कहानी- मम्मी का फ्रेंड (Short St...

कहानी- मम्मी का फ्रेंड (Short Story- Mummy Ka Friend)

सांची और साक्षी को अर्चना के पक्ष में देख कर संदीप बौखला गया और गुर्राता हुआ बोला, “बंद करो तुम दोनों अपना ज्ञान का पिटारा. ईश्वर आराधना और हरी भजन करने की उम्र में अपने पुरुष या महिला मित्र के साथ घूमना-फिरना शोभा नहीं देता और ना ही एक मां को पुरुष मित्र बनाने की इजाज़त हमारा समाज देता है.”

आज जब अर्चना इवनिंग वॉक से घर लौटीं, तो उनके साथ एक सज्जन भी थे, जो अर्चना के ही हमउम्र थे. अर्चना अपनी बहू सांची से उस सज्जन का परिचय कराती हुई बोलीं, “सांची, ये हैं विवेक गुप्ता, मेरे कॉलेज फ्रेंड.”
यह सुन सांची को हैरानी मिश्रित ख़ुशी हुई, इतने सालों में कभी भी अर्चना ने इस नाम का ज़िक्र नहीं किया था. हां, सांची की शादी के वक़्त अवश्य कुछ महिलाओं से अर्चना ने सांची को यह कहकर मिलवाया था कि ये मेरी स्कूल और कॉलेज फ्रेंड्स हैं, लेकिन उनमें कोई भी पुरुष मित्र नहीं था.
सांची ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था और ना उसे कभी ऐसा लगा कि उसकी सासू मां का भी कोई पुरुष मित्र होगा या हो सकता है. यहां इस भोपाल शहर में अर्चना की कुछ सहेलियां ज़रूर थीं, जो अक्सर घर आती-जाती रहती थीं, लेकिन वे सभी आस-पड़ोस की महिलाएं और अर्चना के स्वर्गवासी पति के मित्र व सहकर्मी की पत्नियां ही थीं, जिन्हें सांची बहुत अच्छी तरह से जानती थी. सांची के लिए ये विवेक गुप्ता नया नाम था, लेकिन उसके बावजूद सांची ने उस शख़्स को पूरे सम्मान के साथ बैठने का आग्रह किया और उसके बाद अर्चना से बोली, “मम्मीजी, आप बातें कीजिए मैं चाय लेकर आती हूं.”
सांची इतना कहकर मुड़ने ही वाली थी कि अर्चना बोली, “सांची, चाय केवल मेरे लिए ही लाना, विवेक के लिए ब्लैक कॉफी ले आओ.” ऐसा कहकर अर्चना हंसती हुई विवेक की ओर देखकर बोली, “क्यों ठीक कह रही हूं ना.” इस पर विवेक भी हंसता हुआ बोला, “अरे वाह! अर्चु आज भी तुम्हें मेरी पसंद याद है.”
अर्चना भी चहकती हुई बोली, “हां, भला कैसे भूल सकती हूं. कॉलेज कैंटीन में हमने घंटों जो साथ बिताए हैं.”
अर्चना का इतना कहना था कि दोनों ठहाके मार कर हंसने लगे. विवेक के मुंह से अर्चु और अर्चना से कॉलेज कैंटीन सुन कर कुछ पल के लिए सांची के पांव की गति स्वत: ही धीमी हो गई और उसके कान खड़े हो गए. इधर अर्चना और विवेक इस बात से बेख़बर कॉलेज में बिताए अपने दिनों को स्मरण करके आनंदित हो रहे थे. उधर सांची किचन में ज़रूर थी, परन्तु उसका पूरा ध्यान हॉल में बैठे अर्चना और विवेक की बातों की ओर ही था. यह अलग बात थी कि उसे दोनों के बीच होते वार्तालाप ठीक से सुनाई नहीं दे रहे थे, केवल हंसने की आवाज़ ही सांची के कानों तक पहुंच रही थी.
चाय, कॉफी और कुछ नमकीन के साथ जब सांची हॉल में पहुंची, तो उसने देखा अर्चना और विवेक बिंदास किसी बात पर हंस रहे हैं. अर्चना के चेहरे पर ऐसी हंसी सांची तभी देखती, जब अर्चना की स्कूल व कॉलेज फ्रेंड मालिनी आंटी अर्चना से मिलने आती, वरना बाकी लोगों के संग मिलकर अर्चना के होंठों पर मुस्कान तो ज़रूर होती, किन्तु यह बेबाक़पन और बिंदास हंसी कभी दिखाई नहीं देती.
आज अर्चना की आंखों में चमक और चेहरे पर निश्छल हंसी थी. यह देख सांची को समझने में वक़्त नहीं लगा कि जो शख़्स उसकी सासू मां के साथ बैठा है वह उसकी सासू मां का सच्चा व गहरा मित्र है, क्योंकि सांची यह बात भली-भांति जानती थी कि कोई भी इंसान दिल खोलकर केवल अपने सच्चे दोस्त के समक्ष ही हंसता या फिर रोता है.
काफ़ी देर गप्पे मारने के पश्चात विवेक बोला, “अच्छा अर्चु अब मैं चलता हूं, कल मिलते हैं इवनिंग वॉक पर.” इतना कहकर विवेक ने दरवाज़े का रूख किया और अर्चना अपने कमरे की ओर चली गईं. विवेक का घर से बाहर निकलना हुआ और उसी वक़्त अर्चना का बेटा यानी सांची के पति संदीप का आना हुआ. अपने घर से किसी अनजान व्यक्ति को निकलता देख संदीप को थोड़ा आश्चर्य हुआ. घर के अंदर आते ही संदीप ने सांची से पूछा, “ये हमारे घर से अभी-अभी जो बंदा बाहर गया वो कौन था..?”
संदीप का ऑफिस बैग अपने हाथों में लेती हुई सांची बोली, “ये विवेक गुप्ताजी थे मम्मीजी के कॉलेज फ्रेंड.”

