Short Story- Maun Prem
वह बहुत देर तक आसमान को देखता रहा. फिर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे. पहले धीरे. फिर तेज. उसने अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा लिया. वह अपने लिए नहीं रो रहा था. वह उस बचपन के लिए रो रहा था, जो कभी लौटकर नहीं आया. उस एक प्रेम के लिए रो रहा था जिसे नाम नहीं मिला.
बरुआखेड़ा गांव बुंदेलखंड की उन बस्तियों में था, जहां गर्मियों में धरती का रंग तांबे जैसा हो जाता था और बरसात की पहली बूंद पड़ते ही वही धरती ऐसी महक उठती, जैसे बरसों से किसी अपने का इंतज़ार कर रही हो.
गांव के बाहर दूर तक फैले खेत थे. कहीं बाजरा, कहीं ज्वार, कहीं चना और गेहूं की फसल. बीच-बीच में खड़े महुए के बूढ़े पेड़ और पलाश की लाल-लाल छतरियां गांव को अपनी पहचान देती थीं.
इसी गांव में कश्यप और गोमती रहते थे. दोनों एक-दूसरे से बहुत कुछ कहते थे, मगर कभी प्रेम की बात नहीं हुई. शायद इसलिए कि प्रेम से पहले उनके हिस्से में ज़िम्मेदारियां आ गई थीं. कश्यप अपने घर का सबसे बड़ा बेटा था. पिता की कमर उम्र से पहले झुक गई थी और मां की आंखों की रोशनी भी धीरे-धीरे कम हो रही थी. उसके पीछे दो छोटे भाई और एक बहन थी.
गोमती भी अपने घर की सबसे बड़ी बेटी थी. मां के साथ चूल्हा संभालना, छोटे भाई-बहनों को नहलाना, खेत से लौटे पिता के लिए पानी रखना- उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा काम उसके हिस्से में था.
बचपन में दोनों को इन ज़िम्मेदारियों का अर्थ कहां मालूम था. वे गांव के उसी पुराने कुएं के पास खेलते थे, जहां अब भी महिलाएं पानी भरने आती थीं. कभी गोमती कश्यप की पतंग छीनकर भाग जाती. कभी कश्यप उसके लिए बेर तोड़कर लाता. और कभी दोनों बिना कुछ बोले बस एक ही रास्ते पर साथ-साथ चलते रहते.
धीरे-धीरे बचपन पीछे छूट गया. कश्यप के हाथों में हल की मूठ आ गई और गोमती के हाथों में घर की चाबी. अब जब दोनों आमने-सामने पड़ते, तो आंखें कुछ कहतीं और होंठ कुछ और.
“कश्यप, जरा जे बोरी घर तक पहुंचा दइयो.”
“हां, दे दो.”
बस इतना ही…
“गोमती, तेरे घरवाले कुएं से पानी भरने आए थे?”
“हां.”
“ठीक है.”
और दोनों अपने-अपने रास्ते. गांव के लोग शायद कुछ समझते भी थे, मगर गांव में बहुत सी बातें बिना कहे ही समझ ली जाती है. एक दिन दोपहर के समय गोमती अपनी सहेलियों के साथ आम के पेड़ के नीचे बैठी थी.गरमी तेज थी. खेतों से हवा भी जैसे अंगारे लेकर आ रही थी. सहेलियों में से किसी ने पूछा, “गोमती, सुना है तेरी सगाई ठहर गई?”
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गोमती ने सिर झुका लिया, “हाँ.”
“तो अब तो तू पराई हो गई.”
सब हंस पड़ीं.
गोमती भी मुस्कुराई, मगर उसकी आंखें नहीं हंसीं.
कुछ देर बाद उसने धीमे से कहा, “ब्याह तो ठहर गओ है… पर मोरो मन नहीं है.”
उसे नहीं पता था कि थोड़ी दूर खेत की मेड़ के पीछे कश्यप हल चला रहा था। उसके कानों तक आवाज पहुंच गई. हल की मूठ उसके हाथ में ही रह गई. बैल आगे बढ़ते रहे. कश्यप वहीं खड़ा रहा. उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. शायद डर था कि कहीं उसकी आंखें उसे धोखा न दे दें.
शाम को वह देर तक खेत में बैठा रहा. सूरज धीरे-धीरे पत्थरीली पहाड़ियों के पीछे उतर गया. गांव के घरों से धुएं की पतली लकीरें उठने लगीं. दूर कहीं मंदिर की घंटी बजने लगी. कश्यप ने मिट्टी उठाकर हथेली में भर ली. उसकी आंखों से आंसू टपककर उसी मिट्टी में मिल गए. जिस लड़की को वह बचपन से अपने साथ देखता आया था, वह अब किसी और के घर चली जाएगी. वह चाहता तो घर जाकर पिता से बात कर सकता था. गोमती भी शायद अपने घर में कुछ कह सकती थी. लेकिन दोनों के सामने अपने छोटे भाई-बहनों के चेहरे थे.
