अधिकारी के विवाह वार्षिकी पर आयोजित समारोह में मम्मी ने चेरी रंग की साड़ी पहनी थी, उनका रूप दप-दप दमक रहा था, वाह सबके द्वारा सराही जा रहीं थी, "श्रीमती मल्होत्रा। आपके लड़के से तो मिल चुकी हूं पर लड़की कहां है आपकी?" उच्च अधिकारी की पत्नी ने पूछा.

"यह तो है." मम्मी ने उसे आगे किया,

"अच्छा यह है, किंतु आप यदि परिचय न करवाएं तो कोई नहीं पहचान सकता कि यह आपकी लड़की है."

"हां, शक्ल-सूरत में यह 'उनकी' तरह दिखती है. पढ़ाई में बहुत तेज़ है और अपने स्कूल की वॉलीबॉल चैम्पियन भी है." मम्मी ने बात बदलनी चाही.

"आप इसे किसी स्लिमिंग सेंटर में क्यों नहीं भेज देतीं. लड़कियों को इस उम्र में शरीर पर नियंत्रण रखना शुरू कर देना चाहिए."

दिव्या कटकर रह गई, उसे बड़ी कोफ्त हुई. आजकल लोग बिन मांगे जाने क्यों सलाह देने लगते हैं, किसी ने उनसे पूछा था कि वह सुंदर लगने के लिए क्या करें, वह तो खुद ही घर में झाडू-पोछा लगाती थी, नियमित वॉलीबॉल अभ्यास के लिए स्टेडियम जाती तब भी यदि वह मम्मी जैसी तन्वंगी नहीं होती तो क्या करे. उस दिन पहली बार उसे मम्मी से ईष्यों हुई.

रचित भइया अपेक्षाकृत मुखर स्वभाव के थे, किंतु वह जैसे-जैसे बड़ी होती गई अंतर्मुखी स्वभाव की होती गई, जबकि पढ़ाई, खेलकूद एवं विद्यालय के अन्य सभी कार्यों में वह अराणी थी, इसका दायित्व भी वह मम्मी पर ही डालती थी. धीरे-धीरे उसके स्वभाव में परिवर्तन आता जा रहा था, जिस काम को वह एक बार कहने पर कर देती थी उसी काम को वह कई बार कहने पर भी नहीं करती, हर बात के लिए उसे टोकना पड़ता. उसे लगता, जब सौंदर्य ही सब कुछ होता है लोगों के लिए और गुणों का कोई मूल्य ही नहीं है तब गुणवती होकर होगा क्या, हर स्थान पर मम्मी से तुलनात्मक विवेचन होगा और उसे हीन सिद्ध किया जाएगा.

जिस वर्ष उसने ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश किया उसके कॉलेज में गणित के नए प्राध्यापक का आगमन हुआ. उनके भव्य व्यक्तित्व ने छात्राओं पर विशेष प्रभाव डाला. हर कोई अपनी तरह से उनको आकर्षित करने की चेष्टा करता, दिव्या को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि वे उस पर अधिक ध्यान देते हैं, गणित में उसकी विशेष योग्यता व रुचि से वे अत्यधिक प्रभावित हुए. छात्राओं की छोटी-मोटी गणित सम्बंधी समस्याओं को सुलझाने का दायित्व भी उन्होंने दिव्या पर डाल दिया.

छात्राएं प्रतियोगिता से हंट गई और सभी ने उदार हृदय से 'दिव्या सर की चहेती' मान कर हथियार डाल दिए. माणिक सर ने दिव्या के जीवन में एक नया रंग भर दिया था. उसका खोया आत्मविश्वास, उमंग, आशाएं लौटने लगीं. वह एक अलग ही दुनिया में जीने लगी, एकांगी स्वभाव में बदलाव आया, चिड़चिड़ाने की आदत कम हो गई, बोलचाल में मधुरता जा गई. घर पर भी वह अक्सर 'माणिक सर-माणिक सर' रहने लगी, रचित उसकी अपेक्षा गणित में कमजोर था, उसने एक दिन कहा, "यदि मैं तेरे कन्या विद्यालय में होता तो मेरे भी प्रतिशत बढ़ जाते."

"यह तुम्हारा दुर्भाग्य है भइया!" दिव्या ने कहा.

