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कहानी- महत्वाकांक्षा (Short Story- Mahatvakanksha)

जाने कितने ख़्वाब देखे थे उसने ज़िंदगी को लेकर. लेकिन आज बच्चों को यूं ज़िद्दी तथा चिड़चिड़ा होते देखकर हताश हो उठी है वह. उसके तथा उसके ही भीतर स्थित संवेदनशील तथा कोमल हृदय की मां की भावनाओं के साथ अक्सर द्वन्द्व चलता रहता है.

नियुक्ति का पत्र हाथ में लिए वह ख़ुशी से पागल हुई जा रही थी. कितनी ही बार पढ़ा उसने पत्र को. क्या सचमुच यह नियुक्ति-पत्र ही है? सपना तो नहीं देख रही मैं? नहीं, यह सपना नहीं है. हक़ीक़त है. उसने घर के दरवाज़े खोल दिए, ठंडी हवा के झोंकें सुखद लग रहे थे. सामने खेलते हुए बच्चे, आकाश में उड़ते हुए पक्षी, सब कुछ प्रसन्नता तथा रोमांच से भरा लग रहा था. यकायक ही उसे अपना चेहरा, आंखें, चाल, बाल सब कुछ खिला-खिला, ख़ूबसूरत तथा आत्मविश्वास की चमक से चमकता हुआ लगने लगा.
अपनी पढ़ाई और डिग्री की सार्थकता आज जाकर सिद्ध हुई है. किसी सपने का साकार होना कितना सुख देता है आज अनुभव कर रही है वह. कब से इस घर में कुछ नहीं हुआ है, इसलिए नौकरी लगने की ख़ुशी में एक छोटा-सा आयोजन करना है. किस-किसको बुलाना है? किसको ख़ुशी होगी, किसको नहीं? इन चर्चाओं का कोई अन्त नहीं था.
"अब बच्चों का क्या करेंगे? कैसे रहेंगे? किसके पास छोड़ेंगे?" उसे बच्चों की चिन्ता सताने लगी.
"अम्मा को बुला लेंगे." पति ने सुझाव दिया.
"इतनी सी जगह में वे कैसे रह सकेंगी? फिर रवि के बच्चे भी तो छोटे-छोटे हैं."
"अब तो तुम्हें भी तनख़्वाह मिलेगी. अपना बड़ा-सा मकान ले लेंगे."
"हां, ये ठीक रहेगा."
"अब हम भी अपना फ्लैट बुक कर देंगे."
"उसके बाद किश्तों पर गाड़ी ले लेंगे. गाड़ी के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता. घूमना-फिरना स्कूटर पर चार-चार लोग जाते अच्छे भी नहीं लगते हैं. मेघना ने तो शायद इसीलिए अपने साथ बाहर जाना भी छोड़ दिया है."
सपनों और आकांक्षाओं ने अंगड़ाइयां लेनी शुरू कर दीं. इच्छाएं अनेक थीं, सपने बहुरंगी थे. इच्छाओं ने मन की गति को भी तीव्र कर दिया था. सपनों ने एक नए स्वप्न- लोक की सृष्टि कर दी थी. जीवन में सब कुछ पाने का उत्साह चरम पर था. बड़ी बेटी मेघना चौथी कक्षा में पढ़ रही थी. छोटा बेटा मात्र डेढ़ बरस का था. एक को रखने की परेशानी थी, तो दूसरे को संभालने की.

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"मेघना, कल से मैं ऑफिस जाऊंगी. स्कूल बस से उतरकर सीधे घर आना, किसी के साथ कहीं भी मत जाना. अब तुम्हें अकेले रहना होगा."
"नहीं, मैं अकेले नहीं रहूंगी? मुझे डर लगता है. आप क्यों जाओगी ऑफिस?"
"तुम्हारी ही तो ज़रूरतें हैं- बढ़िया खिलौने, सुन्दर बैग, साइकिल मैं सब कुछ दिला दूंगी."
"नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए." मेघना ठुनकने लगी.
"जब नहीं ला पाते थे, तो दूसरों से मांग-मांगकर खेलती थी. दूसरों की साइकिल छीनकर चलाती थी. तुम्हें ही तो बड़ा घर चाहिए था, जिसमें झूला हो." वह बेटी पर चीखने लगी.
"कोई घर-वर नहीं चाहिए. किसी का कोई घर-वर नहीं होता. घर तो सिर्फ़ मां का पेट होता है." चटाक… चटाक… उसने ज़ोर से थप्पड़ मार दिए, गोरे नाज़ुक कपोलों पर लम्बी उंगलियों के निशान उभरकर आ गए.
"उसको क्यों मार रही हो? उसे चीज़ों के लालच से नहीं, समझदारी से समझाओ."
"डायलॉग बाज़ी करने लग गई है. फिल्म, टीवी देखकर उसी तरह की भाषा बोलने लगी है. एक बात भी है, जो यह चुपचाप मान ले या सुन ले."
"मार लो, चाहे जितना मार लो, पर मैं अकेली नहीं रहूंगी. अत्याचार करती हो. अपने को ज़्यादा ही समझती हो." मेघना रोती हुई अन्दर के कमरे में बंद होकर बड़बड़ा रही थी.
"धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी." पति उसे सांत्वना देने लगा.
"औरों के भी तो बच्चे हैं, वे कैसे रहते हैं? मिसेज गुप्ता तो बाहर से ताला लगाकर जाती हैं."
"हम ऐसा नहीं कर सकते. उनके बच्चों ने शुरू से ही मां-बाप को नौकरी पर जाते हुए देखा है."
"पूरे दिन के लिए बाई रख लेते हैं."
फिर बड़े ज़ोर-शोर से बाई की तलाश आरम्भ हुई. छह सौ रुपए में वृद्धा बाई मिली.
सारी दिनचर्या बदल गई. सम्पूर्ण दिन घण्टों तथा मिनटों में बदल गया. शान्त, लम्बी तथा गहरी नींद सुलानेवाली रात्रि सिकुड़कर आधी रह गई. सोते-सोते ग्यारह-बारह बज जाते. सुबह पांच-साढ़े पांच बजे उठना पड़ता. मेघना का टिफ़िन, बच्चे का दूध, नाश्ता, नहाना-धोना… और देखते-देखते ऑफिस का टाइम हो जाता. उधर पति पूर्व की भांति आवाज़ें लगाते, "अनु, पानी निकाल देना."
"ख़ुद निकाल लो न."
"तौलिया कहां है?"
"ढूंढ़ नहीं सकते क्या? कपड़ों के बीच पड़ा होगा. थोड़ा पहले तैयार नहीं हो सकते थे." वह चिढ़कर कहती.
"तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?"
"मुझे तो फ़र्क़ पड़ता है ना."
शाम को जब ऑफिस से वापस आती, तो लगता ही नहीं कि अपने घर में बैठी हो. चारों तरफ़ खिलौने, बर्तन, कपड़े तथा किताबें फैली होती.
"बाई यह सब क्या है?" वह झुंझलाने लगती है.
"मैं क्या करूं मैडम, आपके बच्चे बहुत परेशान करते हैं. बेटा दिनभर रोता रहता है. बिटिया स्कूल से लौटते ही एक-एक चीज़ फैला देती है. दिनभर लड़ती रहती है. देखिए, मेरे कितने बाल खींच दिए दोनों ने मिलकर."
"मम्मी, मैं इस बाई के साथ नहीं रहूंगी. ये गन्दी है, चुड़ैल है. मारती है, चिकोटी काटती है. देखो, भइया को मारती है."
"क्यों बाई?"