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यह सुनते ही संदीप के चेहरे का भाव थोड़ा बदल गया और वह आश्चर्य से बोला, “मम्मी के फ्रेंड? विवेक गुप्ता! यह नाम तो पहले कभी नहीं सुना, लेकिन ये आए क्यों थे?”
“ये आए नहीं थे, मम्मीजी इन्हें लेकर आई थीं.”
“क्यों..?” अभी सांची इस क्यों का कोई जवाब संदीप को दे पाती, इससे पहले ही अर्चना हॉल में आ पहुंचीं और संदीप के क्यों का जवाब देती हुई बोली, “क्योंकि विवेक गुप्ता मेरा फ्रेंड है और उसे मेरा घर देखना था.”
अर्चना से यह जवाब सुन संदीप स्वयं को संयमित करते हुए बोला, “आपका फ्रेंड, लेकिन मम्मी आज से पहले तो ये हमारे घर कभी नहीं आए और ना ही आपने कभी इनकी चर्चा की, फिर आज अचानक…”
इतना कहकर संदीप बीच में ही रुक गया, तभी अर्चना संदीप की बातों व आंखों में संदेह देखकर बोलीं, “अचानक नहीं बेटा पिछले एक सप्ताह से विवेक को मैं घर लाने की सोच रही थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था. आज समय मिला, तो सोचा ले चलती हूं. और रही बात पहले कभी विवेक की ज़िक्र ना करने की, तो ऐसा है कि कभी ऐसा कोई प्रसंग ही नहीं आया कि मैं विवेक की चर्चा करती. वैसे भी कॉलेज के बाद विवेक ऑउट ऑफ इंडिया चला गया और मेरी शादी हो गई. अब जा कर मिला है इतने सालों बाद. तुम्हें पता है विवेक भी हमारी ही सोसायटी के ए विंग में अपने बेटा-बहू और पोते के साथ रहता है.”
अर्चना अपने बेटे संदीप को कुछ इस तरह से सफ़ाई दे रही थी मानो उसने विवेक को घर बुलाकर कोई गुनाह कर दिया हो. तभी सांची बोली, “अच्छा हां, ए विंग में मैंने सुना तो है कोई गुप्ता फैमिली आई है, तो क्या ये विवेक अंकल की फैमिली है.” अभी यह सारी बातें हो ही रही थी कि संदीप वहां से चला गया और बात आई गई हो गई.
अब रोज़ इवनिंग वॉक पर अर्चना और विवेक का सोसाइटी पार्क पर मिलना, बातें करना, साथ वक़्त गुज़ारना अर्चना के बेटे संदीप को नागवार गुज़रने लगा और वही स्थिति विवेक के बेटा-बहू की भी थी. उन्हें भी अर्चना और विवेक की दोस्ती अपनी बदनामी से ज़्यादा कुछ नही लग रही थी.
संदीप ने सांची से क‌ई बार कहा कि वह अर्चना को विवेक गुप्ता से दूर रहने को कहे, लेकिन सांची हर बार संदीप की बातों को अनसुना कर देती, क्योंकि उसे कभी भी नहीं लगा कि अर्चना और विवेक की दोस्ती में कुछ ग़लत है. सोसाइटी में भी अब अर्चना और विवेक को लेकर कानाफूसी और तरह-तरह की बातें होने लगी, जो उड़ती हुई दोनों परिवारों के कानों तक भी पहुंचती, परंतु अर्चना और विवेक इन बातों से बेख़बर अपनी दोस्ती और पुराने दोस्तों के संग रियूनियन पार्टी प्लान करने में लगे हुए थे. एक शाम अचानक इन्हीं सब बातों को लेकर संदीप ग़ुस्से से तमतमाता हुआ घर पहुंचा, तो उसने देखा अर्चना और सांची पैकिंग कर रही हैं. यह देख संदीप ग़ुस्से में सांची से बोला, “यह सब क्या हो रहा है और तुम ये मम्मी का सूटकेस क्यों पैक कर रही हो.”
संदीप को इस प्रकार ग़ुस्से में देख, उसे शांत कराती हुई सांची प्यार से समझाते हुए संदीप से बोली, “मम्मीजी सागर जा रही है रियूनियन पार्टी के लिए.”
यह सुनते ही संदीप का पारा चढ़ गया और वह ऊंची आवाज़ में बोला, “उस विवेक गुप्ता के साथ… मम्मी आप का दिमाग़ तो ठिकाने पर है. ज़रा सोचिए लोग क्या कहेंगे. आपको कुछ पता भी है सोसाइटी में आपके और उस विवेक गुप्ता के बारे में लोग क्या-क्या बातें बना रहे हैं. अपनी नहीं तो कम-से-कम हमारी इज्ज़त का तो ख़्याल कीजिए.”
अभी संदीप अपने मन की भड़ास अर्चना पर निकाल ही रहा था कि विवेक के बेटा-बहू अमित और साक्षी भी अर्चना के घर आ धमके और अर्चना को भला-बुरा कहने लगे.
विवेक का बेटा अमित अर्चना पर आरोप लगाते हुए बोला, “मेरी मम्मी को दिवंगत हुए सालों बीत गए हैं, लेकिन मेरे पापा ने कभी भी किसी औरत की तरफ़ आंख उठाकर नहीं देखा और आज आपसे मिलते ही अपना मान-सम्मान सब भुला कर, हमारी मुंह पर कालिख पोत कर आपके साथ सागर जाने की तैयारी कर रहे हैं.”
अर्चना का अपना बेटा संदीप भी दूसरे लोगों की कही बातों में आकर अपनी मां का अपमान कर रहा था, सब मिलकर अर्चना पर लांछन लगाने और उसके चरित्र पर उंगली उठा रहे थे, अर्चना डबडबाई आंखों से ख़ुद को कठघरे में खड़े किसी मुजरिम की तरह चुपचाप सब सुन रही थी. यह देखकर सांची से रहा नहीं गया और वह चीखती हुई बोली, “बस करिए… आप में किसी को भी इस तरह मम्मीजी पर लांछन लगाने का कोई अधिकार नहीं है. मम्मीजी और विवेक अंकल अच्छे दोस्त हैं. जब एक स्त्री मां हो सकती है, बेटी हो सकती, बहन हो सकती है, प्रेमिका और पत्नी हो सकती है, तो दोस्त क्यों नहीं..? और वह क्यों अपने दोस्त के साथ कहीं नहीं जा सकती.”


