कर्नल साहब तर्क पर उतरे, “नहीं! एक पकौड़ी मैंने बचा कर रखी है, तुम आकर खाकर देखना, नमक नहीं है.” रीना ने आराम से कहा, “सॉरी जी…” और फोन कट!
मैं और रीना रोज़ की तरह शाम की सैर पर निकले ही थे कि अचानक उसका फोन बज उठा.
रीना ने धीरे से मेरे कान में फुसफुसाया, “कर्नल साहब!”
उधर से भारी-भरकम आवाज़ आई, “तुमने पकौड़ियों में नमक नहीं डाला!”
रीना चौंकी, “डाला है… मैं तो खाकर भी आई हूं.”
कर्नल साहब तर्क पर उतरे, “नहीं! एक पकौड़ी मैंने बचा कर रखी है, तुम आकर खाकर देखना, नमक नहीं है.”
रीना ने आराम से कहा, “सॉरी जी…”
और फोन कट!
मैंने रीना की ओर देखा तो वह बड़ी शांति से बोली, “अब मैं किसी बहस में नहीं पड़ती. सॉरी बोल देती हूं और बात ख़त्म. चालीस साल साथ रहने के बाद इतना तो सीख ही लिया कि बहस में जीतकर भी घर की शांति भंगहो जाती है.”
मैंने रीना की समझदारी को सैल्यूट किया और मन ही मन सोचने लगी, ‘कर्नल साहब ने ज़िंदगी का सबसे बड़ा युद्ध तो जीत ही लिया है- नमक की जंग!’

नील मणि
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