"भरोसा नहीं है, तो दूसरी बाई ढूंढ़ लो." बाई धमकीभरे अंदाज़ में बोल उठती
"नहीं… नहीं…" वह हड़बड़ा जाती है. आया नहीं आएगी, तो आफिस कैसे जाएगी वह? छुट्टी ले नहीं सकती. नई-नई नौकरी है, ख़राब इम्प्रेशन पड़ेगा, फिर अभी तो प्रोबेशन पीरियड चल रहा है.
“देखो बेटा, बाई की बेइज़्ज़ती नहीं करते. उसके साथ तमीज़ से पेश आया करो."
"वह गंदी है. बदबू आती है इसके कपड़ों से. खाना छू लेती है. इधर आप कहती हो साबुन से हाथ धोकर पानी पिया करो, उधर बाई बिना हाथ धोए पानी भर लेती है, भगा दो उसे." मेघना बिना रुके बोलती चली जाती है.
"चुप रहो, बहुत ज़िद्दी हो गई हो. कितने घरों में बाइयां रहती हैं, उनके बच्चे कैसे रहते हैं? तुम बात को समझती क्यों नहीं?" उसने चिल्लाकर कहा.

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वह देख रही थी कि वह मेघना को जितना ख़ुश रखने की कोशिश करती है, मेघना उतनी ही उद्दण्ड तथा स्वच्छन्द होती जा रही है. लड़का भी बीमार बच्चे की तरह हर समय रोता रहता है. 'हे भगवान क्या नौकरी करके मैंने ग़लती की है, जो बच्चे यूं बिगड़ते जा रहे हैं. कोई अनुशासन नहीं रह गया है, संस्कार तो जैसे है ही नहीं. सब कुछ हाथों से छूटता जा रहा है.' वह गहरी हताशा तथा पीड़ा में डूब जाती, पर दूसरे ही पल यह भी ख़्याल आता है कि वह जीवन भी क्या था, नीरस… सपनों से महरूम, न कोई इच्छा, न आकांक्षा, आइसक्रीम खाना तक एक स्वप्न की तरह लगता था. नए-नए कैसेट सुनने के लिए खिड़कियां खोलकर खड़े होना पड़ता था. पत्रिकाएं लेने के लिए दूसरों का मुंह देखना पड़ता था. नई किताबें तो मुद्दत हुई ख़रीदे हुए. उसकी नौकरी लगने से कितना बदलाव आ गया घर व शौक में. नए परदे, नए कपड़े, छत पर गमलों में गुलाब लग गए हैं. तीन पत्रिकाओं के लिए चन्दा भेज दिया है. मनपसंद अख़बार आने लगे हैं. उसे सचमुच घृणा हो रही है पुरानी बदरंग चीज़ों से. नफ़रत है उसे ऐसी अभावपूर्ण ज़िंदगी से. वह स्वभाव से मस्त और नफ़ासतपूर्ण ज़िंदगी की कायल है. उसका हमेशा से ही मानना रहा है कि तिल-तिल करके घुटने से अच्छा है कि मेहनत करके पैसे कमाए जाएं और वहीं उसने किया भी था. पढ़ने-लिखने की उम्र से ही ज़िंदगी को एक मुक़ाम देने का सपना देखा करती थी वो. जाने कितने ख़्वाब देखे थे उसने ज़िंदगी को लेकर, लेकिन आज बच्चों को यूं ज़िद्दी तथा चिड़चिड़ा होते देखकर हताश हो उठी है वह. उसके तथा उसके ही भीतर स्थित संवेदनशील तथा कोमल हृदय की मां की भावनाओं के साथ अक्सर द्वन्द्व चलता रहता है, जो बच्चों के हर ख़्याल तथा भावना के साथ सरोकार रखती है, मन पछतावे से भर उठा- 'क्यों मारा बच्चों को? कहीं ऐसा तो नहीं, आया सचमुच बच्चों को मारती हो, उनका दूध भी पी जाती हो. मुझे बच्चों की बातें भी माननी चाहिए, अगर मैं ही उन पर विश्वास नहीं करूंगी, तो वे मुझ पर कैसे विश्वास करेंगे?"
"क्या करूं, बेटे को क्रेच में डाल दूं?"