"लेकिन यही स्थिति रही तो तुम्हारा पास होना मुश्किल होगा रचित." पापा ने कहा

"भइया को माणिक सर की ट्यूशन कर लेनी चाहिए." दिव्या ने मज़ाक में कहा.

"तुम ठीक कहती हो, तरा अपने सर से बात करो." पापा ने उसके सुझाव को गम्भीरता से लिया.

"मेरी बात वह कभी नहीं टालेंगे, दिव्या की गवोंक्ति थी, दिव्या ने ठीक ही कहा था, माणिक सर रचित की ट्यूशन के लिए तैयार हो गए.

शाम के समय नीली कमीज़ और जीन्स पहने माणिक सर ने प्रवेश किया, दिव्या ने आह्वादित होकर उनका स्वागत किया, सर ने रचित से उसकी बहुत प्रशंसा की, दिव्या गदगद हो गई. सर ने रचित की समस्याएं सुनी और उसे कुछ मिनट का प्रारम्भिक संभाषण दिया, दिव्या वहीं मंत्रमुग्ध-सी बैठी थी, तभी मम्मी ने नाश्ते की ट्रे के साथ वहां प्रवेश किया. सर की आंखें जो उठीं, तो दृष्टि नीचे करने की सभ्यता भी वे भूल गए. मम्मी द्वारा अभिवादन करने पर उनका ध्यान भंग हुआ और हड़बड़ा कर उन्होंने प्रत्युत्तर दिया.

दिव्या ने शंकित निगाहों से मम्मी को देखा. रूप की उस छटा ने माणिक सर को विस्मित कर दिया था. "यह मेरी मम्मी हैं." दिव्या ने उनके सम्मोहन को दूर करने का प्रयास किया.

"तुम्हारी मम्मी! नहीं तो." सर की आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गई.

मम्मी ने आदतन अपनी प्रशंसा को मुस्कुराकर स्वीकार कर लिया, किंतु दिव्या का मन जाने क्यों कड़वा हो गया.

"मैं चलूं, आप इन्हें पढाइए." मम्मी चलने को उद्यत हुई.

"नहीं, बैठिए न, मैं इन्हें पढ़ा चुका हूं." मम्मी के उठने पर सर जैसे व्याकुल हो गए. मम्मी सामने बैठ गई, माणिक सर उनसे उनके बारे में सबाल करते रहे बीच-बीच में लिखते हुए रचित को भी वे कुछ निर्देश देते रहते, दिव्या ने अनुभव किया, सर मम्मी को लगातार देखने का लोभसंवरण नहीं कर पा रहे हैं. उस शाम लौटते समय माणिक सर उसे माणिक सर 'जैसे' नहीं लगे, वे चले गए, दिव्या के मन में अवसाद छोड़कर. उनके द्वारा किए गए क्रिया-कलापों से दिव्या के इस विचार को लगातार बल मिलता रहा कि वे मम्मी से अत्यधिक प्रभावित हैं. विद्यालय में सर उसके प्रति पूर्ववत् अनुराग-भाव रखते रहे किंतु दिव्या को अब उनसे पहले जैसी प्रेरणा नहीं मिलती. माणिक सर और मम्मी अच्छे मित्र बन गए, वे दोनों अक्सर राजनीतिक, सामाजिक व साहित्यिक चर्चाएं करते, उनके विचारों में मतैक्य न था, अतः वार्तालाप में संतुलन व सामंजस्य रहता. बोलते समय मम्मी कितनी बुद्धिमती लगतीं, उनका स्वर धीर गम्भीर व ओजपूर्ण था, वे केवल सुंदर ही नहीं वरन् जहीन भी थीं. दिव्या मन-ही-मन इन बातों पर विचार करती, कभी उसे लगता कहीं माणिक सर और मम्मी में 'प्रेम' तो नहीं है, कभी उसे यह सब भ्रम लगता.