कश्यप जानता था- उसकी शादी का अर्थ था बहन की शादी रुकना, भाइयों की पढ़ाई छूटना और बूढ़े मां-पिता की चिंता बढ़ना. गोमती जानती थी- अगर उसने अपना मन कह दिया तो उसके पिता पर समाज की उंगलियां उठेंगी और छोटे भाई-बहनों के रिश्तों पर असर पड़ेगा. इसलिए दोनों ने अपने प्रेम को वहीं छोड़ दिया, जहां वह सबसे ज़्यादा सुरक्षित था- अपने भीतर…
कुछ ही महीनों बाद गोमती की शादी हो गई. शादी वाले दिन गांव में ख़ूब चहल-पहल थी. ढोलक बज रही थी. स्त्रियां गा रही थीं. आंगन में हल्दी और मेहंदी की ख़ुशबू थी. कश्यप भी बाकी गांव वालों के साथ वहीं था. वह पूरे समय लोगों के बीच काम करता रहा. कभी पानी भरता, कभी चारपाई उठाता, कभी बारातियों के लिए व्यवस्था करता.
किसी ने उससे पूछा “कश्यप, तू इतना चुप काहे है?”
वह हंस दिया, “काम ज़्यादा है, सो बोलने की फ़ुर्सत कहां?”
जब विदाई का समय आया तो गोमती की आंखें रोते-रोते सूज गई थीं. वह सबको देख रही थी.
मां, पिता, भाई-बहन… फिर उसकी नज़र भीड़ में खड़े कश्यप पर पड़ी.
बस एक पल कश्यप ने भी उसे देखा.
दोनों की आंखों में एक ही सवाल था- क्या सचमुच यही अंत है?..
गोमती की डोली चली गई. कश्यप वहीं खड़ा रहा. उसने न आंसू पोंछे, न किसी से कुछ कहा. बस धूल उड़ाती उस बैलगाड़ी को तब तक देखता रहा, जब तक वह रास्ते के मोड़ के पीछे गायब नहीं हो गई.
शुरुआत में गोमती साल में दो-तीन बार पीहर आती. कश्यप को उसके आने की ख़बर मिलती तो वह अनायास ही गांव के उस रास्ते पर निकल जाता. दोनों कभी आमने-सामने पड़ जाते.
“कैसी हो?”
“ठीक हूं.”
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“घर में सब ठीक?”
“हां.”
“बच्चे?”
गोमती कुछ पल चुप रहती.
“कोई बच्चा नहीं.”
कश्यप फिर कुछ नहीं पूछता. वह जानता था, कुछ सवाल पूछे नहीं जाते. समय बीतता गया. गोमती का पीहर आना कम होता गया. फिर एक दिन बिल्कुल बंद हो गया. कश्यप ने भी पूछना छोड़ दिया.
उसकी भी अपनी शादी हो गई.
घरवालों ने कहा, “अब तो घर बसाओ.”
उसने सिर झुका दिया. उसकी पत्नी अच्छी थी. सरल और समझदार. कश्यप ने उसके साथ कभी कोई अन्याय नहीं किया. उसने अपने हिस्से का जीवन पूरी ईमानदारी से जिया. दो बच्चे हुए, एक बेटा और एक बेटी. बेटा पढ़-लिखकर शहर चला गया. बेटी की भी शादी हो गई. घर धीरे-धीरे खाली होता गया. बूढ़े मां-पिता चले गए. फिर खेत में काम करने वाले हाथ कम होते गए.
एक समय ऐसा आया जब कश्यप सुबह खेत में जाता तो शाम तक वहीं बैठा रहता। अब खेत में पहले जैसी फसल नहीं होती थी. कुएं में पानी भी कम हो गया था. उम्र ने उसकी पीठ झुका दी थी.
बच्चे कहते, “बाबा, अब आप हमारे साथ शहर चलो.”
वह हर बार टाल देता. लेकिन इस बार उसने तय कर लिया. वह गांव छोड़ देगा. जिस गांव में पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी, वहां अब बचा ही क्या था? बस एक सुबह वह अपनी पुरानी संदूकची बांध रहा था कि पड़ोस का रामसेवक दौड़ता हुआ आया.
“कश्यप भैया!”
“का भयो?”
“तुम्हें पता है… गोमती आई है।”
कश्यप का हाथ वहीं रुक गया.
कई बरसों बाद किसी ने उसके सामने यह नाम लिया था.
“गोमती?”
“हां! बड़ी बीमार है, उको आदमी उको गाँव में छोड़ गओ, कहत है, अब उकी सेवा ना होत.”
कश्यप देर तक कुछ नहीं बोला. उसकी आंखों के सामने अचानक वही आम का पेड़ आ गया.