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सांची से यह सब सुन विवेक की बहू साक्षी की भी आंखें खुल गई और वह भी जो अब तक अर्चना पर आरोप लगा रही थी अर्चना के संग आ खड़ी हुई और अपने पति अमित से बोली, “सांची बिल्कुल सही कह रही है, आंटीजी क्यों नहीं जा सकती पापाजी के साथ. जब आप अपनी रियूनियन पार्टी में अपनी फ्रैंड शिल्पा के साथ जा सकते हो तो पापाजी और मम्मीजी भी जा सकते हैं.”
सांची और साक्षी को अर्चना के पक्ष में देख कर संदीप बौखला गया और गुर्राता हुआ बोला, “बंद करो तुम दोनों अपना ज्ञान का पिटारा. ईश्वर आराधना और हरी भजन करने की उम्र में अपने पुरुष या महिला मित्र के साथ घूमना-फिरना शोभा नहीं देता और ना ही एक मां को पुरुष मित्र बनाने की इजाज़त हमारा समाज देता है.”
संदीप की संकीर्ण विचारों को सुन कर अर्चना का हृदय द्रवित हो उठा. उसकी आंखों में अब तक ठहरा पानी बह निकला और वह अपना सूटकेस पैक करती हुई सोचने लगी कि कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं, लेकिन आज भी स्त्री-पुरुष को लेकर हमारे समाज की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है, लेकिन अब बदलना होगा… यदि हम बदलाव चाहते हैं, तो हमें स्वयं बदलाव की ओर अपना पहला कदम आगे बढ़ाना होगा. इसी सोच के साथ अर्चना हाथों में सूटकेस लेकर घर से निकलती हुई सांची और साक्षी से बोली, “बेटा, मेरी गाड़ी का समय हो गया है मैं निकलती हूं.”

प्रेमलता यदु


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