"वहां भी तो वही हालत होगी."

"वहां कई बच्चे होंगे, वो लोग ठीक से रखती भी हैं…"
"और मेघना को?"
"उसको बोर्डिंग स्कूल में डाल देते हैं."
"फ़ायदा क्या है, जितना कमाएंगे उतना तो इसी सब में चला जाएगा."
"तो कमा किसके लिए रहे हैं?"
कई क्रेच देखे गए. एक क्रेच घर के पास में ही था. जब वे दोनों देखने गए, तो क्रेच साफ़-सुथरा था. कमरे में पलंग पड़ा था, कूलर रखा था. क्रेच चलाने वाली औरत जवान, सुन्दर, साफ़-सुथरी तथा हमेशा हंस-हंसकर बातें करनेवाली विधवा औरत, विमला थी. उसके दोनों बच्चे स्कूल जाते थे. उसके पास फ़िलहाल तीन बच्चे रहते थे. पति-पत्नी औरत के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुए. उन्हें राहत मिली कि 'चलो, बच्चा अच्छी जगह रहेगा, दूध की बॉटल, पानी की बॉटल, लन्च बॉक्स, कपड़े वगैरह रखकर जब वे सुबह बच्चे को छोड़ने जाते तो विमला दरवाज़े पर हंसती हुई मिलती. चन्दन का तिलक उसके चौड़े माथे की सुन्दरता को और बढ़ा देता था. लेकिन जैसे ही मां-बाप जाते विमला बच्चों को पलंग से नीचे उतार देती, "नीचे उतरो और चुपचाप खेलो. रोना नहीं, एकदम चुप रहो." उस समय विमला का हंसता हुआ चेहरा दहशत पैदा करनेवाला चेहरा बन जाता. गम्भीर आवाज़ सुनकर बच्चे सहम जाते. तीन बच्चे बड़े थे. यही बच्चा सबसे छोटा था. इस बच्चे के दूध की बोतल से वह दूध निकालकर चाय बना लेती. कूलर बन्द कर देती. बच्चे गर्मी के मारे बेहाल हो उठते. बच्चे को बिना कूलर के नींद नहीं आती थी, इसलिए गर्मी से बेहाल हो वह बाहर को भागता, "बाहर मत निकल, क्यों गया था? बोल, दुबारा जाएगा?" वह आंखें तरेरकर अपना रूप
बदल लेती, तब बच्चा ग़ुस्से में क्यारियों में लगे फूल तोड़ देता. तब तो जैसे उसकी शामत आ जाती, "क्यों तोड़ा फूल? फिर तोड़ेगा? दीदी बहुत मारेगी." बच्चा सांस रोककर सिसकियां दबाकर सहम जाता. डरकर पेंट में पेशाब कर देता और फिर डांट पड़ती, "चल उतार, गन्दा कहीं का." छुट्टी होते ही विमला के बच्चे घर आ जाते. तब तो उन दोनों की दादागिरी से वह भोला-भाला बच्चा और भी त्रस्त हो जाता.

"देखो मां, ये किताबें छू रहा है. चल हट यहां से, बदमाश कहीं का." लड़की बच्चे को जानवरों की तरह घसीटती हुई ले जाती, "मेरे फूल तोड़े थे, फिर तोड़ेगा… किताब फाड़ दी…" चट-चट गालों पर कितने ही थप्पड़ पड़ते चले जाते. "क्या करती है तू. निशान दिखेंगे, तो उसकी मां नहीं रखेगी. सब जगह बता देगी." विमला बच्चे के गालों पर मालिश करती. "गालों पर मत मार, डांट दिया कर."
शाम को जैसे ही माता-पिता के आने का वक़्त होता विमला बच्चे को तैयार कर देती, "यह सुस्त क्यों है? क्या बात है? बच्चों ने मारा तो नहीं. खाना तो ठीक से खाता है. दूध पीता है?" वह बच्चे को उदास देखकर चिंतित हो उठती.