वही दोपहर. वही आवाज़, “ब्याह तो ठहर गओ है… पर मोरो मन ना है!..”
उसने अपनी पुरानी लाठी उठाई और चल पड़ा. गोमती का घर गांव के आख़िरी छोर पर था. कभी वहां रंगी हुई दीवारें हुआ करती थीं. अब दीवारों पर मिट्टी की परतें थीं. दरवाज़े पर एक बूढ़ी स्त्री बैठी थी.
कश्यप को देखकर उसने कहा, “तुम कश्यप हो?”
उसने सिर हिलाया.
“गोमती अंदर है.”
कश्यप ने एक कदम आगे बढ़ाया. फिर दूसरा.
लेकिन कमरे के भीतर जाने से पहले ही उसकी नज़र सफ़ेद चादर पर पड़ गई. कुछ लोग चुपचाप खड़े थे.
एक आदमी ने धीरे से कहा, “अभी-अभी प्राण छूटे हैं.”
कश्यप वहीं ठिठक गया. उसके हाथ से लाठी छूट गई. वह ज़मीन पर बैठ गया.
किसी ने उसे संभालने की कोशिश की.
“कश्यप भैया, धीरज रखो.”
उसने किसी की तरफ़ नहीं देखा. सामने गोमती थी.
सालों बाद वह उसे देख रहा था. लेकिन गोमती की आंखें बंद थीं. जिन आंखों से उसने कभी उसे चुपचाप देखा था, वे अब हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं. कश्यप के होंठ कांपे. शायद वह उसका नाम लेना चाहता था. लेकिन आवाज़ नहीं निकली. इतनी लंबी ज़िंदगी में वह उससे प्रेम नहीं कह पाया था. आज कहने के लिए सामने वह थी ही नहीं. कुछ देर बाद अर्थी उठाने की तैयारी होने लगी. चार आदमी आगे आए.
कश्यप धीरे से उठ खड़ा हुआ.
“रुको…”
सबने उसकी ओर देखा.
उसने कांपती आवाज़ में कहा, “एक कांधा मोरो भी लगा लेन दो.”
लोगों ने जगह बना दी. कश्यप ने अर्थी का बांस अपने कंधे पर रख लिया. बांस का वज़न बहुत कम था. लेकिन उसके कंधे पर जैसे पूरी ज़िंदगी रख दी गई थी. अर्थी आगे बढ़ती रही. कश्यप चलता रहा. उसके कंधे पर उस दिन पहली बार वह रिश्ता था, जिसे उसने पूरी ज़िंदगी अपने मन में ढोया था. शाम को गांव लौटकर कश्यप सीधे खेत पर चला गया.
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वही खेत… वही मेड़… वही मिट्टी…
जहां बरसों पहले उसने गोमती की शादी की ख़बर सुनकर आंसू बहाए थे. वह उसी जगह बैठ गया. वह बहुत देर तक आसमान को देखता रहा. फिर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे. पहले धीरे. फिर तेज. उसने अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा लिया. वह अपने लिए नहीं रो रहा था. वह उस बचपन के लिए रो रहा था, जो कभी लौटकर नहीं आया. उस एक प्रेम के लिए रो रहा था जिसे नाम नहीं मिला. उन तमाम शब्दों के लिए रो रहा था, जिन्हें दोनों ने ज़िम्मेदारियों के नीचे दबा दिया था. और शायद उस सवाल के लिए भी- अगर उस दिन दोनों ने अपने मन की बात कह दी होती तो क्या उनकी ज़िंदगी कुछ और होती?
सूरज डूब गया. खेत पर अंधेरा उतर आया. कश्यप ने आख़िरकार अपने आंसू पोंछे. धीरे-धीरे उठा. उसने खेत की मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई, हथेली पर रखी और फिर वहीं छोड़ दी. सुबह होने से पहले उसने अपना सामान बांध लिया. इस बार उसने गांव छोड़ने का फ़ैसला नहीं बदला. पीछे बरुआखेड़ा था. उसका घर था. उसका खेत था. उसकी पूरी ज़िंदगी थी और उसी मिट्टी में कहीं बहुत गहरे दबा हुआ था- गोमती के नाम का वह प्रेम, जिसे दोनों ने पूरी उम्र जिया, मगर कभी कहा नहीं.
कश्यप चला गया. बिना पीछे मुड़े. शायद इसलिए नहीं कि उसे गांव से मोह नहीं था. बल्कि इसलिए कि अब गांव में वह एक चेहरा नहीं था, जिसे देखने की आस में वह इतने बरस जिया था. कुछ प्रेम साथ रहने के लिए नहीं होते. कुछ प्रेम बस पूरी ज़िंदगी मौन रहने के लिए होते हैं. और शायद वही सबसे गहरे प्रेम होते हैं.
पूर्ति खरे
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