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दिव्या ने ख़ुद को अकेला महसूस किया. दुख और हताशा का अनुभव हुआ. शुरू में उसे अपनी सुंदरता से परेशान मम्मी पर तरस आया लेकिन बाद में उसे यह परेशानी 'बनाई' हुई लगी, क्योंकि आज भी मम्मी अपने सजने-संवरने पर उतना ही ध्यान देती थीं जितना पहले, बल्कि अब तो वे सौंदर्य प्रसाधन का उपयोग भी अधिक करती थीं और विभिन्न सौंदर्यगत उपचारों के लिए महीने में ब्यूटी पार्लर के कई चक्कर लगातीं,

किंतु घर के सभी सदस्यों की चिंता समाप्त हो गई, जब प्रदीप ने उसे पसंद कर लिया, मम्मी ने उत्साह से सारी तैयारियां की, एकमात्र पुत्री को सब कुछ दे देना चाहते थे पापा और मम्मी.

विवाह के अवसर पर दिव्या ब्यूटी पार्लर जाकर नववधू का श्रृंगार करा कर आई, तो सामने खड़ी मम्मी उसके लहंगे से ज़्यादा शोख, सिंदूरी रंग की बनारसी साड़ी पहने हुए थी. जेवरों से वे नख से शिख तक सजी थी, गहरे लाल रंग की लिपस्टिक, बिंदी, नेलपॉलिश में वे आग की लपट का आभास दे रही थीं. दिव्या की उमंगों पर एकबारगी जैसे किसी ने ठंडा पानी उंडेल दिया. मम्मी की रूप-ज्वाला में वह पिघल जाएगी. निश्चय ही प्रदीप उनके साथ तुलना करने पर विवश हो जाएगा और आज के महत्वपूर्णविन में भी वह दीन हो जाएगी. पूरे विवाह समारोह में आकर्षक युवतियां व किशोरियां थी किंतु मम्मी के सामने सब फीकी लग रही थीं.

दिव्या ने सोचा, आज के दिन कम से कम मम्मी को इतना श्रृंगार नहीं करना चाहिए था कि दिव्या पर किसी की नजर ही न जाए, विवाह की सभी रस्मों के दौरान वे दिव्या के साथ रहीं और प्रदीप की आंखों में उनके प्रति प्रशंसा-भाव देखकर दिव्या के मन में खिला कमल गुरझाता रहा, पता नहीं मम्मी कब वृच्छ होंगी, शायद कभी नहीं वह स्वयं बूढ़ी हो जाएगी किंतु मम्मी वैसी ही सदाबहार रहेंगी आजीवन.

दिव्या ने प्रदीप के साथ नई गृहस्थी की शुरुआत की. वैसे प्रथम रात में ही प्रदीप ने मम्मी की सुंदरता की ख़ूब तारीफ़ की और उससे उनकी तुलना भी की किंतु यह चर्चा का विषय मात्र घंटे भर का था. अगले कुछ घंटों में वे प्रणय निवेदन, समर्पण में आकंठ डूब गए फिर महीनों उन्हें मम्मी की याद नहीं आई.

के बीच में दिव्या कई बार मायके गई, मम्मी ने बड़े लाड़-प्यार से उनका स्वागत सत्कार किया, प्रदीप हर बार उनकी सुंदरता और नफ़ासत का मुरीद बन जाता. दिव्या से कहता वह मम्मी से कुछ सीखे और दिव्या तन-बदन में आग लग जाती.

आजीवन तो उसे मम्मी के समक्ष रखकर आंका गया, कम-से-कम पति तो मां से उसकी तुलना न करता. धीरे-धीरे उसके रुख से समझदार प्रदीप ने वस्तुस्थिति को जान लिया और मम्मी की प्रशंसा व उनसे उसकी तुलना बंद कर दी, दिव्या ने मायके जाना बहुत कम कर दिया,

लगभग छह-सात महीने बाद मम्मी ने दिव्या को पत्र द्वारा सूचित किया कि रचित की नौकरी लग गई है और वह दिल्ली चला गया है.

एक रात नौ बजे मम्मी ने फोन किया, "दिव्या रचित अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता है. तुम कुछ समझाओं न उसे. उसके लिए हमने बहुत अच्छी लड़की का चुनाव किया है, पूरे घर का दायित्व हंसते-हंसते उठा लेगी."

"आपने बात की रचित से?"

"वाह तो कुछ सुनने को भी तैयार नहीं है, तुम उसे फोन करके समझाओ, समझी?"