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"हां-हां भाभी, पर रोता बहुत है. आदत नहीं है ना अभी इसलिए चुपचाप रहता है. मैं अपने हाथों से खाना खिलाती हूं, पर नहीं खाता."
"दिन में लाइट तो रहती है ना, उसे कूलर में सोने की आदत है."
"हां, कूलर तो दिनभर चलता है."
विमला के भोले-भाले चेहरे पर झूठ की लकीरें छुप जाती थीं. वह अपनी सयानी बातों से स्वयं को निर्दोष साबित कर देती थी. बच्चे के गिरते हुए स्वास्थ्य तथा सहमेपन से माता-पिता दोनों ही चिंतित थे. पर इसके अलावा कोई चारा नहीं था. लौटते वक़्त मेघना को लेने जाना पड़ता था. उसका होमवर्क देखने का भी वक़्त नहीं मिलता था. डायरी में हर रोज़ कोई-न-कोई रिमार्क लिखा आता. हर कॉपी में नोट लिखे थे. टीचर ने कई बार बुलाया था, पर डर के मारे मेघना ने बताया नहीं, वह पढ़ाई में अच्छी थी, लेकिन इस वर्ष काफ़ी पीछे हो गई. माता-पिता की सहूलियत के हिसाब से बच्चे यहां-वहां भटक रहे थे, जहां उनका एडजस्टमेंट नहीं हो पा रहा था.
"स्वयं पढ़ने की आदत डालो. क्या और बच्चों के मां-बाप नौकरी नहीं करते? वे भी तो क्लास में अच्छे रैंक लाते हैं. वे कैसे पढ़ते हैं? बात मानते हैं. अनुशासन में रहते हैं. अपना काम स्वयं करते हैं तुम लोग तो सिर्फ़ उद्दण्डता करते हो."
"हम अच्छा सा ट्यूटर लगा देते हैं."

"उससे क्या होगा?"
"हम लोग टाइम नहीं दे पाते हैं. इसीलिए यह पढ़ाई में पिछड़ रही है."
"चार-पांच सौ रुपए से कम न लगेंगे."
"देंगे, और क्या कर सकते हैं? बच्चों का भविष्य बर्बाद थोड़े न करना है."
"नौकरी से उतना नहीं आ रहा है, जितना ख़र्च हो रहा है."
यह मलाल उसके मन को व्यथित कर देता था.
लेकिन तनख़्वाह मिलने पर मनपसंद चीज़ें ख़रीदने का सुख इन तमाम परेशानियों को भुला देता था. किसी भी होटल या रेस्टोरेन्ट में दो घण्टे बैठकर खाना खाने में जो आनन्द मिलता है वह कहीं-न-कहीं एक संघर्षशील चेतना से उपजा आनंद होता है. अब बच्चों को, किसी को किसी चीज़ के लिए तरसना नहीं पड़ता है. जीवन में यह संतोष तो रहेगा कि बच्चों के लिए जो सोचा वह किया है. लेकिन पहले बच्चे को ज़ुकाम नहीं रहता था, पर अब चौबीसों घंटे नाक बहती रहती है. कई बार उसकी सांस फूलने लगती है. वह हमेशा डरा-सहमा रहता है. छोड़ते वक़्त मां को इतनी ज़ोर से पकड़ लेता है कि उसे छुड़ाना मुश्किल हो जाता है. ऑफिस जाते वक़्त या तो दरवाज़े को बाहर से बन्द कर देता है या फिर स्वयं कमरे में बंद हो जाता है. तब उसने दूसरा रास्ता निकाल लिया. सोते हुए बच्चे को चुपचाप छोड़कर चली जाती थी. जागने पर बच्चा आसपास मां को न पाकर दहाड़ मारकर रोने लगता. विमला आंखें निकालकर होंठ भींचकर उसे चुप कराती, तो उसकी घिग्गी बंध जाती. एक चेहरा जिसके बारे में वह कुछ भी नहीं कह पाता है, वह उसे 'भय तथा धमकी से डरा देता था. उसके आतंक से बच्चा अंदर-ही-अंदर लड़ता रहता है, पर ज़ुबान से कुछ नहीं कह पाता.