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फिर दिव्या ने उसी रात रचित को फोन किया. रचित ने बताया अर्पिता और वह एक ही क्षेत्र में कार्यरत हैं और तन-मन से एक दूसरे को प्यार करते हैं. अर्पिता जितनी सुंदर है उतनी ही धैर्यशील व बुद्धिमती भी है, उससे अच्छी लड़की उसे नहीं मिलेगी और वह उससे विवाह करने को दृढ़ प्रतिज्ञ है. यह सब सुनकर दिव्या ने मम्मी को समझाया कि जीवन उन दोनों को ही व्यतीत करना है और यदि उन्होंने एक-दूसरे को पसंद कर लिया है, तो वे लोग हस्तक्षेप करें और रचित की ख़ुशी के लिए त्याग करें, क्योंकि आत्मनिर्भर पुत्र मनमर्ज़ी का मालिक हो जाता है. अधिक दबाव पढ़ने पर सम्भवतः विद्रोह कर दे.

मम्मी ने उसकी बात मान ली, रचित अर्पिता का विवाह ख़ुशी-ख़ुशी सम्पन्न हो गया. बहू लेकर लौटी दिव्या के पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. मम्मी ने दिव्या को कभी इतना प्रसन्न नहीं देखा था. वे आरती का थाल लिए अगवानी को पहुंचीं. नववधू के लाल वस्त्रों में अर्पिता गठरी बनी हुई थी. आरती के बाद रचित के साथ ही वह कमरे में पहुंची. पूरा कमरा नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों से भरा था. सभी के सामने मम्मी ने वधू का घूंघट उलट दिया. एकबारगी जैसे वहां खड़े समस्त लोग स्तब्ध रह गए. वास्तव में अर्पिता किसी मध्य युगीन मूर्तिकार की काल्पनिक कृति सी लग रही थी. कश्मीरी सेब जैसा रंग, हिरन जैसी आंखें, पलकें इतनी घनेरी जो आंखें झुकाने पर कपोल तक झुकी आ रही थीं. सुतां नाक जिसकी कोरों पर पसीने की बूंदें होरे के समान चमक रही थीं. प्राकृतिक रूप से लाल पतले होंठ, तन्वंगी कंचन सी काया, नाज़ुक और इतनी चिकनी कि छू वो तो मैली हो जाने का भ्रम.

लोगों को प्रशंसा के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे, सभी ने मुक्त कंठ से रचित की पसंद को सराहा और वर-वधू को आशीर्वाद दिया. दिव्या ने देखा घूंघट उलटते ही मम्मी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. नज़र भर अर्पिता को देखकर वे झट भीड़ की ओट में हो गईं. लोगों की प्रतिक्रियाएं सुनते-सुनते वे धीरे से कमरे के बाहर निकल गई. सम्भवतः यह घर की पहली शादी थी, जिसमें किसी का ध्यान उन पर नहीं गया था और उनके सामने किसी अन्य को इतनी भरपूर प्रशंसा मिली.

दिव्या मम्मी के पीछे-पीछे बाहर आई. वे चुपचाप बाहर रखी चौकी पर बैठी थीं. हर परिस्थितियों में उनके चेहरे पर छाई रहने वाली स्वाभाविक मुस्कुराहट, आत्मविश्वास, माधुर्य, अभिमान, रौनक आज बरक़रार न थे. वे असंतुष्ट, व्यग्र, उद्विग्न व परेशान नज़र आ रही थीं. दिव्या को देखकर उन्होंने कहा, "रचित ने अपने मन की कर ली, मैंने उसके लिए बहुत अच्छी लड़की चुनी थी."

"अर्पिता भी तो कितनी सुंदर है मम्मी,"

"मुझे तो कोई ख़ास नहीं लगी." मम्मी ने कहा, दिव्या ने इस उत्तर पर चौंक कर उन्हें देखा. उनके चेहरे पर पराजय की उदासी थी, उसने मम्मी के मनोभाव को ताड़ लिया. सम्भवतः उसे मम्मी से सहानुभूति होनी चाहिए थी किंतु ऐसा नहीं हुआ, एक विचित्र शांति और संतोष का अनुभव हुआ उसे. वह स्थिर कदमों से मुस्कुराती हुई अंदर चली गई.

- सुश्री पमा मलिक

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