आज विमला के घर में पहली बार बच्चा हल्का-सा मुस्कुराया था. एक रंगीन डॉल को देखकर, यद्यपि बच्चे के पास हर तरह के अनगिनत खिलौने थे, मगर उस डॉल की मुस्कुराहट में कुछ ऐसा था कि बच्चा उसकी तरफ़ खिंचा चला गया. बच्चे ने डॉल उठा ली. पहले उसे डरते-डरते छुआ, फिर उसके साथ खेलने लगा. वेलवेट पेपर से बनी डॉल के कपड़े निकल गए, हाथ अलग हो गए. धड़ अलग हो गया. मगर बच्चे को इन्हीं सबके साथ खेलने में मज़ा आ रहा था. वह डॉल को जोड़ने की कोशिश करता, मगर डॉल तो कई हिस्सों में बंट चुकी थी. विमला की लड़की ने जब यह सब देखा तो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी. फिर बच्चे को घसीटकर बाहर ले गई. ज़मीन पर धक्का मारकर लिटा दिया. गाल पर थप्पड़ों के निशान आ जाते हैं, इसलिए पीठ पर कई मुक्के मार दिए. बाल इतनी ज़ोर से खींचे कि कुछ बाल उसकी उंगलियों में फंस गए.
"पागल, मार डालेगी क्या? मर जाएगा तो..? छोड़ दे." विमला ने लड़की को परे धकेला. इतनी मार तथा उठा-पटक के कारण बच्चा सांस साधकर रह गया, उसकी आंखें ऊपर चढ़ने लगीं.
"पानी ला, कुछ हो गया, तो सारे लोग अपने बच्चे वापस ले जाएंगे. वैसे भी वह कमज़ोर है. निशान तो नहीं आए पीठ पर? कूलर चला दे." बच्चे की सांस सामान्य नहीं हो पा रही थी. उसने पीठ थपथपायी… सिर पर हाथ फेरा, तब कहीं जाकर बच्चा सांस लेने की स्थिति में आ सका. अब उसने ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया. "क्या करूं मैं?" वह घबरा उठी. बाहर ले नहीं जा सकती थी. पड़ोसवालों को आवाज़ सुनाई देगी, तो वे पूछने लग जाएंगे. उन्होंने शिकायत कर दी तो? उसके हाथ-पांव फूलने लगे. कभी पानी पिलाती तो कभी दूध, तो कभी छाती से चिपकाकर पुचकारती. लेकिन बच्चा था कि चुप नहीं हो रहा था. और न जाने किस पल अधैर्य होकर उसने बच्चे को पलंग पर पटक दिया, "चुप हो जा मेरे दादा, बिल्कुल चुप… वरना मारूंगी मैं इस लकड़ी से, समझे." वह पूरी ताक़त से चिल्ला रही थी और बच्चा डर से थरथराता ख़ामोश होकर पलंग पर औंधा पड़ा था.
शाम को मां को देखते ही बच्चे की रुलाई फूट पड़ी, जैसे रोकर ही वह अपनी बात कह रहा हो.
"क्या बात है, क्या हो गया? यह इतना सुस्त क्यों है? इसे तो बुखार है. क्या गिर पड़ा था? झगड़ा तो नहीं हुआ किसी के साथ?" विमला घबरा गई, क्या जवाब दे.
"नहीं भाभी नहीं, खेलते वक़्त गिर गया था यह."
"कहां से? पलंग से? चोट तो नहीं लगी." उसने पीठ पर
हाथ फेरा तो बच्चा कराह उठा, अनदेखी चोट दर्द दे रही थी.
"यह क्या, किसने खींचे इसके बाल?" वह बिफरकर बोली, "इतने ज़ोर से बाल खींचे कि उसके बाल उखड़ गए हैं… मैं तुम्हारे भरोसे छोड़कर जाती हूं… मगर यहां तो बच्चा अनाथों की तरह पड़ा रहता है."
"आपस में लड़ रहे थे भाभी…" विमला हकलाते हुए रुआंसी होकर सफ़ाई देने लगी, उसे लगा, अब सारी बातें खुल जाएंगी. "मैंने सबको खूब डांट दिया है. कल से उसे अलग रखूंगी." विमला घिघयाते हुए बोली.
"तो क्या तुम भी बच्चों को मारती-डांटती हो?"
"नहीं भाभी… शैतानी करते हैं तो डांटना पड़ता है."
"चलो, देर हो रही है. बच्चों की बातों को लेकर इतना टेंशन नहीं करना चाहिए. बच्चे तो गिरते-पड़ते रहते हैं, वरना मज़बूत कैसे बनेंगे?" बच्चे का पिता… सहज ढंग से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं. विमला की आंखों में तैरते आंसू उसकी बातें सुनकर सूखने लगे. कोई तो है जो उसका पक्ष ले रहा है. बच्चा तीन-चार दिन तक बुखार में तड़पता रहा, मां को पल भर के लिए भी नहीं छोड़ता था. अचानक डरकर कांप जाता था. ज़ोर की आवाज़ सुनकर दुबक जाता.
"लगता है विमला बच्चों को डराती है."
"बेचारी कितने प्यार से तो रखती है. देखा नहीं, कैसे पीछे-पीछे लगी रहती है."
"फिर क्या हो गया है उसे? दवाइयां दे रही हूं, नज़र उतरवा दी है, फिर भी ठीक नहीं हो रहा,"
"मौसम ही ऐसा चल रहा है."
"कल तुम छुट्टी ले लेना."
"नहीं, मैं नहीं ले सकता."
"मैं लगातार तीन दिन से छुट्टी पर…"
"बॉस से बोल देना कि बच्चा बीमार है, बॉस भी जानता है कि बीमारी में बच्चे को मां की ज़रूरत होती है."
"किस शास्त्र में लिखा है ऐसा?" वह चिढ़कर बोली.
"मां होकर इतना भी नहीं समझती हो."
"मां होकर सब कुछ समझती हूं. यही तो मेरे दुख का कारण है, जबकि तुम्हें कुछ समझ में ही नहीं आता है." वह मन-ही-मन चिढ़कर बोली.
चार-पांच दिन बाद बच्चा थोड़ा स्वस्थ हुआ. मां के पास रहकर हंसता-खेलता, पर जैसे ही अपरिचित औरतों को देखता तो जाकर छुप जाता. हर औरत में उसे विमला नज़र आने लगी थी. सबके बीच हंसती हुई मगर एकान्त में… आंखें तरेरती हुई… मार का भय दिखाती, लकड़ी से टोंचती, मारती विमला का साया सोते-जागते उसके दिलो-दिमाग़ पर छाया रहता.
छठवें दिन बच्चा फिर तैयार किया जा रहा था. टिफ़िन… बोतल… दवाइयां… फल… आदि से भरा थैला लिए बच्चे का पिता मुस्कुराता हुआ पालनाघर के सामने खड़ा था, और उधर मां ज़बरदस्ती बच्चे की बांहें छुड़ाने के प्रयास में कभी बच्चे को पुचकारती तो कभी समझाती… तो कभी डांटती… अंततः जब बच्चा किसी भी तरह नहीं माना तो एक थप्पड़ मारकर पलंग पर पटककर चल दी. बच्चा पहले तो चीख-चीखकर रोया… मगर मां का साया अदृश्य होते ही सहमकर चुप-सा हो गया, कहीं फिर से मार न पड़े… इस सबसे बेख़बर विमला जल्दी-जल्दी टिफ़िन खोलकर देखने लगी कि आज उसके बच्चों को खाने के लिए नया क्या मिलेगा.

- उर्मिला शिरीष

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